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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

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नरक निवास । सुगंध रूप हो रहे, तब जीव गरभ दस मास ॥ इन दुखनसे काढ़ि, प्रगट बाहेर प्रभु कीन्हा । भगति अंगकी छांप प्रभू, दस्कत लिख दीन्हा ॥ उनको नाम न ले सके, जिन पठये भव मांह । रंचक सुखके कारने, विसर गये निज नाह ॥ बालक बुध अजान, कहा कछु मर्म न जाने । खेले सहज सुभाव, जहाँ वाके मन माने ॥ अधिक हठीले हो रहे, ना काहूको मान । भला बुरा चित ना धरे, बारा बरस अजान ॥ नौ दस भीतर आय जान, जब जुरी सगाई । नारीते पहिचान, नाम बद कीन्हे भाई ॥ पुरुष नाम ना ले सके, जिन पठये भौ माहिं । येहुं उमर भूले फिरे, देख कुटुम्बकी बांह ॥ जोवन जोर झकोर, मसी जब मुखपर आई । अंग सुगंध लगाय, शीश पगिया ढरकाई ॥ अंध भये सूझे नहीं, फूट गये जो चार । झूठे काम पंतंग जो, देख बिरानी नार ॥ जैसे रंग कुसुम, बहुत दीखतके नीके । भावे दिन दस चार, अंत लागेंगे फीके ॥ माया निकट बुलायके, देवै छाती बाढ । लीन्हे रंग निचोयके, ज्यों कोल्हू तिल काढ ॥ नाम जो रंग मजीठ लगे, छूटे ना भाई । रचे रच रहे शरीर, सबे दिन दिन अधिकई ॥ बारम्बार धोवाइये, देव करारी धोय । ज्यों ज्यों फटे पिछोरा, दिन दिन ऊजल होय ॥ जोधा अजर अजीत, पलट पुहमी पग धरते । दुश्मन रहत डराय जाहि छल बल कर गहते ॥ सौ जोजन मरजाद है, सिंधु करत एक फाल । हाथन परबत तौलते, तो धरि खायो काल ॥ जिन बांधा बलबीर, देव तेतीस करोरी । तिनके बिगरे राज, जरत जस फागुन होरी ॥ देखो दिष्टि पसारके, नर तुम्हरे केतिक बात । देखतही तुम जावगे, ज्यों तरवरके पात ॥ सोवतहौ केहि नींद, सूठ मुरख अज्ञानी । अंत समय पछताव, हंस जब देय पयानी ॥ काहे खोटी करत हो,