कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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तब का चेतो अंध । एक नाम जाने बिना, परो कालके फंद ॥ ऊंट सलीता बहुत बहुत, हाथी ओ घोडा । चलत वारके समय, न लागे एको डोरा ॥ कंचन महला घर रही, और सुंदरी नार । जो आये सो जात हैं, चले दोऊ कर झार ॥ ऐसा यह संसार जान, जस रहटके घरिया । एक आवे एक जाय, एक पुन आवे भरिया ॥ उपज उपज बिनसत फिरे, फिर फिर करे गरास । एही तमाशा देखके, चितमें भये उदास । खेत बिराने लागे मृगा, एक बनसे गाधा । नित प्रति चर चर जाय, एक दिन आया व्याधा ॥ छूटन चाहे बल करे, मनही मन पछताय । अब कैसेके छूटनो, जब धनी पहुँचा आय ॥ ऐसा यह संसार जान, जस गुडकी मंखी । लागी चाखन बैठ, बाझगये दोनों पंखी ॥ पंख मरोरें शिर धुने, मनही मन पछताय । वह मलयगर छोड़के, यह दुख पायेउ आय ॥ काह कहुँ कित जाउं, आन चहुँ दिशसे घेरा । मात पिता पुचकार, हाथ चोटीसे फेरा ॥ मोह फांसमें बांधके, छूट न पावे जान । नारी तो बैरी भई, पुत्र भये निगमान ॥ यहाँ दूधका दूध, और पानीका पानी । सुनो संतो चितलाय, कहुँ यह अकथ कहानी ॥ कँवल कली बिगसित भई, अनभौ शब्द उचार । यह लीला है मुक्तिका, कहें कवीर बिचार ॥ ❁
शब्द १७२-हीरा तन पाय तूने सुमति गँवाई ॥ टे० ॥ नौ दस मास गरभमें राखे, नरक योनि भुगताई ॥ नरक योनिसे बाहिर काटे, मात पिताकी सुध बिसराई ॥ बालापनमें खेल गँवाये, पीछे ज्वानी आई ॥ जो माताने दूध पिलाई, सो माताको लात चलाई ॥ बृद्ध भये कफ आवन लागे, द्वारे खाट बिछाई ॥ पार- परोसी सब जुर आये, घरके कहैं यहि मौत न आई ॥ भवसा-