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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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(८२८)

कवीरपंथी-

गरकी अगम बात है, जाके पार न पाई॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, छोड़ चले सबही ठकुराई ॥

शब्द १७३-संतो करो साहबी तनमें ॥ टे० ॥ पांच पचीस फौज या मनकी, खेलेँ भीतर घरमें॥ भरम मोरचा साहब काटे, बैठ जुगतके घरमें ॥ मूल कँवलकी खोल किंवारी, प्रेम मगन भये दिलमें॥ श्वेत फूल निश बासर फूले, लेत लहरिया जलमें॥ बंकनालको धावा देवे, चढ़ गया सूर गगनमें ॥ घाट पाट सब औघट देखे, आवे तखत नजरमें॥ ताल पखाल मृदंग जो बाजे, शोभा नगर महलमें ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, छायो नाम अधरमें ॥

शब्द १७४-में सत्तनामका बैपारी ॥ टे० ॥ काह लादे कांसा पीतर, काहू सामर खारी॥ संतन लादे नाम धनीका विष लादे संसारी ॥ पूंजी न टूटे नफा चौगुने, बनज किया एक भारी ॥ गैल जगाती रोक ना सके, है निरभय राह हमारी ॥ हाल हजूर रहत साहबके, पटा चढो दरबारी ॥ जब साहबने पंजा रोपे, जम पर अदल हमारी ॥ हीरालाल घटहीमें उपजे, सुकिति लगी किंवारी ॥ नाम साहबका लाद चले हैं, धर्मदास बैपारी ॥ लख चौरासी जिया जो इनसे, इनसे राह नियारी ॥ कहें कवीर एक बनज किया है, कबहुँ न आवे हारी ॥

शब्द १७५-अलमस्ता जोगी नाम अमल रस चाखा ॥ टे० ॥ याही तनकी कूंडी करले, शब्दके करले घोटा । भरम भांगको निशदिन घोटा, ज्ञानका साफी छनौटा ॥ आव संत जुर-मिलके पीवो, प्रेम मगन विस्वास । सुरत समेट धरौ हदैमें, छूट जाय भरम फासा ॥ रतन कटोरा भर भर पीवो, पांचों ईद्री साथ । रोम रोममें छाय गया है, का टंढा का ताता ॥ गुरुका शब्द