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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८२९)

अगिनका टनका, जब लागा तब चेता । सार शब्द खांडेकी धारा, सब हारा कोइ जीता ॥ सिरके साँटे भगत कबूले, का तनकी कुसलाता । साहेब कवीर मगन होय गावे, का संध्या परभाता ॥

शब्द १७६-साहब तेरा भेद न जाने कोई ॥टे०॥ पानी ले ले साबू लेले, मल मल काया धोई । अंदर घटका दाग न छूटे, निरमल कैसे होई ॥ जा घट भीतर बैल बंचे हैं, निरमल खेती होई । सुखिया बैठे भजन करत हैं, दुखिया दिल भर रोई ॥ या घट भीतर अगिन जरत है, धुवां न परगट होई । कै दिल जाने आपना, के सिर बीती होई ॥ जर बिन बेल बेल बिन तूबा, बे फूले फल होई । कहें कवीर सुनो भाई साधू, गुरु बिन ज्ञान न होई ॥

शब्द १७७-साहब मेरा मैं द्वालीबंद तेरा ॥टे०॥ पांच हथियार कमर कस बांधो, ठग ठाकुर बहुतेरा ॥ हनमस्ता चौकीपै राखो, चोर न मूसे डेरा ॥ सब दिन जीन छुटन ना पावे, चरन न पावे घोडा ॥ निश दिन लडे धनीके आगे, रनमें लडत अकेला ॥ पांचों मार पचीसों बसकर, जब मुजरा है तेरा ॥ मुजरा तेरा होन न पावे, लुटन लगे सब डेरा ॥ काया गढमें फिरे दोहाई, दुतिया रहन न पावे ॥ कहें कवीर ताहिको मारो, जो कोइ शीश उठावे ॥

शब्द १७८-ग्वालिन दधि बेच न जाना । मेरा सतगुरु दुहत दुहाना ॥टे०॥ मूल चक्रपै रोपी मटकिया, सुषमन खेंच मथाना ॥ सुरति निरतिकी करो कडनियां, धीरज फुलका भवना ॥ माखन खेंच छाछ कर न्यारी, त्रिकुटि महलमें छवना ॥ गुहिज कमलमें कुपीका बासा, माखन उलट समाना ॥ उलटके मीन चढी गिरवरको, कहें कवीर पहिचाना ॥

कबीरपंथी शब्दावली · पृष्ठ 843, कुल 968 में से · BharatKosha