कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
शब्द १७९-संतो अमल करे सो पावे, बिन ससुझे का गावे ॥ टे० ॥ जैसे सुराही लिये हाथमें, पल पल दरस दिखावे ॥ औरन आगे करत उजैरो, आप अंधेरे जावे ॥ बनी समाध रूपी घट भीतर, दिलवर दिलहि मिलावे ॥ चढो नसा उतरे ना कबहुँ, नैनन बीच रमावे ॥ बांचे पोथी अरथ उचारे, जगको कथा सुनावे ॥ जानत नहीं कहाँ हम जैहैं, घर जरे पूर बुतावे ॥ ध्रुव प्रहलाद नामदेव छाके, सुरदा गाड़ ज़िवावे ॥ कहैं कवीर देख सद्नाको, एकै घरे तुलावे ॥
शब्द १८०-हों जग जाहिरा मेरा नाम कवीर ॥ टे० ॥ तीन लोक ताना तनों, खूँटी है असमान ॥ पानी पवन सरूप हमारा, या विधि रचों जहान ॥ अनहद नाद गगन धुन गाजें, लागी सोहैं तार ॥ ब्रह्मबीज हमहीते आयो, हमहीं सिरजनहार ॥ गगन मंडलमें रहन हमारी, त्रिकुटी है अस्थान ॥ सुर नर मुनिवर पार न पावे, है कोई संत सुजान ॥ जम बंधनसे जाय छुड़ाऊँ, निरभै करो शरीरा ॥ सुक्तिभेद ताहीसे भाखों, जो मत गहिर गंभीरा ॥ वेद किताबसे रहते न्यारा, ऐसा मतको धीर ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, दोई दीनको पीर ॥
शब्द १८१-तुम बिन कौन गरीब निवाजे ॥ त्रिनसे बज्र बज्रसे तिनका, जोई करे सो छाजे ॥ टे० ॥ जलमें थल थलमें जल कीन्हो, बिगरी फेर संभारे ॥ नरते नार किये नारदको, अजामिलसे तारे ॥ मत कोई गर्व करो करनीको, करता कितम विचारे ॥ कहैं कवीर करतासे डरिये, मत कछु औरन टारे ॥
शब्द १८२-संतो पानीमें रजधानी । पानी पिंड ब्रह्मांड सकल सब, पानीकी मंडानी ॥ टे० ॥ पानी खेत बीज है पानी, पानी सांचे दारा । नाद बिंद संजोग समाना, जुगल स्वरूप सँवारा ॥