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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(८३०)

कवीरपंथी-

शब्द १७९-संतो अमल करे सो पावे, बिन ससुझे का गावे ॥ टे० ॥ जैसे सुराही लिये हाथमें, पल पल दरस दिखावे ॥ औरन आगे करत उजैरो, आप अंधेरे जावे ॥ बनी समाध रूपी घट भीतर, दिलवर दिलहि मिलावे ॥ चढो नसा उतरे ना कबहुँ, नैनन बीच रमावे ॥ बांचे पोथी अरथ उचारे, जगको कथा सुनावे ॥ जानत नहीं कहाँ हम जैहैं, घर जरे पूर बुतावे ॥ ध्रुव प्रहलाद नामदेव छाके, सुरदा गाड़ ज़िवावे ॥ कहैं कवीर देख सद्नाको, एकै घरे तुलावे ॥

शब्द १८०-हों जग जाहिरा मेरा नाम कवीर ॥ टे० ॥ तीन लोक ताना तनों, खूँटी है असमान ॥ पानी पवन सरूप हमारा, या विधि रचों जहान ॥ अनहद नाद गगन धुन गाजें, लागी सोहैं तार ॥ ब्रह्मबीज हमहीते आयो, हमहीं सिरजनहार ॥ गगन मंडलमें रहन हमारी, त्रिकुटी है अस्थान ॥ सुर नर मुनिवर पार न पावे, है कोई संत सुजान ॥ जम बंधनसे जाय छुड़ाऊँ, निरभै करो शरीरा ॥ सुक्तिभेद ताहीसे भाखों, जो मत गहिर गंभीरा ॥ वेद किताबसे रहते न्यारा, ऐसा मतको धीर ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, दोई दीनको पीर ॥

शब्द १८१-तुम बिन कौन गरीब निवाजे ॥ त्रिनसे बज्र बज्रसे तिनका, जोई करे सो छाजे ॥ टे० ॥ जलमें थल थलमें जल कीन्हो, बिगरी फेर संभारे ॥ नरते नार किये नारदको, अजामिलसे तारे ॥ मत कोई गर्व करो करनीको, करता कितम विचारे ॥ कहैं कवीर करतासे डरिये, मत कछु औरन टारे ॥

शब्द १८२-संतो पानीमें रजधानी । पानी पिंड ब्रह्मांड सकल सब, पानीकी मंडानी ॥ टे० ॥ पानी खेत बीज है पानी, पानी सांचे दारा । नाद बिंद संजोग समाना, जुगल स्वरूप सँवारा ॥

शब्दावली

(८३१)

पानीमें उपजे, पानी बिनसे, पानीके पंडित ज्ञानी । दस औतार पीर पैगंबर, पानीमें चारों खानी ॥ पानीके यह सकल रंग है, ताहि देख नर भूला । चिंता तेज कलप नहीं छूटे, फिर फिर संकट झूला ॥ पानीकेरे सकल भोग हैं, पानी सुखके रासी । जो पानीका मरम न जाने, सो भरमें चौरासी ॥ पानी ताता पानी सीरा, पानी खट्टा मीठा खारा । पानी झलक सपेद जरद है, लाल हरा औ कारा ॥ हिंदू तुरुक कहें हम दोनों, एक पानीते सिरजे । आपुसमें दोऊ लड़े मरत हैं, दुबधामें दोऊ उरझे ॥ पानी काया पानी माया, जित देखो तित पानी । पानीको करता घट भीतर, बोलत अमृत बानी ॥ जोग यज्ञ तीरथ व्रत संजम, ज्ञान ध्यान ले आया । कहैं कवीर एक समुझे बिन, काहू कछू न पाया ॥

शब्द १८३-मेरी प्रीत लगी गुरु नामसो ॥ टे० ॥ जैसे प्रीत है चंद चकोरकी, एकटक नैना ध्यानसो ॥ जा तन लगी सोई तन जाने, कठिन चोट गुरु ज्ञानसो ॥ जैसे मीन नीरके बिछुरे, तन मन तलफत प्रानसो ॥ भासिन प्रीत करि सतगुरुसों, छोड़ विरह रस कामसो ॥

शब्द १८४-दया करी गुरु जुगत बताई । आपा चीन्हे भरम नशाई ॥ टेक ॥ आपा चीन्हे त्रिभुवन सूझे । गुरु प्रताप कालसे जूझे ॥ बहुर न भटको रे नर भाई । पाप पुन्यको बीज नशाई ॥ पाप पुन्य दोनों कस बाती । जनम जनम इन जारी छाती ॥ काम कसाई क्रोध चंडाला । आशा बैरन तृष्णा काला ॥ लोभ डौमरो निद्रा डारा । मनसा चोर दियो दुखभारा ॥ कनक कामिनी कलहुको भोंडो । इन ठगनोने सब जग डाँडो ॥ कैसे छूटे मोहको फंदा । कैसे खिजमत पावे बंदा ॥ कैसे भँवर कमल जो पावे । कैसे जग जंजाल नशावै ॥ जब सतगुरुने सार मत दीन्हा । बडे

(८३२)

कवीरपंथी-

भागसे आतम चीन्हा ॥ बडे भागसे आतम जागे । कहें कवीर जबही भरम भागे ॥

शब्द १८५-साधू यो संसारमें, कमला जल माही ॥ सदा सर्वदा संग रहहे, जल परसत नाहिं ॥ टे० ॥ जुगत जान जलकूकरी, जल मध्य रहाई । पानी पंख न लागई, कछु कसरत पाई ॥ मीन तेर जल ऊपरे, कछु लगत न भारा । आड अटक माने नहीं, पैरे जल सारा ॥ जुगत जमूरा पाइया, सरपे लपटाई । वाको बिष व्यापे नहीं, गुरुगम्य बताई ॥ स्वीर खांड घृत भोजना, करसो लपटाई । जिभ्याको लागे नहीं, वाका चिकनाई ॥ भगल कला नट खेलेई, घर न्यारा न्यारा । खंड बिहंडल होरहे, ज्योंका त्यों सारा ॥ जैसे सीष समुद्रमें, चित धरत अकाशा । ऐसे पपीहा स्वातीको, नित प्यासा प्यासा ॥ कुंज ग्रह का संचरे, वाका को रखवारा । भौमें गलते राखिया, ऐसे गुरु हमारा ॥ बंबीमें बिषधार बसे, कोई पकर न पावे । कहें कवीर गुरु मंत्रसो, सहजे चलि आवे ॥

शब्द १८६-वा घरमें तुम घर करो, घर बहुर न होई ॥ कोट कल्प जुग बीतिया, बिनसे नहीं कोई ॥ टे० ॥ सैतन नीव गहरी दई, दे विवेकको गारा । सारशब्द ईंटे दई, गुरु राज हमारा ॥ भक्ति महल ऊंचे बने, धीरज घर पाटे । सत सुकित छहियां करो, पावे सिरके साटे ॥ प्रेम संदला गारके, गच प्रीतिसों डारे । शील दुलीचा डारके, साधुन बैठारे ॥ दया क्षमा चौकी करो, राखो घर बारा । कहे कवीर सतगुरु मिले, तब होय उबारा ॥

शब्द १८७-गुरुजी समुझ पकड़ियो बाँहीं ॥ जो बालक झुन- झुनियां खेले, सो बालक हम नहीं ॥ टे० ॥ हमतो लेहीं सत्तका सौदा, परपंच पूजत नहीं । चौदासो चेला तुम जो कीन्हे, ले धरिहो केहि ठाहीं ॥ जियत ठिकानो सर्बहि बतावे, सुए ठिकानो

शब्दावली

(८३३)

काहीं । जो तुम्हरे कछु उद्यम नाहीं, भीख मांग किन खाहीं ॥ मूल सजीवन जानत नाहीं, मत परबोधा काहीं । नाव तुम्हरी करिया नाहीं, लहर उठे विकरारा । गुरु सहित सब चेला बूड़े, कौन उतारे पारा ॥ सूखे काटे जो घुन लागे, लोहे लागे काई । बिन परतीत गुरु का कीजे, काल घसीटे जाई ॥ अमृतकुंड सदाकी चौकी, बेली बेला राखे । नेवर देखे विषहर कंपे, चपल अमीरस चाखे ॥ माया आय चौकमें बैठी, नवल विवाहन आहीं । दये कपाट महलमें पौड़े, अब कछु संशय नाहीं ॥ समझ न होय तो समझो गुरुजी, नातर होत बिगारा । कहैं कवीर सुनो रामानंद, यह सिख लेउ हमारा ॥

शब्द १८८—नगरीया वौरी कोई चतुर न पावे पार ॥ टे० ॥ साकट सूकर कूकरा, तीनोंका मत एक ॥ कोट जतन परबोधिये, तऊ न छाड़े टेक ॥ तास नाम बेगमपुरा, बसे सो बेगम होय ॥ या नगरी जो घर करे, बहुरि न आवन होय ॥ जात बरन यहाँ है नहीं, दरस दिवाना देश ॥ जतन जतनसों पाइये, बहुरि नहीं धरे भेश ॥ पांच तत्त्व तत्त्वहि मिले, पढ़ि समाने ग्रान ॥ ज्ञान ध्यान पैड़े थके, ततका ना गलतान ॥

शब्द १८९—जिनकी गगन घटा घहरानी ॥ चमको बीज भयो उजियारो, मिट गई तिमिर निशानी ॥ टे० ॥ ज्ञान ध्यानके बैल चराये, खेत जोत निरबानी ॥ दुबिधा दूब खोद किन डारो, फिर बोवो नामकी धानी ॥ अपनी अपनी बंधिया बांधो, बहि न जाय कहुं पानी ॥ चित चेतन रखवारे राखो, चरि न जाय मिरगानी ॥ उपजे खेत नाज घर आवे, आनंद मगन किसानि ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, तृष्णा तपन बुझानी ॥

कवीरपंथी शब्दावली २७

(८३४)

कवीरपंथी-

शब्द १९०—चलोरी वहि देशवा जहाँ बरषत रंग अपार । वहि देशकी औघट घाटी, बिरले पावे पार ॥ टे० ॥ सतगुरु सिंधु नाम पहिचानो, तन मन धन सब वार ॥ वहि देशमें नौबत बाजे, तत मत झीनो तार ॥ सरवन सुनत कटे जम बाधा, साध सबद अधार ॥ वहि देशमें जगमग जगमग, वहि शोभा उजियार ॥ तहवां हंस करे कौतूहल, पुरुषको रूप निहार ॥ एक हंसकी बरनो शोभा, षोडस रवि छिटकार ॥ भोजन सुधा पुहुषकी सज्या, आनंद अखंड अपार ॥ उबरे नाम पायते जगते, भगते होय नियार ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, आवागमन निवार ॥

शब्द १९१—यो मन ऐसा नीच संचाती ॥ डोलत फिरत नीच नीचनमें, आठ पहर दिन राती ॥ टे० ॥ बिषकी बात लगत अति शीतल, हरि चरचा लग ताती । शुभ करमनको भगे पीठ दे, कुकरमन रोपे छाती ॥ वे जीव जाय परत नरकमें, मन सुख बांधे गाती । कहें कवीर सुनो भाइ साधू, जाको जोन सजाती ॥

शब्द १९२—भले आये सतगुरु मैं बलि जाय । आतम अंध जगायो आय ॥ टे० ॥ अंधरी आतमके भरम भगाय । लख चौरासीकी बंद छुडाय ॥ अंधरी आतम जब उतरे पार । कोट करम फंदा भरमजार ॥ पूरन सतगुरु प्रगटे आय । नौ लख तारे गये छिपाय ॥ पूरे गुरुनकी पूरी कला । और कला दीसे ना भला ॥ और कला त्रिगुनकी ओट । सतगुरु कला परम संतोष ॥ येही कला मन राखो थीर । जनम जनमकी मेटो पीर ॥ दस मास जननीको मारो बोझ । भगति बिना भये बनके रोझ ॥ साहब कवीर गुरु जीत लियो सार । पाये हम सतगुरु दीनदयाल ॥

शब्द १९३—माई मैं जनम जनम अहिवाती ॥ टे० ॥ अब हम रांड होवें ना कबहुँ, वर पायौ अविनाशी ॥ तुलसीकी माला

शब्दावली

(८३५)

रुच रुच पहिरों, कांचकी चुरिया लजाती ॥ काजर सिंदुर मनहि न आवै, द्वादश तिलक बनाती ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधू, अमरलोकको जाती ॥

शब्द १९४—नाचरे मन मेरा नट होय ॥ टे० ॥ ज्ञानके ढोल बजाव रैन दिन, शब्द सुने सब कोई । राहु केतु नवग्रह कपै, जम घर बंदन होई ॥ द्वादश तिलक बनावे बांस चढ़ि, जगते होरहु न्यारा । सहस कला होय नाच मन मेरे, रीझे साहब तेरा ॥ जो रीझे जगदीश जगतगुरु, दैहैं दान बुलाई । भरी सभामें चोला बगसे, फाट न कबहू जाई ॥ जो भवसागर कूद परोगे, कला न बदिहों तेरा । कहै कवीर सतोब्रत साधो, नौ निधि होवे चेरा ॥

शब्द १९५—भव भंजन गुन गाऊं, रमता राम रिझाऊं ॥ टे० ॥ तन कर घोडा मनकर चाबुक, सुरत लगाम लगाऊं ॥ पांच पचीस बखतरिया मारो, फिर मुजरेको आऊं ॥ ना मैं पूजों देवी देवा, ना मैं देवल बनवाऊं ॥ पांच मवासी इस नगरीमें, मान गुमान बहाऊं ॥ देवल जाते पत्थर पूजा, तीरथ भगती पाऊं ॥ इस कायामें कोटन तीरथ, जहवाँ बैठ अन्हवाऊं ॥ आगे आगे ओट दुलीचा, पीछे नौबत बाजा ॥ दस्तके ऊपर लाल बन्दूके, फिर बैरीको साजा ॥ लोभ मोहकी गरदन मारौं, ज्ञान कमान चढ़ाऊं ॥ कहै कवीर सुनौ भाइ साधू, बेद विमल जस गाऊं ॥

शब्द १९६—तेरा रोकनवाला कौन, सुरतसों आव चली ॥ लोकलाज कुलकी मरजादा, सिरतें डार अली ॥ टे० ॥ पटको भार मोह मायाको, सन्मुख डगर धरी ॥ काम क्रोध हंकार कल्पना, डुरमति दूर करी ॥ मन अभिमान दोऊ धर पटके, निरभै राह गही ॥ क्षमा शील संतोष धीरज धर, कर गहि ज्ञान छही ॥ अगल बगलकी झार मार सब, होय निहशंक चली ॥

(८३६)

कवीरपंथी—

पांच पचीस करे बस अपने, गहिलई ज्ञान गली॥ करत बिलास रहत संतनमें, आनंद प्रेम भरी ॥ सबर विवेक चुनरिया पहिरी, घरकी खबर करी॥ कपट किंवार खुले जब तनके, सतगुरु मिहर करी ॥ दया धरम हिरदय कर राखो, कर उपकार चली ॥ दया स्वरूप सकल जीवनपर, ज्ञान गुमान भरी॥ समझ विचार करो जिय अपने, कर सिंगार चली॥ भये हुलास मिलन जद पियको, फूली कमवल कली॥ दीपक ज्ञान धरो घट भीतर, जगत बिसार चली ॥ निरखत बदन मदन छवि लाजत, आनंद प्रेम भरी ॥ कहें कवीर मिली जद पियको, पिय हिय लाग रही ॥

शब्द १९७-अपने लाल मनाइले, सुन आतम प्यारी ॥ टे० ॥ पहिले पहरे रैनके, गुडियन संग साजे ॥ सो प्रीतम मन भावते, तेरे निकट बिराजे ॥ दूजे पहरे रैनके, कछु मरम न जाना ॥ जोबन मँहगे मोलके, तुम विषमें साना ॥ तीजे पहरे रैनके, तुम बहु बिध चूकी ॥ अंग न दियो सुजानको, तुम बहु बिध भूली ॥ चौथे पहरे रैनके, शशि जोत समानी ॥ कहें कवीर धर्मदाससों, सुंदरि पछतानी ॥

शब्द १९८-औगुन कहा निहारो स्वामी, ओर आपनी हेरो ॥ टे० ॥ होवे नहीं निवेरो तन सब, भरे कर्मके ढेरो ॥ वस्तु लई सो लई कृपानिधि, अब का लेकर फेरो ॥ कहि सुखलाल कहाया जगमें तेरो, तेरो तेरो ॥ वस्तु लई सो फेर न दीजे, लगे बातमें बंटा ॥ यह दुकान कोई फेर न आवै, उठ जैह यो टंटा ॥ ताते मुनो कृपानिधि स्वामी, साख राखिये हंटा ॥ अधम उधारन नाम टेरेके, लिख दीन्है है संटा ॥ जग जिव अंधे लखे न वाको, जो सब आप खुदी है ॥ वह अखंड सो व्यापे घट घट, परघट नहीं सुंदी है ॥ निरगुन सरगुन मास एकपै, जैसे बंदी सुंदी है ॥

शब्दावली

(८३७)

जगत जात औ आप गात सों, वह कछु बात जुदी है ॥ सतगुरु बिना कौन दरसावे, जाको सब घट तेजा ॥ सुर नर मुनि औतार आदि सब, वाही थानक रेजा ॥ सो नर समुझ उसीको गहना, जिसने जगमें भेजा ॥ गहिये अविचल खान पुरुषकी, सत्पुरुषकी सेजा ॥ गरभवास प्रतपाल साहेवा, तिसपै कपट गुठे है ॥ सुन वे सुमर उमर गुजरानी, बाला जवान बुठे है ॥ बिना बिवेक देख दिग अपने, जमकर बूथा सुदूट्ट है ॥ तिसपर नहीं सीखता अंधे, तुझको मूढ तुदूट्ट है ॥ निश दिन बिषै वासमें भूला, प्रभुकी खबर बिसारी ॥ औसर परे कहत है तिसपर, लेवेगा खबर हमारी ॥ माया हिरदै मोहकी फांसी, हांसी आवत भारी ॥ पहिरे अंग टाटकी चोलिया, कर नवाबसों यारी ॥ कंठी तिलक छाप उर धारे, बिषै वासना गौरै ॥ भगत कहाय जुगत ना जानी, परम धामकी लौरै ॥ ना प्रभु भजन ना गुरुकी सेवा, एको नाहीं भौरै ॥ फिरत लगावत ऐसे अंधे, अंडन मांझ बिजौरै ॥ वेद पुराना बांचना बूझा, प्रभुको भारत जुझा ॥ जहांसे सवे तिसे नहि जाना, भये आप कुछ कुछा ॥ सुर नर मुनि सब एक ठीकसे, ऐसी भूलनि भुछा ॥ या जग अंधा फूट मसीदी, मिले अंधेरें मुछा ॥ ऊंचे नीचे फिरे करमसे, कर्म कीचमें कुलबुछा ॥ खबर नहीं कुछ या कायाकी, है मायाके तुललुछा ॥ गहि निज नाम तजे नहि या जग, महाकालकी भुलभुल ॥ करत घैंसुवा फिरत बटोई जैसे अंधी बुलबुल ॥ माया जोर किया सबहीको, जपी तपी बहु भेखो ॥ कर बनवासा ऋषि डुरबासा, अजब तमाशा पेखो ॥ सुर नर मुनि औ पीर औलिया, नर निहारके देखो ॥ जगत ज्वालमें बरंत गांजसे, कह पूरनको लेखो ॥ सिरजनहार ताहि बिसराया, जग सिर भार लिया है ॥ उरझे बूथा जगतके ज्वाला, प्याला बिषै पिया है ॥

(८३८)

कबीरसंथी—

तो अब दुखस देख क्यों डरपे, जो पैराहि किया है॥ मूसर चोट ओट का भाई, उखरी मूंड दिया है॥ पांच तत्त्वका पिंजरा तेरा, दिन दिन होवै हाने॥ बाला ज्वान बृद्ध फिर होवै, सो क्या तू नहिं जानै॥ सुन समझाय कहत हों तिसपर, इसपर गरब गुमाने॥ माया महल जान ये धुवना, सुवना सीख सयाने॥ सतगुरु चरन सरन गडु बंदे, सीधी देही जाती॥ क्या लख भूला जात पांतमें, तात मात सुत नाती॥ ये सब ख्वार जगत है सपना, भोर होत ज्यों राती॥ माया रंग अंग ये काँचा, साँचा नाम संघाती॥ नर निहार ये कहाँ गये सब, माया सचन बटोरा॥ घोडा हाथी लाल जवाहिर, लाखन कोट करोरा॥ सो समुझाय कहत हों तिसपर, जीवन जगमें थोरा॥ जग जंजाल कालको फंदा, लागो प्रभुकी ओरा॥ इत जग लाज उते जिय कारज, दुई दुबीचा मूवा॥ यह अनिष्ट निज इष्ट मिलतही, सिष्ट उठाव न हूवा॥ पीछे भौजल बिरह भयानक, आगे दीसे हूवा॥ तिसपै नहीं सूझता सुझपै, तुजपै आशिक हूवा॥ श्रीगुरु सत्तनामका प्याला, भरिकै घूंट घुटका॥ काम कोध मद मोह भार शिर, ये भी डार पटकका॥ जो कुछ हतो कालको लशकर, लख निज नाम सटकका॥ सुख-लालदास साकटते कोरे, तोरे खूब घटकका॥ काल कराल दुख है भारी, व्यापै राजा परजा॥ देखतही सुख सूख जायगा, भूल जायगा तरजा॥ इंद्री फिरे लगाये अनुवाँ, मनुवाँ नेक न बरजा॥ उस दिन कहा करेगा बंदे, जिस दिन जम शिर गरजा॥

शब्द १९९-अछा निरंजन बनमें, कोई उलट समाना तनमें॥ टे०॥ का पहाड़पर धुनी लगाता, जिसकी भसम चढ़ाता है॥ अंचला कोपीन कछू न वाके, सेवा दिगंबर कराता है॥ तन कर कूंडी मन कर घोटा, ज्ञानकी गुदरी लगाता है॥ पांच पचीसों

शब्दावली

(८३९)

घटके भीतर, जिनहूँको भर भर पियाता है॥ तत्त्वकी रोटी सबते मोटी, तेहिते पिंड चलाता है॥ गंग जमुनके निर्मल नीरा, ठाकुर भोग लगाता है ॥ कहै कवीर सुनो भाई साधो, भूमंडल विचलाता है ॥

शब्द २००-नैनन आगे ख्याल घनेरा॥ जा कारन जग भरमत डोलै, सो साहब ढिग लेत बसेरा ॥ टे० ॥ पूर रहो असमान धरनलौं, जित देखो तित साहब मेरा ॥ लखत बने कछु कहत न आवे, जाने दिल बिच महरम हेरा ॥ अर्ध उर्ध बिच मनुवां राचे, का संध्या का रैन सबेरा ॥ माला एक दर्द मोहि सतगुरु, कहै कवीर बिनहीं कर फेरा ॥

शब्द २०१-गगनमें अवाज होती झीनी। कोई सुनता है गुरु-ज्ञानी ॥ टे० ॥ पहिले आया नाद बिंदसे, पीछे जमाया पानी ॥ सब घट पूरन पूर रहा है, अलख पुरुष निरबानी ॥ वहाँसे आया पटा लिखाया, जगमें कछु न आनी ॥ अमृत छोड़ बिषैरस चाखे, उलटा फांस फँसानी ॥ राज करते राजा जैहैं, रूप धरती रानी ॥ वेद पढंते पंडित जैहैं, जैहैं सुनिवर ज्ञानी ॥ सोहं सोहं बाजा बाजे, त्रिकुटी जाय समानी ॥ इंगला पिंगला बीचहिं छोड़े, सुन्न धजा फहरानी ॥ दीद पदीद न जरा देखो, है यह अमर निशानी ॥ कहै कवीर सुनो भाई साधो, यही आदकी बानी ॥

शब्द २०२-प्रीतम आपुहीमें पायो ॥ जनम जनमकी मिटी कल्पना, पूरे गुरु लखायो ॥ टे० ॥ जैसे कुँवर मन बिसर गई थी, अभरन कहाँ गँवायो ॥ एक सखीने बताय दिये तब, मनको तिमर नशायो ॥ जो युवती सपने सुत दूँदत, बालक कहाँ गमायो ॥ जाग परी जेहूँको तेहूँ, ना कहुँ गयो न आयो ॥ मृगा पास बसे कस्तूरी, दूँदत बन बन धायो ॥ नासा स्वाद परो जब वाके, फिर

(८४०)

कवीरपंथी—

आपुन पहुँ लायो॥ कहैं कवीर मगन भये मनुवाँ, ज्यों गूंगा गुड खायो ॥ वाके स्वाद कहै अब कासों, मनही मन मुसकायो ॥

शब्द २०३ सतगुरु शब्द है अगम अगोचर, रहन गहन विन लख न परे ॥ टे० ॥ अनहद तार गगनमें बाजे, विन समुझै कछु लख न परे ॥ सुरत समेट धरो घट भीतर, सहजे सरवन अवाज परे ॥ उठत तरंग नाना विध बानी, भिन्न २ ज्ञानकार करे ॥ सुर गंभीर राग अतुरागी, चितदे सुनै ताको काज सरे ॥ सुन अनहद मनको बस करले, निरख परख निरधार करे ॥ सुन्न सिखर छाजेके ऊपर, मगन हुवा जम काह करे ॥ आदि अघर अस्थान पुरुषको, जहां वह बैठ कलोल करे ॥ सदा समीप रहत समर्थके, हंस हिरंमर चँवर ठरे ॥ छबि निरखो समर्थकी मूरत, कोट भान परकाश करे ॥ कहैं कवीर निज बानी दरसे, जब सतगुरु दिव्य दिष्टि करे ॥

शब्द २०४-नाम बिना धिग धिग नर नारी । तुम कहैं आय कियो संसारी ॥ टे० ॥ धिग वह रसना धिग वह ज्ञाना । आतम राम नहीं पहिचाना ॥ गरभ मुची मुच भई किन वंझा । सूकर स्वान फिरे गुलमुंझा ॥ जेहि कुल पुत्र ना भक्ति विचारी । बिधवा काहे न भई वह नारी ॥ गनिका पुत्र पिता कासों कहई । विन गुरु चेला ज्ञान न लहई ॥ बिधवा नारी करे सिंगारा । शोभा न पावे विन भरतारा ॥ राज बिना कैसो रजपूता । ज्ञान बिना कैसो अवधूता ॥ कहैं कवीर हम कहत न डरहीं । अंधे ना सूझैं तो हम का करहीं ॥

शब्द २०५-मेहदी-देवराके पिछवार रोचन, मेहदी हम भई मोरे लाल ॥ टे० ॥ या काया नगर मंझार, माया रूप बजार है मोरे लाल ॥ काम क्रोध मद लोभ तृष्णा, एक अनुप है मोरे लाल ॥

शब्दावली

(८४१)

तृष्णाको सब कोई लेय दया धरम नहिं चीन्हें मोरे लाल॥ या मनुवां है मुगध गँवार ओछी संगत लेरहो मोरे लाल॥ पांच पचीसको खेल निरगुन, काहु न चीन्हे मोरे लाल॥ या त्रिकुटी सोहंगम नार, सोहे सोहे होत है मोरे लाल॥ कहे कवीर बिचार संतन, पार उतारो मोरे लाल॥

शब्द २०६-पावस रिनु जबही जानवी आई॥ टे० ॥ जब तेरी निज दसा पलटी है, दुरिहै नहीं दुराई॥ खेत कुखेत वंजर औ भाटो, बरन भेद मिटजाई॥ जब या तनकी तपन बुझेहै, गगन गरजबरसाई॥ कहे कवीर रविउला ढांकिये, नदिया बार अघाई॥

शब्द २०७-गुरु दीजो दस दीदार, जामैं मन मगन रहे॥ टे० ॥ काहेके डंडिया करो, काहेके अजगर खंभ । तन तरवर डंडिया करो, मन कर अजगर खंभ॥ काह छवाऊं गुरुके झार झरोखा, काह छवाऊं चौपार । पानन छवाऊं गुरुके झार झरोखा, फूलन छवाऊं चौपार॥ बाहरसे गुरु भीतर आये, जगमग जोत अपार । धरम किवरिया खोलो मेरे सतगुरु, हंसा ठाढे द्वार॥ प्राननाथ एक बानी बोले, छत्रशाल बलिहार॥ ❁

शब्द २०८-जियरा जायगा हम जानी॥ टेक॥ पांच तत्त्वके पींजरामैं, जामैं वस्तु बिरानी॥ लोभ लहर बिच आयके, बूड मरे बिन पानी॥ तन भी जैहै मन भी जैहै, जैहै मखमल खासा॥ लाख टकाकी जिदगी जैहै, एक दिन जंगल बासा॥ दस भी जैहै बीस भी जैहै, जैहै वरस पचासा॥ बीसा सौ कोई बिरला रहिहै, फिर मरनेकी आशा॥ राज करंते राजा जैहै, रूप धरंती रानी॥ वेद पढंते ब्रह्मा जैहैं अरु जैहैं अभिमानी॥ चंदा जैहैं सूरज जैहैं, जैहैं पवन औ पानी॥ कहे कवीर ते संत न जैहैं, जिनकी मत ठहरानी॥

(८४२)

कवीरपंथी-

शब्द २०९-मेरा हो प्यारे सतगुरु साँइयां॥टेक॥ बह्यो जात थो भौसागरमें, गह लीन्ही प्रभु बहियां ॥ अगम निगम जाको पार न पावे, अगम पंथ दरसहियां ॥ सबद सरूप सो जिन रित मानी, ते भौजल निधि पहियां ॥ संतदास सो सतगुरु महिमा, और जतन नहिं लहियां ॥ ✽

शब्द २१०-दिन दिन जोबन जात हैं, पियसो मिल नार॥टेक॥ दिनते रैन रैनते रजनी, घरि घरि पल छिन होत अवार ॥ मिलना होय तो अबही मिलले, तन छुटे कछु वार न पार ॥ माझ धार नावरिया अटकी, पल ना लगे इहां कहधो बिचार ॥ जाना तुझे पारको चहिये, इहां खेवट सबही मतवार ॥ तेरो पिया तोहीमें दरसे, ज्ञान रतन ले सांचे ढार ॥ काशीराम काम साहब सो, सतगुरु खेड़ लगावौ पार ॥ ✽

शब्द २११-जोगी मन ना रंगावे, रंगावे कपडा॥टे०॥ तिल तिल जोर सरी बनाये, सिरजनहार नहीं पकरा ॥ या ठिकराके मरम न जाने, भटकत फिरे जंगल सेहरा ॥ सब सुख छाड़ जंगलमें बैठे, काम जराय भये हिजरा ॥ आसन मार डिभ धर बैठे, दाठी रखाय भये बकरा ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, साहेब छोड़ पुजे पथरा ॥

शब्द २१२-जोगी जन जागत रहिये भाई ॥ जागत रहिये चौकस करिये, चोर मूस ना पाई॥टे०॥ तस्कर तरन रहन मन चित कर, कंद्रप लेत चुराई ॥ चितके चले मन चले मुनिके, तनके चले व्रत जाई ॥ रस कस लेत चुराय नागिनि, बुध बल करके खाई ॥ ऊषहिते छोई कर डारी, नेकु न रहे मिठाई ॥ शृंगीऋषि बन भीतर लूटे, लेगइ संग लुगाई ॥ घृत पावक नर- नार संग रहु, विरला जन ठहराई ॥ जोगी जती तपी सब लूटे,

शब्दावली

(८४३)

तिहुपुर फिरी दोहाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, मारत ढोल बजाई ॥

शब्द २१३-भजन कब करिहौ जनम सिरान ॥ टे० ॥ गरभ बासमें भगति कबूले, बाहर आयके गये खुलान ॥ बालापनमें खोय गँवाये, तरुनामें अभिमान गुमान ॥ वृद्ध भये तन थाकन लागे, शिर धुनि धुनि मनुवाँ पछतान ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जमके हाथमें गये विकान ॥

शब्द २१४-भजन दिन रे बीता जात ॥ टेक ॥ करले भजन भलो तन पायो, भजन बिना सुख पाया किन रे ॥ उपजत बिनसत जुग चारों गये, बेद विचारत गये गन सुनि रे ॥ पलमाँही परले हो जैहै, बिनसत लगे घरी ना छिन रे ॥ कहे कवीर भजन कर वाके, पानीसे पिंड सँवारा जिन रे ॥

शब्द २१५-भजन कर निशि दिन टूटे न तार ॥ टेक ॥ एक ब्रह्मका सकल पसारा, घरि घरि पल पल लिजे संभार ॥ या मन मिलिया साधन सो रे, सोहैं शब्दकी लगी लगार ॥ निश दिन भजन करो सतगुरुके, काया मधे है ततसार ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधो, बिन सतगुरु ना होय उबार ॥

शब्द २१६-भजन कर जगमें जीवन सार ॥ टेक ॥ नर देहीको गरब न करिये, जर-बर होय छिनमें छार ॥ पाँचों मार पचीसों बस कर, जमराजाकी चोट संभार ॥ नदिया गहरी नाव पुरानी, बिन सतगुरु कैसे उतरे पार ॥ कहैं कवीर सतगुरुके भजन कर, भौसागरसे उतरो पार ॥

शब्द २१७-भजनको भाईरे ऐसो तन पायके ॥ टे० ॥ नाहिं रहै लंकापति रावन, नाहिं रहै दुर्योधन राई रे ॥ मात पिता सुत भाई बंद ठाढे, आइ जमराज पकर ले जाई रे ॥ लाल खंभ पर

(८४४)

कवीरपंथी—

देत ताड़ना, बिन सतगुरु को होत सहाई रे॥ धरमदासके अजर गोसाई, नाम कवीर कहो गोहराई रे ॥ ✽

शब्द २१८—जनम यह देखा देखी जात॥ टेक॥ ज्यों अंजुरीको नीर घटत है, ज्यों तरवरसे टूटै पात॥ चार पहर धंधेमें खोये, रैन गँवाये सोवत खात॥ जब जमराजा आन गहेगा, पकर जीभ तोहि मारे लात॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, कहालो कहों तेरी उतपात॥

शब्द २१९—तकसीर भई है कैसे, मैं पियाको मनाऊं॥ टे०॥ पांच पचीस मोहि रोकत टोकत, तीनों गुनसे बचाऊं॥ लिख लिख पतियां भेजों अमरपुर, मरजी होय तो आऊं॥ दीनदयाल दया कर जन पर, साहेब दरशन पाऊं॥ धरमदासने पाये कवीर गुरु, करमचूक बगसाऊं॥ ✽

शब्द २२०—कैसे जाऊं महलमें अटपट अगम चढाई॥ टेक॥ दश दरवाजा बने महलके, सात सिंधु सोरा खाई॥ चांद सूर दोय इत उत लागे, सुखमन सेज बिछाई॥ सतगुरु बहियां नाम- सनेही, बांह पकरि ले जाई॥ धरमदासने पाय कवीर गुरु, सबद सुरत मिल जाई॥

शब्द २२१—जो मैं साहब पाऊं, नेनोदी मांझ बसाऊं॥ टे०॥ नेनोदी मांझ बसे मोरे प्रीतम, उरसे पलक न लाऊं॥ एकटक ठाठी चरण निहारों, पलपल चौरं डुराऊं॥ त्रिकुटी महलमें बने झरोखा, दीदारोंदी सेज बिछाऊं॥ रोम रोम पिया संग राची, आनंद मंगल गाऊं॥ बिछूरे प्रीतम जो मैं पाऊं, तब स्यानी होय जाऊं॥ धरमदासके अरज गोसाई, सिंधुमें बूंद समाऊं॥ ✽

शब्द २२२—गुरु मोरे बहियाँ जनि छाड़ो पकरके॥ टेक॥ बहे जात थी भौसागरमें, काठ लियो जिन अपनो करके॥ ध्रुव

शब्दावली

(८४५)

प्रहलाद बचे करनीसे, तिनहुको लूटे छलबल करके॥ शृंगीऋषि पाराशर लूटे, शंकर लूटे बन बन करके ॥ साहेब कवीर मिले गुरु पूरे, रख लेहु साहब आपन करके ॥ ✽

शब्द २२३-गुरु दरियाव नहानाहो, जाते डुरमत भागे॥ टे०॥ गुरु दरियाव सदा जल निरमल, पैठत उपजत ज्ञाना हो॥ जौलग गुरु दरियाव न पावे, तौ लग फिरत भुलाना हो॥ कोटिन तीरथ गुरुके चरनन, श्रीमुख आप बखाना हो॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, अजर अमर घर जाना हो ॥

शब्द २२४-दिल मगन हुवा जब को बोले ॥ टेक॥ हंसा पाये मान सरोवर, ताल तलैयाको डोले ॥ तेरा साहब है तुजहीमें, बाहर नैनाको खोले ॥ सुरत कलारी मन मतवाली, प्याला पीवे अनतौले ॥ धर्मदासके अरज गोसाईं, साहेब पाये तन बोले ॥ ✽

शब्द २२५-धुन सुनके मनुवा मगन हुवा ॥ लागसमाधि रहो गुरु चरनन, अंदरका दुख दूर हुवा ॥ सार सबदकी डोरी लागीं, ता चढ़ हंसा पार हुवा ॥ सुन्न सिखरपै झालर झलके, झरत अमी रस प्रेम चुवा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, चाख चाख अलमस्त हुवा ॥

शब्द २२६-गावत कहां गायबो सुन रे ॥ टे० ॥ बाजत ताल पखावज बीना, निरतत अगम निगम नहीं गन रे ॥ अपने कहे कछु काम न आवे, मानत नहीं अपरबल मन रे ॥ सुन चातुर यह बचन हमारा, बिन सतगुरु लख पाया किन रे ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधू, जब लख परी अगमकी धुन रे ॥

शब्द २२७-काया गढ़ जीतोर भाई, तेरो काल अवध टर जाई ॥ टेक ॥ भरमकोट चहुँ ओर फिराये, माया ख्याल रचाई ॥ कनककामिनी फंदा रोपे, जन राखे उरझाई ॥ पचीस जाल जाके

(८४६)

कवीरपंथी—

निश्चदिन व्यापे, काम क्रोध दोय भाई ॥ लालच लोभ खडे दरवाजे, मोह करे ठकुराई ॥ पांच मोरचा गढके भीतर, इन्हें नाँच जो जाई ॥ आशा मनसा तृष्णा कहिये, त्रिगुन बंधो है खाई ॥ ज्ञानके घोडा ध्यानके पारख, जुगतकी जीन बंधाई ॥ सतसुक्ति दोउ सिरके ऊपर, विवेक लगाम लगाई ॥ चेतन सुरत चढी ताजीपर, सतगुरु सांग गहाई ॥ मूल कमल सो दौर करी है, कुमतिको मार भगाई ॥ मूल कमलपर डेरा डारे, गुरुको शीश नवाई ॥ छऊ कमल एक सुरमें बेघे, चढे गगन गढ जाई ॥ सात कमल त्रिकुटीके ऊपर, तहवाँ पहुँचे जाई ॥ जोत निरंजन तहाँ विराजे, वेद नेति कहि गाई ॥ आवागमन वेद ना जाने, कुरान रहे ठहराई ॥ आवे न जाय मरे ना जीवे, ताकी खबर न पाई ॥ बंकनालकी घाटी कहिये, तहाँ न पग ठहराई ॥ सोहँ सुर लागे जहाँ दोहरे, अजपा नाम सहाई ॥ कोटि चंद्र सूर तारागन, छत्रकि छाँह छहाई ॥ जोजन एकके पैले कहिये, पुरुष विदेह रहाई ॥ स्वेत चंदेवा स्वेत सिंहासन, स्वेत चौर फहराई ॥ स्वेते फूल फूले निशिबासर, शोभा बरनि न जाई ॥ द्वादश ऊपर मुन्ना फेरे, मन पौना थक जाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, अमर लोकको पाई ॥

शब्द २२८-गगन गढ जीतो रे भाई जहाँ संत करें बादशाही ॥ टेक ॥ कच्चे कोट पके दरवाजा, गहरी जाकी खाई ॥ और मोरचा लगे बत्तीसों, उनमुन तोप झुकाई ॥ तनके बंदुक मनके जामा, प्रीतका प्याला पियाई ॥ अघर छात कुदरतका बंगला, गुरु बिन लियो न जाई ॥ गुरु बिन फौज किलेमें बाढी, अहँकार ठहनाई ॥ नेम धरम ले चल भाई गौरा, छिनमें देत दहाई ॥ उलटी

शब्दावली

(८४७)

नेह गगनको दौरी, भली बनी चतुराई । साहेब कवीर मिले गुरु पूरे, अदले अदल चलाई ॥

शब्द २२९-गगन गढ गेब निशान गड़े ॥ टे० ॥ गाडी मेख सेष शिर ऊपर, डेरा अदल खडे । चन्द्रभान एक तंबू ताने, रवि शशि जोत अडे ॥ संत सिपाही करत चाकरी, सो दरबार लडे । कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, शब्दमें सुरति मडे ॥ ❁

शब्द २३०-मिसलपर जाना होगा ठिकाना ॥ टे० ॥ आया प्यादा तलब तजीरा, जल्दी होगा जाना । माल तुम्हारा जपत हुवा है, अदली देत विराना ॥ जहाँके माया तहाँ लुटाये, बचे न एकौ दाना । साहेब तुम्हारा खफा हुवा है, टोटा परा खजाना ॥ मुंशी दरोगा पकर मँगावे, भगती होगा भरना ॥ जो भगतीमें चक्र परेगा, डार देगा बंदखाना । कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, या पद है निरवाना ॥ जब मोहर पर छाप चढेगी, छूट जायगा बंदखाना ॥ ❁

शब्द २३१-सत मत खेल ले मैदाना ॥ शब्द सिरोही बांध कमरसे, त्रिगुन तीर कमाना ॥ टे० ॥ कडाबीन कमरसे बांधे, माया मोह निशाना ॥ फाँका फरी ज्ञानका, गदका बांध बनेटी बाना ॥ सन्मुख जाय कालसो लड़ई, सोई सूर मरदाना ॥ रंजक नाम ज्ञानका पेटी, बेद बहूद खजाना ॥ तोप धर्मका भर भर मारे, लूटत मुलक विराना ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधु, द्वालीबंदे मस्ताना । सतलोकमें डेरा दीन्हा, सतगुरु हनत निशाना ॥

शब्द २३२-अब तू खबरदार रहो भाई ॥ टे० ॥ सतगुरु दीन्हा माल खजाना, राखौ हिये लगाई ॥ पाव रती भर घटन न पावे, दिन दिन बढ़त सवाई ॥ तन बंदूक सुरतके सिंधरो, ज्ञान गजा ठहराई ॥ प्रेम पलीता हरदम चमके, कर पर राखु चढाई ॥ क्षमा

(८४८)

कवीरपंथी—

शीलके बखतर पहिरे, जुगतके लांग चढाई ॥ नाम टोष माथेपे धरके, जौ भर अनी न आई ॥ पहरेदार सिपाही सांचे, वो नहिं सोवे भाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, छिनपल देत जगाई ॥ ❁

शब्द २३३—सतगुरु निरबानी निरबानी, जाके सुक्ति भरत है पानी ॥ टे० ॥ अष्ट सिद्ध नौ निध करत मजूरी, और विधाता रानी ॥ चंद सूर दोउ बरे मसाले, सुरत गगन ठहरानी ॥ अर्थ धर्म और काम मोक्ष फल, बैल फिरे ज्यों घानी ॥ तहवाँ है एक अगोचर, निगम नेति ना जानी ॥ चार वेद नौ व्याकरण कहिये, अष्टादशो पुरानी ॥ सत्य भगति विन चार पदार्थ, काग विष्ट सम जानी ॥ अवरन वरन रूप सब वाको, गरज गगन चहरानी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, अजरा अमर निशानी ॥

शब्द २३४—सतगुरु अबिनाशी अबिनाशी, जाके सुक्ति रहत है दासी ॥ टे० ॥ ब्रह्मा जाको पार न पावे, निरंजन करे खवासी ॥ सेष सहस्र सुख निशि दिन गावें, सो भी पार न पासी ॥ शंकर जाको ध्यान धरत हैं, कहिये जोग उपासी ॥ चार वेद जाके भेद न जाने, खोज खोज मरजासी ॥ ओंकारमें भरमत डोले, विष्णु फिरे उदासी ॥ नाम पदार्थ हाथ न आवे, परे कालकी फांसी ॥ अजर अमर वे परम पुरुष हैं, कहिये फूल सुबासी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, अमरलोकके बासी ॥

शब्द २३५—सतगुरु आदि संदेसी आये ॥ सोरा असंख जुग वीत गयो है, भेद न काहू पाये ॥ टे० ॥ दुनियाँ रही खुलाय रूबाबमें, सोवत नींद जगाये ॥ दया भाव औं नाम पान ले हंसन पार लगाये ॥ काशीमें सतगुरु प्रगट भये हैं, नाम कवीर कहाये ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जीवन फंद बुढाये ॥ ❁

शब्दावली

(८४९)

शब्द २३६-जपो मन सतगुरु सत् कवीर ॥ टेक ॥ भौसागरसे जीव उबारै, जमके कागद चीर ॥ साह दमोदर बुडत बचावे, रतनागरके तीर ॥ ईंद्रमतीको लोक पठाये, काटे जमके पीर ॥ साहब कवीर मिले गुरु पूरे, देखत मन भौ थीर ॥

शब्द २३७-सतगुरु ज्ञानकि गांसी मारा । तीर न मारा तरवार न मारा, शब्दके मारा न्यारा ॥ टेक ॥ आंखभी अंधा कानभी बहरा, पांव अपंग कर डारा ॥ औषद मूल कछु ना लागे, का करे वैद विचारा ॥ कच्चा कोट पक्का दरवाजा, घायल आन पुकारा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, तीर निकसगो पारा ॥

शब्द २३८-हमारे मन बस गये साहब कवीर ॥ टेक ॥ काशीमें गुरु प्रगट भये हैं, गुनके गहिर गंभीर ॥ काशी तज मगहरमें आये, दोई दीनके पीर ॥ एक दिन साहेब बेन बजाये, कालिंदीके तीर ॥ सुर नर सुनि सब छकित भये हैं, छक गये जमुना नीर ॥ कोई गाडे कोई अगिन जरावे, कोई न धरना थीर ॥ चार दागसे न्यारा साहब, बिनसत नाहिं शरीर ॥ जगन्नाथके मंदिर थापे, हट गये सागर नीर ॥ दास मलूक सलूक कहत है, खोजो खसम कवीर ॥ *

शब्द २३९-पढो मन ओंनामासिंध ॥ टेक ॥ ओंकारते सब जग सिरजा, है वाहीका रंग ॥ वो तो पुरुष सबनसों न्यारा, कर वाहीका संग ॥ नाम निरंजन नैना माते, नाना रूप धरंग ॥ निरंकार निरगुन अविनाशी, निरखत सबके अंग ॥ माया मोह मगन होय नाचे, माते मत्त मतंग ॥ माटीके तन थिर ना रहता, मन मायाके संग ॥ शील सुभाव दयाके दरपन, सदा सम्हारो अंग ॥ साधुके बचन सत् कर माने, सिरजनवाला संग ॥ धत्ता ध्यान धरो दिल अंदर, लिख ले नाम अनंद ॥ गोरख जोगी मिले सतसंगी, नाम कवीर सोहंग ॥ *