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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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(८४८)

कवीरपंथी—

शीलके बखतर पहिरे, जुगतके लांग चढाई ॥ नाम टोष माथेपे धरके, जौ भर अनी न आई ॥ पहरेदार सिपाही सांचे, वो नहिं सोवे भाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, छिनपल देत जगाई ॥ ❁

शब्द २३३—सतगुरु निरबानी निरबानी, जाके सुक्ति भरत है पानी ॥ टे० ॥ अष्ट सिद्ध नौ निध करत मजूरी, और विधाता रानी ॥ चंद सूर दोउ बरे मसाले, सुरत गगन ठहरानी ॥ अर्थ धर्म और काम मोक्ष फल, बैल फिरे ज्यों घानी ॥ तहवाँ है एक अगोचर, निगम नेति ना जानी ॥ चार वेद नौ व्याकरण कहिये, अष्टादशो पुरानी ॥ सत्य भगति विन चार पदार्थ, काग विष्ट सम जानी ॥ अवरन वरन रूप सब वाको, गरज गगन चहरानी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, अजरा अमर निशानी ॥

शब्द २३४—सतगुरु अबिनाशी अबिनाशी, जाके सुक्ति रहत है दासी ॥ टे० ॥ ब्रह्मा जाको पार न पावे, निरंजन करे खवासी ॥ सेष सहस्र सुख निशि दिन गावें, सो भी पार न पासी ॥ शंकर जाको ध्यान धरत हैं, कहिये जोग उपासी ॥ चार वेद जाके भेद न जाने, खोज खोज मरजासी ॥ ओंकारमें भरमत डोले, विष्णु फिरे उदासी ॥ नाम पदार्थ हाथ न आवे, परे कालकी फांसी ॥ अजर अमर वे परम पुरुष हैं, कहिये फूल सुबासी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, अमरलोकके बासी ॥

शब्द २३५—सतगुरु आदि संदेसी आये ॥ सोरा असंख जुग वीत गयो है, भेद न काहू पाये ॥ टे० ॥ दुनियाँ रही खुलाय रूबाबमें, सोवत नींद जगाये ॥ दया भाव औं नाम पान ले हंसन पार लगाये ॥ काशीमें सतगुरु प्रगट भये हैं, नाम कवीर कहाये ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जीवन फंद बुढाये ॥ ❁