कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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नेह गगनको दौरी, भली बनी चतुराई । साहेब कवीर मिले गुरु पूरे, अदले अदल चलाई ॥
शब्द २२९-गगन गढ गेब निशान गड़े ॥ टे० ॥ गाडी मेख सेष शिर ऊपर, डेरा अदल खडे । चन्द्रभान एक तंबू ताने, रवि शशि जोत अडे ॥ संत सिपाही करत चाकरी, सो दरबार लडे । कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, शब्दमें सुरति मडे ॥ ❁
शब्द २३०-मिसलपर जाना होगा ठिकाना ॥ टे० ॥ आया प्यादा तलब तजीरा, जल्दी होगा जाना । माल तुम्हारा जपत हुवा है, अदली देत विराना ॥ जहाँके माया तहाँ लुटाये, बचे न एकौ दाना । साहेब तुम्हारा खफा हुवा है, टोटा परा खजाना ॥ मुंशी दरोगा पकर मँगावे, भगती होगा भरना ॥ जो भगतीमें चक्र परेगा, डार देगा बंदखाना । कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, या पद है निरवाना ॥ जब मोहर पर छाप चढेगी, छूट जायगा बंदखाना ॥ ❁
शब्द २३१-सत मत खेल ले मैदाना ॥ शब्द सिरोही बांध कमरसे, त्रिगुन तीर कमाना ॥ टे० ॥ कडाबीन कमरसे बांधे, माया मोह निशाना ॥ फाँका फरी ज्ञानका, गदका बांध बनेटी बाना ॥ सन्मुख जाय कालसो लड़ई, सोई सूर मरदाना ॥ रंजक नाम ज्ञानका पेटी, बेद बहूद खजाना ॥ तोप धर्मका भर भर मारे, लूटत मुलक विराना ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधु, द्वालीबंदे मस्ताना । सतलोकमें डेरा दीन्हा, सतगुरु हनत निशाना ॥
शब्द २३२-अब तू खबरदार रहो भाई ॥ टे० ॥ सतगुरु दीन्हा माल खजाना, राखौ हिये लगाई ॥ पाव रती भर घटन न पावे, दिन दिन बढ़त सवाई ॥ तन बंदूक सुरतके सिंधरो, ज्ञान गजा ठहराई ॥ प्रेम पलीता हरदम चमके, कर पर राखु चढाई ॥ क्षमा