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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(८४६)

कवीरपंथी—

निश्चदिन व्यापे, काम क्रोध दोय भाई ॥ लालच लोभ खडे दरवाजे, मोह करे ठकुराई ॥ पांच मोरचा गढके भीतर, इन्हें नाँच जो जाई ॥ आशा मनसा तृष्णा कहिये, त्रिगुन बंधो है खाई ॥ ज्ञानके घोडा ध्यानके पारख, जुगतकी जीन बंधाई ॥ सतसुक्ति दोउ सिरके ऊपर, विवेक लगाम लगाई ॥ चेतन सुरत चढी ताजीपर, सतगुरु सांग गहाई ॥ मूल कमल सो दौर करी है, कुमतिको मार भगाई ॥ मूल कमलपर डेरा डारे, गुरुको शीश नवाई ॥ छऊ कमल एक सुरमें बेघे, चढे गगन गढ जाई ॥ सात कमल त्रिकुटीके ऊपर, तहवाँ पहुँचे जाई ॥ जोत निरंजन तहाँ विराजे, वेद नेति कहि गाई ॥ आवागमन वेद ना जाने, कुरान रहे ठहराई ॥ आवे न जाय मरे ना जीवे, ताकी खबर न पाई ॥ बंकनालकी घाटी कहिये, तहाँ न पग ठहराई ॥ सोहँ सुर लागे जहाँ दोहरे, अजपा नाम सहाई ॥ कोटि चंद्र सूर तारागन, छत्रकि छाँह छहाई ॥ जोजन एकके पैले कहिये, पुरुष विदेह रहाई ॥ स्वेत चंदेवा स्वेत सिंहासन, स्वेत चौर फहराई ॥ स्वेते फूल फूले निशिबासर, शोभा बरनि न जाई ॥ द्वादश ऊपर मुन्ना फेरे, मन पौना थक जाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, अमर लोकको पाई ॥

शब्द २२८-गगन गढ जीतो रे भाई जहाँ संत करें बादशाही ॥ टेक ॥ कच्चे कोट पके दरवाजा, गहरी जाकी खाई ॥ और मोरचा लगे बत्तीसों, उनमुन तोप झुकाई ॥ तनके बंदुक मनके जामा, प्रीतका प्याला पियाई ॥ अघर छात कुदरतका बंगला, गुरु बिन लियो न जाई ॥ गुरु बिन फौज किलेमें बाढी, अहँकार ठहनाई ॥ नेम धरम ले चल भाई गौरा, छिनमें देत दहाई ॥ उलटी