कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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प्रहलाद बचे करनीसे, तिनहुको लूटे छलबल करके॥ शृंगीऋषि पाराशर लूटे, शंकर लूटे बन बन करके ॥ साहेब कवीर मिले गुरु पूरे, रख लेहु साहब आपन करके ॥ ✽
शब्द २२३-गुरु दरियाव नहानाहो, जाते डुरमत भागे॥ टे०॥ गुरु दरियाव सदा जल निरमल, पैठत उपजत ज्ञाना हो॥ जौलग गुरु दरियाव न पावे, तौ लग फिरत भुलाना हो॥ कोटिन तीरथ गुरुके चरनन, श्रीमुख आप बखाना हो॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, अजर अमर घर जाना हो ॥
शब्द २२४-दिल मगन हुवा जब को बोले ॥ टेक॥ हंसा पाये मान सरोवर, ताल तलैयाको डोले ॥ तेरा साहब है तुजहीमें, बाहर नैनाको खोले ॥ सुरत कलारी मन मतवाली, प्याला पीवे अनतौले ॥ धर्मदासके अरज गोसाईं, साहेब पाये तन बोले ॥ ✽
शब्द २२५-धुन सुनके मनुवा मगन हुवा ॥ लागसमाधि रहो गुरु चरनन, अंदरका दुख दूर हुवा ॥ सार सबदकी डोरी लागीं, ता चढ़ हंसा पार हुवा ॥ सुन्न सिखरपै झालर झलके, झरत अमी रस प्रेम चुवा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, चाख चाख अलमस्त हुवा ॥
शब्द २२६-गावत कहां गायबो सुन रे ॥ टे० ॥ बाजत ताल पखावज बीना, निरतत अगम निगम नहीं गन रे ॥ अपने कहे कछु काम न आवे, मानत नहीं अपरबल मन रे ॥ सुन चातुर यह बचन हमारा, बिन सतगुरु लख पाया किन रे ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधू, जब लख परी अगमकी धुन रे ॥
शब्द २२७-काया गढ़ जीतोर भाई, तेरो काल अवध टर जाई ॥ टेक ॥ भरमकोट चहुँ ओर फिराये, माया ख्याल रचाई ॥ कनककामिनी फंदा रोपे, जन राखे उरझाई ॥ पचीस जाल जाके