सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 859, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 859

शब्दावली

(८४५)

प्रहलाद बचे करनीसे, तिनहुको लूटे छलबल करके॥ शृंगीऋषि पाराशर लूटे, शंकर लूटे बन बन करके ॥ साहेब कवीर मिले गुरु पूरे, रख लेहु साहब आपन करके ॥ ✽

शब्द २२३-गुरु दरियाव नहानाहो, जाते डुरमत भागे॥ टे०॥ गुरु दरियाव सदा जल निरमल, पैठत उपजत ज्ञाना हो॥ जौलग गुरु दरियाव न पावे, तौ लग फिरत भुलाना हो॥ कोटिन तीरथ गुरुके चरनन, श्रीमुख आप बखाना हो॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, अजर अमर घर जाना हो ॥

शब्द २२४-दिल मगन हुवा जब को बोले ॥ टेक॥ हंसा पाये मान सरोवर, ताल तलैयाको डोले ॥ तेरा साहब है तुजहीमें, बाहर नैनाको खोले ॥ सुरत कलारी मन मतवाली, प्याला पीवे अनतौले ॥ धर्मदासके अरज गोसाईं, साहेब पाये तन बोले ॥ ✽

शब्द २२५-धुन सुनके मनुवा मगन हुवा ॥ लागसमाधि रहो गुरु चरनन, अंदरका दुख दूर हुवा ॥ सार सबदकी डोरी लागीं, ता चढ़ हंसा पार हुवा ॥ सुन्न सिखरपै झालर झलके, झरत अमी रस प्रेम चुवा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, चाख चाख अलमस्त हुवा ॥

शब्द २२६-गावत कहां गायबो सुन रे ॥ टे० ॥ बाजत ताल पखावज बीना, निरतत अगम निगम नहीं गन रे ॥ अपने कहे कछु काम न आवे, मानत नहीं अपरबल मन रे ॥ सुन चातुर यह बचन हमारा, बिन सतगुरु लख पाया किन रे ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधू, जब लख परी अगमकी धुन रे ॥

शब्द २२७-काया गढ़ जीतोर भाई, तेरो काल अवध टर जाई ॥ टेक ॥ भरमकोट चहुँ ओर फिराये, माया ख्याल रचाई ॥ कनककामिनी फंदा रोपे, जन राखे उरझाई ॥ पचीस जाल जाके