कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
देत ताड़ना, बिन सतगुरु को होत सहाई रे॥ धरमदासके अजर गोसाई, नाम कवीर कहो गोहराई रे ॥ ✽
शब्द २१८—जनम यह देखा देखी जात॥ टेक॥ ज्यों अंजुरीको नीर घटत है, ज्यों तरवरसे टूटै पात॥ चार पहर धंधेमें खोये, रैन गँवाये सोवत खात॥ जब जमराजा आन गहेगा, पकर जीभ तोहि मारे लात॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, कहालो कहों तेरी उतपात॥
शब्द २१९—तकसीर भई है कैसे, मैं पियाको मनाऊं॥ टे०॥ पांच पचीस मोहि रोकत टोकत, तीनों गुनसे बचाऊं॥ लिख लिख पतियां भेजों अमरपुर, मरजी होय तो आऊं॥ दीनदयाल दया कर जन पर, साहेब दरशन पाऊं॥ धरमदासने पाये कवीर गुरु, करमचूक बगसाऊं॥ ✽
शब्द २२०—कैसे जाऊं महलमें अटपट अगम चढाई॥ टेक॥ दश दरवाजा बने महलके, सात सिंधु सोरा खाई॥ चांद सूर दोय इत उत लागे, सुखमन सेज बिछाई॥ सतगुरु बहियां नाम- सनेही, बांह पकरि ले जाई॥ धरमदासने पाय कवीर गुरु, सबद सुरत मिल जाई॥
शब्द २२१—जो मैं साहब पाऊं, नेनोदी मांझ बसाऊं॥ टे०॥ नेनोदी मांझ बसे मोरे प्रीतम, उरसे पलक न लाऊं॥ एकटक ठाठी चरण निहारों, पलपल चौरं डुराऊं॥ त्रिकुटी महलमें बने झरोखा, दीदारोंदी सेज बिछाऊं॥ रोम रोम पिया संग राची, आनंद मंगल गाऊं॥ बिछूरे प्रीतम जो मैं पाऊं, तब स्यानी होय जाऊं॥ धरमदासके अरज गोसाई, सिंधुमें बूंद समाऊं॥ ✽
शब्द २२२—गुरु मोरे बहियाँ जनि छाड़ो पकरके॥ टेक॥ बहे जात थी भौसागरमें, काठ लियो जिन अपनो करके॥ ध्रुव