कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(८४८)
कवीरपंथी—
शीलके बखतर पहिरे, जुगतके लांग चढाई ॥ नाम टोष माथेपे धरके, जौ भर अनी न आई ॥ पहरेदार सिपाही सांचे, वो नहिं सोवे भाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, छिनपल देत जगाई ॥ ❁
शब्द २३३—सतगुरु निरबानी निरबानी, जाके सुक्ति भरत है पानी ॥ टे० ॥ अष्ट सिद्ध नौ निध करत मजूरी, और विधाता रानी ॥ चंद सूर दोउ बरे मसाले, सुरत गगन ठहरानी ॥ अर्थ धर्म और काम मोक्ष फल, बैल फिरे ज्यों घानी ॥ तहवाँ है एक अगोचर, निगम नेति ना जानी ॥ चार वेद नौ व्याकरण कहिये, अष्टादशो पुरानी ॥ सत्य भगति विन चार पदार्थ, काग विष्ट सम जानी ॥ अवरन वरन रूप सब वाको, गरज गगन चहरानी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, अजरा अमर निशानी ॥
शब्द २३४—सतगुरु अबिनाशी अबिनाशी, जाके सुक्ति रहत है दासी ॥ टे० ॥ ब्रह्मा जाको पार न पावे, निरंजन करे खवासी ॥ सेष सहस्र सुख निशि दिन गावें, सो भी पार न पासी ॥ शंकर जाको ध्यान धरत हैं, कहिये जोग उपासी ॥ चार वेद जाके भेद न जाने, खोज खोज मरजासी ॥ ओंकारमें भरमत डोले, विष्णु फिरे उदासी ॥ नाम पदार्थ हाथ न आवे, परे कालकी फांसी ॥ अजर अमर वे परम पुरुष हैं, कहिये फूल सुबासी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, अमरलोकके बासी ॥
शब्द २३५—सतगुरु आदि संदेसी आये ॥ सोरा असंख जुग वीत गयो है, भेद न काहू पाये ॥ टे० ॥ दुनियाँ रही खुलाय रूबाबमें, सोवत नींद जगाये ॥ दया भाव औं नाम पान ले हंसन पार लगाये ॥ काशीमें सतगुरु प्रगट भये हैं, नाम कवीर कहाये ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जीवन फंद बुढाये ॥ ❁
शब्दावली
(८४९)
शब्द २३६-जपो मन सतगुरु सत् कवीर ॥ टेक ॥ भौसागरसे जीव उबारै, जमके कागद चीर ॥ साह दमोदर बुडत बचावे, रतनागरके तीर ॥ ईंद्रमतीको लोक पठाये, काटे जमके पीर ॥ साहब कवीर मिले गुरु पूरे, देखत मन भौ थीर ॥
शब्द २३७-सतगुरु ज्ञानकि गांसी मारा । तीर न मारा तरवार न मारा, शब्दके मारा न्यारा ॥ टेक ॥ आंखभी अंधा कानभी बहरा, पांव अपंग कर डारा ॥ औषद मूल कछु ना लागे, का करे वैद विचारा ॥ कच्चा कोट पक्का दरवाजा, घायल आन पुकारा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, तीर निकसगो पारा ॥
शब्द २३८-हमारे मन बस गये साहब कवीर ॥ टेक ॥ काशीमें गुरु प्रगट भये हैं, गुनके गहिर गंभीर ॥ काशी तज मगहरमें आये, दोई दीनके पीर ॥ एक दिन साहेब बेन बजाये, कालिंदीके तीर ॥ सुर नर सुनि सब छकित भये हैं, छक गये जमुना नीर ॥ कोई गाडे कोई अगिन जरावे, कोई न धरना थीर ॥ चार दागसे न्यारा साहब, बिनसत नाहिं शरीर ॥ जगन्नाथके मंदिर थापे, हट गये सागर नीर ॥ दास मलूक सलूक कहत है, खोजो खसम कवीर ॥ *
शब्द २३९-पढो मन ओंनामासिंध ॥ टेक ॥ ओंकारते सब जग सिरजा, है वाहीका रंग ॥ वो तो पुरुष सबनसों न्यारा, कर वाहीका संग ॥ नाम निरंजन नैना माते, नाना रूप धरंग ॥ निरंकार निरगुन अविनाशी, निरखत सबके अंग ॥ माया मोह मगन होय नाचे, माते मत्त मतंग ॥ माटीके तन थिर ना रहता, मन मायाके संग ॥ शील सुभाव दयाके दरपन, सदा सम्हारो अंग ॥ साधुके बचन सत् कर माने, सिरजनवाला संग ॥ धत्ता ध्यान धरो दिल अंदर, लिख ले नाम अनंद ॥ गोरख जोगी मिले सतसंगी, नाम कवीर सोहंग ॥ *
(८५०)
कवीरपंथी-
शब्द २४०-साई मिलना नहीं आसानका ॥ टे० ॥ साईका मिलना बरतके चढना, चित चूके किस कामका ॥ सतीको सत् सूरमाको रन है, सनमुख घाव सहे बानका ॥ कहे सुने कछु काम न आवे, भर्म न मिटे जिव जानका ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, कठिन पंथ गुरुज्ञानका ॥ ❁
शब्द २४१-साई तेरा नाम बिना न उबारा ॥ टे० ॥ काम क्रोध औ लोभ मोहसंग, ये चारों बटपारा ॥ इनके बस जीव भुलाने, कैसे उतरे पारा ॥ आशा तृष्णा मनसा डाकिन, खाये जग संसारा ॥ कनक कामिनिके बस परिया, का करे जीव विचारा ॥ साधुके संग परम आनंदा, सहजे उतरे पारा ॥ सतगुरु खोज संतसे बूझो, कहें कवीर विचारा ॥ ❁
शब्द २४२-साई तेरे तकियामें जाना जरूर ॥ टे० ॥ खांड चिरोंजी मन नहीं भावे, साई तेरे टुकरा कबूल ॥ शाल दुशाला मन नहीं भावे, साई तेरी गुदरी कबूल ॥ कोट अटारी मन नहीं आवे, साई तेरे झुंपडा कबूल ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधू, साहेब हाल हजूर ॥ ❁
शब्द २४३-साई तेरे मत बिन नर नहीं छूटे ॥ जौलग पंथ न गहे पियाके, जम गये बडे घर लूटे ॥ टे० ॥ आयो नेम प्रेम परकाशा, छाडो कुल व्योहारा ॥ सरगुन निरगुन दोड छोडके, समुझके होजा न्यारा ॥ जैसे काग रहत वोहितमें, तैसे जगके प्रानी ॥ तज अनरीत प्रीत कुल लब्बा, सुरत फिरे भटकानी ॥ जौलग सत साहेब ना चीन्हे निहअछर लख आवे ॥ घटवरिया तोहे जान न देहै, सब तकलीफ बनावे ॥ है अजगैब गैब होय आया, ताहि कहो करतारा ॥ कहे कवीर चेत नर अंधा मैं बहु भांत पुकारा ॥ ❁
शब्दावली
(८५१)
शब्द २४४-पानी बिच मीन पियासी ॥ मोहि देखत आवे हांसी ॥ टे० ॥ ब्रह्मज्ञान बिना नर भूला, का मथुरा का काशी ॥ घरकी माया मनहि न आवे, बन बन फिरे उदासी ॥ है हाजरको दूर बतावै, दूरकी आश निरासी ॥ जल बिच कमल कमल बिच कलिया जहाँ, पुरुष अविनाशी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सिरपर काल मवासी ॥
शब्द २४५-तेरी पानी बिच प्यास न गई ॥ टेक ॥ बाहर आयके का सुख पाया, अंदर लहर न लई ॥ ऐसे सुखसागरके पाये, आश न पूरन भई ॥ अरे मन मूरख भीन अनारी, किन तोहि डुरमति दर्ई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, हो रहो आनंद मई ॥
शब्द २४६-पानी बीच बतासा संतो तनका एही तमाशा है ॥ टेक ॥ का ले आया का ले जायगा का बैठे पछताता है ॥ मूठी बांधे आया बंदे, हाथ पसारे जाता है ॥ किसकी नारी कौन पुरुष है, कहाँसे नाता लाया है ॥ बडे बिहाल खबर ना तनकी, विरही लहर बुझाता है ॥ एक दिन जीना दो दिन जीना, जीना बरस पचासा है ॥ अंतकाल बीसा सौ जीना, फिर मरनेकी आशा है ॥ ज्यों ज्यों पांव धरो धरनीमें, त्यों त्यों काल नियराता है ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, गाफिल गोता खाता है ॥
शब्द २४७-साधु घट शील संतोष बिराजे ॥ दयासरूप सकल जीवनपर, शब्द सरोत्तर गाजे ॥ टेक ॥ जहवां मनकी मनोरथ दौरे, ताहि संग ना जावे ॥ सत्तबादी सतगुरु पहिचाने, आतम दृष्टि दिखावे ॥ निर्मल दशा सरब सुखदाई, आनंद घर रहिवासा ॥ शुद्ध सुचाल सदा शीतल गति, निश दिन शब्द विलासा ॥ सतगुरु गहे निशि बासर, सत्त नाम परकाशा ॥ कहैं कवीर कोइ संत बिवेकी, तहाँ हमारो बासा ॥
(८५२)
कवीरपंथी—
शब्द २४८—जगमें या बिधि साधु कहावे। दया सरूप सकल जीवनपर, और दृष्टि ना आवे॥८०॥ झलकत दशा ब्रह्मके जामें, सबहीके मन भावे ॥ शीतल बचन सर्व सुखदाई, आनंद प्रेम बढ़ावे ॥ जाको निशदिन प्रेम भगति है, दूजा देव ना ध्यावे ॥ कहैं कवीर हम वा घर परगट, आप अपनपो पावे ॥
शब्द २४९—साधुका होना सुसकल है। काम क्रोधकी चोट बचावे, सोई निज साधू है॥८०॥ कायामध्ये धुनी रमावे, रमता राम गहे ॥ सत बिस्वास हृदयमें राखे, जगसो न्यार रहै ॥ या माया झूठ परपंचिन, जगमें दौर करै ॥ जीव जंत जितना धर पावे, सबको जपत करै॥ माला तिलक औ बाना बांधे, ममता दूर करै ॥ आठ पहर गुरु ज्ञान भजनमें, कम्भर बांध लरै॥ मोटी माया सब कोई त्यागे, झीनी तजी न जाय ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, झीनी सबको खाय ॥
शब्द २५०—ठगनी क्या नैन झमकावे, तेरे हाथ कवीर न आवे ॥ टेक ॥ कददू काट मृदंग बनावे, निम्बू काट मजीरा ॥ झिंगा तुरैया मंगल गावे, नाचे बालमखीरा ॥ रूपा पहिरके रूप दिखावे, सोना पहिर ललचावे ॥ गले डार तुलसीकी माला, तीन लोक भरमावे ॥ मुसोंकी सभा सरप एक नाचे, मेंडक ताल लगावे ॥ चोलनी पहिरके गदही नाचे, ऊंट विस्नुपद गावे ॥ बृच्छ चढी मछली फल तोरे, कछुवा भोग लगावे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बिरला अर्थ लगावे ॥
शब्द २५१—या तन धनकी कौन बढाई, देखत नैनो माटी मिल जाई ॥ टेक ॥ कंकर चुन चुन महल बनाया। आपन जाय जंगल बसाया ॥ हाड़ जरे जस लाकर झूरी। केस जरे जस घासकी
शब्दावली
(८५३)
पूरी॥ या तन धन कछु काम न आई। ताते नाम जपो लौलाई॥ कहैं कवीर सुनो मेरे सुनियां। आप सुवे पाछे डूबगइ दुनियां॥
शब्द २५२—ऐसे लोगनको वहि जाने दे॥ टेक॥ हंस हंस मिल चले सरोवर, बकुलन मछरी खाने दे॥ हंस गयंद चले मदमाते, कूकर लोग भुसाने दे ॥ हंस हंस मिल चलो अमरपुर, कागा आमिख खाने दे ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सत्य शब्दमें काने दे॥
शब्द २५३—साहेव कैसे करें तोहे राजी। चाकरी चोरनेवाला हाज़िर, ऐसा बंदा पाजी ॥ टे० ॥ पांचों चोर करै कुफराना, इन संग दीन गमाऊं। इन संग लडूँ कि कहूँ बंदगी, किन किनका समुझाऊं ॥ इन संग रहों तुमें ना पाऊं, घटके बीचमें गासा। तखत तरेका पेडा मारे, याका अजब तमाशा॥ काह कहों कछु कहन न पाऊं, देत जगत मोहि गारी। दोजक भिस्त दोऊ हम त्यागे, रहूं पनाह तुम्हारी॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, ये सब झूठी बाजी। नाम बिना कोई पार न पावे, का पंडित का काजी॥
शब्द २५४—देखो दुरमत या संसारकी। नामसो हीरा छांड हाथसे, बांधत मोट बिकारकी ॥ टे० ॥ कोई खेती कोई बनिजे चाले, कोईको हवस हथियारकी ॥ अंध धुंदमें जनम गँवाये, सुध बिसरी करतारकी ॥ जान बूझके पंथ चलत है, सुन सुन विप्र लबारकी॥ आपन हाथ गलेमें डारी, फांसी माया जारकी॥ नाना बिधके कर्म कमावे, खबर नहीं शिर भारकी॥ झूठी साखमें रौंच रहे हैं, फूटी आंख गँवारकी ॥ बारंबार पुकार कहत हौं, मोहि शरम सिरजनहारकी ॥ कहैं कवीर या बिनस जायगी, छिनमें काया छारकी ॥
(८५४)
कबीरपंथी-
शब्द २५५-कोई पिये पियाला प्रेमका, दया दुलीचा ऊपर बैठो, तिमर नाश गये नैनका ॥ टेक ॥ ज्ञानकी कुंडी विवेकका घोटा, छानो उत्तम नेमका ॥ पांच पचीस घोटक काढो, औबल चाखा प्रेमका ॥ आठो जाम रहो मतवाला, अनलपछि कोई गगनका ॥ रोम रोम भरपूर रहा है, मार लिया दल मनका ॥ जल तरंग जलहीसे उपजे, धोखा मिट गये फैनका ॥ कहैं कवीर दया सतगुरुकी, ठौर पाये सुख चैनका ॥
शब्द २५६-काया चलत प्रान काहे रोई ॥ टे० ॥ तुम्हरे संग बहुत सुख कीन्हो, नित उठ मल मल धोई ॥ तुमतो हंस चले घर अपने, हमको चलत बिगोई ॥ हंस कहै सुन काया बौरी, मेरो तेरो संग न होई ॥ तोसे घट बहुतेरे छोड़े, संग न लागे कोई ॥ लट छरियाय वाके माता रोवे, खाट पकर वाके भाई ॥ आंगनमें जाके तिरिया रोवै, हंस अकेला जाई ॥ शिव शनकादिक औ ब्रह्मादिक, शेष सहस मुख जोई ॥ जिन जिन देह धरी दुनियामें, थिर ना रहिया कोई ॥ पाप पुन्य दोउ जनमसंघाती, समुझ देख नर सोई ॥ कहैं कवीर प्रभु पूरनकी गति, बूझे विरला कोई ॥
शब्द २५७-करमगति टारिहु नाहिं टरे ॥ गुरु वशिष्ठ महासुनि ज्ञानी, लिख लिख लगन धरे ॥ टेक ॥ सीता हरन मरन दशरथको, बन बन बिपति परे ॥ कहाँ वे राहु कहाँ वे रवि शशि, आन संजोग परे ॥ सतबादी हरीचंद राजा, नीच घर नीर भरे ॥ दुरबासा ऋषि आप दियो है, जदुकुल नाश करे ॥ पंडवनके हरि सदा साथी, सो भी बन बन बिचरे ॥ तीनों लोक कर्मगतिके बस, जीवनसे काह सरे ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, भूला भटक मरे ॥
शब्द २५८-नामको या बिधि ध्यान धरे । जैसे अमली अमलको चाहे, छिन छिन सुरत करे ॥ टे० ॥ जो लग अमली
शब्दावली
(८५५)
अमल न पावै, तो लग तलफ मरै॥ फनि मनियां भुई काढ़ धरत है, फैलके ओस चरै ॥ कछू चरै कछू मन तन चितवे, विछुरत तलफ मरै ॥ जैसे सती जरै पियके संग, नेक न सोच करै ॥ आपन चरि पियाको लेके, विहँसत जाय जरै॥ जैसे सुरत गगनको चाहे, महलन खोज करै ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधो, भूला सो भटक मरै ॥
शब्द २५९-रस भँवर गुफामें अजर झरै ॥८०॥ गंगा जमुना मध्य सरस्वति, नाद बिंदसे गाँठ जुरै ॥ आसन मार अमृतसर चाखे, दिलकी दुविधा दूर करै ॥ दस दरवाजे तारी लागी, कोइ कोइ हंसा ध्यान घरै ॥ कहै कवीर सुनो भाई साधो, अजर अमर कबहुँ न मरै ॥
शब्द २६०-कूंची घडाय लावो बिन लोहराके ॥ टेक ॥ नरम निहाय नरम है औटन, ज्ञानके हथौरासे चोट घलाय लावो ॥ खालहि खाल खालपर सोहै, वोहँ सोहँ दोय पवन डोलाय लावो ॥ संसे खीच बज्रको पकड़े, पानी बानी जायके डुझाय लावो ॥ साहेब कवीर कूंची घड लाये, खोल किंवरवा दरस कराय लावो ॥
शब्द २६१-जाय रे दिनही दिन देहा । कर ले बावरे तू नाम सनेहा ॥ टेक ॥ बालापन गये जोबन जन जासी । फिर फिर या जोनी संकट आसी ॥ पलटे केस नैन जल छाये । मूरख चेत बुढापा आये ॥ नाम लेत लज्जा ना कीजै । पल पल अवध घटै तन छीजै ॥ सत्त नाम जे चितहिं बिसारा । कहै कवीर सोई जन हारा ॥
शब्द २६२-जारों भैया जगकी चतुराई । प्रभुको नाम लेत ना कबहुँ, जिन यह देही जुगति बनाई ॥ टेका ॥ जोरत दाम काम अपनेको, हम खैहैं लरका बिलसाई ॥ सो धन राजा चोर ले जैहैं,
(८५६)
कवीरपंथी—
रहो सहो ले जात जँमाई ॥ या माया कलवारन कहिये, मद पिवाय राखै बिलमाई ॥ एक जे परे धरनमें लोटे, एक कहे चोखा दे माई ॥ या माया सुर नर सुनि डसिया, देवा देवा बैठी खाई ॥ कोइ कोइ भाग बचे शरनागत, जासो माया रही लजाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, ले फांसी हमहूँ पर धाई ॥ गुरु प्रताप संतनकी संगति, अब हम रहे निशान बजाई ॥
शब्द २६३—ऐसी रहन रहे सो बैरागी। सदा उदास नाश मायासे, सत्तनाम अनुरागी ॥ टे० ॥ क्षमाकि कंठी शील सुमिरनी, सुमति सुमरती जागी ॥ टोपी अभयगत माथेपै, कलह कलपना त्यागी ॥ ज्ञानगूदरी मुक्ति मेखला, सहज सुई ले त्यागी ॥ जुगत जमात कूबरी करनी, अनहद धुन लौ लागी ॥ शब्द अधार अधारी कहिये, भीक दयाकी मांगी ॥ कहैं कवीर प्रीति सतगुरुसे, सुरति निरंतर लागी ॥
शब्द २६४—कोई दोष न दीजै, करमकि बात नियारी ॥ टे० ॥ काहे बकुला स्वेत बरन भये, काहे कोयल कारी ॥ काहे कूप जल मीठो लगत है, काहे ससुंदर खारी ॥ काहे मूरख राज करत है, पंडित काहे भिखारी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, गुरु चरनन बलिहारी ॥
शब्द २६५—अब मोहि ऐसेही बनि आई ॥ भावे कोई निंदे भावे कोई बंदे, छोडेउं लोक बडाई ॥ कुलसो निकस भई जग गनिका, फिर ना कुलहि समाई ॥ हाथीको दंत कटे सुख बाहिर, फिर ना सुखमहैं जाई ॥ कोटन लंघन करत केहरी, भूखे घास न खाई ॥ सौ जोजन मरजाद सिंधुकी, जल अचवे ना भाई ॥ सो जल पीवे कोई संत बिवेकी, जिनकी भरी तलाई ॥ भवसागर तरबेके कारन, नामकी नाव बनाई ॥ हलके हलके पार उतर गये,
शब्दावली
(८५७)
बूढे जो गुरुवाई॥ जैसे मिरगा नाद धुनि सुनके, प्रान तजत है भाई॥ ऐसे मीन मरे बिन नीरा, जल बिन रहो न जाई॥ लागी छाप भक्ति निरभयकी, अब ना दूर-दुराई॥ कहें कवीर छूटे ना कबहुँ, ऐसी अटल सगाई॥
शब्द २६६-बानेका मरद दुहेला है॥ टेक॥ आगे चले पाछे ना चितवे, सोई शूरोंका मेला है। चढे तुरंग जब बाग सँवारे, कूद परे रन पेल्ला है॥ गहे टेक छूटे ना कबहुँ, भगति हंसी ना खेला है। कहें कवीर सुनो भाई साधो, सो सतगुरुका चेला है॥
शब्द २६७-अबकी भली विसाहन बन गई॥ टेक॥ जनम जनमके टोटा बाढो नाम, नफा गुरु कर दर्ई॥ दीपक बार दिये मोहि सतगुरु, बस्तु अगोचर मिल गई॥ दुष्ट जगाती निकट न आवे, अटल छाप गुरु कर दर्ई॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, सकल भरमना मिट गई॥
शब्द २६८-अपने घट दीपक बासरी॥ तत्त्वको तेल दयाकी बाती, ब्रह्म अगिन उजासरी॥ टेक॥ निरमल जोत निहार गगनमें, तन मन धन सब वाररी॥ सुरत सोहागिन जोग ध्यानमें, गुरु-गमपंथ सुधाररी॥ काम क्रोध मद लोभ मोहकी, झोंको ये सब भाररी॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, अपने कंथ निहाररी॥
शब्द २६९-काह कहों अनकही भली है॥ टे०॥ उहवां वेद शास्त्र कछु नाहीं, उहाँ अकथ ईहां कथा चली है॥ जहवां मूल बीज कछु नाहीं, ना तरवर ना सुमति फली है॥ जहवां नहीं घाट औघट, ना खेवट ना तीर सई है॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, सो है हंसा सर्व मई है॥
शब्द २७०-कैसे कैसे मिलाव बालम परदेसिया, रोकत दौय दरबानी हो॥ टेक॥ पांच पचीस बैठे रखवरिया, इन मोरी राह
(८५८)
कवीरपंथी—
बिगारीहो॥ दिल ना चैन रैन निशबासर, अपनेअपने बारी हो॥ नैन हमार महा दारुन है, स्वास स्वास जमुहाई हो॥ जबजब करव प्रीतमसो गह गह पलकन पारी हो ॥ दसहुँ द्वार रोक जम बैठे, सुमति किंवाड लगाई हो॥ जिन दुख दीन्ह मान गढ ऊपर, पकर जंजीर भराई हो ॥ गहो गुरु चरन दया कर उपजे, ज्ञानके खरग बनाई हो ॥ होय निहशंक नाम गुन गावे, ममता दूर बहाई हो ॥ अर्ध उर्ध बिच तार लगाई, जहवां सुरति समाई हो॥ कहैं कवीर वा घरका भेदी, बहुर न भौजल आई हो ॥
शब्द २७१—गाँठ परी पिया बोले न हमसे ॥ टेक ॥ नित उठ देखों पिया तुम्हारी सेजरिया, लग गई नौद निकसगये घरसे ॥ जो मैं जानति पिया रिसियैहैं, काहेको प्रीत लगाती ऐसे ठगसे ॥ अपने पियाको फेर मनाऊं, सौ तकसीर होत हरिजनसे ॥ धर्म- दासकी अरज गोसाईं, साहेब कवीर पिया पाये बडे तपसे ॥
शब्द २७२—कैसे बोले अधरमें बोलवा रे॥ टेक॥ या बोलवाके सकल पसारा, घट घट करत किलोलवा रे ॥ या बोलवासे तीन देव भये, ब्रह्मा विष्णु मद्देशवा रे ॥ या बोलवासे तीन लोक भये, चंद सूर तारागनवा रे ॥ कहैं कवीर बोलवाको चीन्है, उतर जाय भौपरवा रे ॥
शब्द २७३—ऐसी लगन लगाय कहाँ जासी ॥ टेक॥ मूठ सुवा सेम्हर एक सेयो, छाँड चला संग साथी ॥ फूल झरे जबही फल लागे, सुवना भये हुलासी ॥ चौंच मार सुवना पछताने, लाग गले बिच फांसी ॥ हमतो जाने अमृत फल है, लाल फूल बिसवासी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सुवना भये निरासी ॥
शब्द २७४—को सिखवे अधमनको ज्ञाना ॥ टे० ॥ जहाँसे आया ताहि बिसराया, फूटी आँख भयो निज काना ॥ गुरु साधकी
शब्दावली
(८५९)
कहीं न माने, चाहत है हमरो परवाना ॥ गीता और भागवत बाँचे, ना लागे गुरु उनके काना ॥ मारहिं मार होरहे जमद्वारे, साहेब कवीर देख सुसकाना ॥
शब्द २७५—बिन सतगुरु नर फिरत भुलाना ॥ टेक ॥ एकके हरिसुत लाय गडरिया, पोष पालके कियो सयाना ॥ रहत अचेत फिरत अजयन संग, अपना हाल उनहु ना जाना ॥ एक केहरि सुत आय जंगलसे, देखत ताहि बहुत सकुचाना ॥ बकरन भेद तुरत उन दीन्हा, आपन दशा देख सुसकाना ॥ मिरगा नाभि बसे कस्तूरी, वह मूरख दूँदत चौगाना ॥ करत सोच पछतात मनहिं मन, यारे सुगंध कहाँसे आना ॥ अधर उधर बिच डोरी लागी, रूप छका गहि जात बखाना ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, उलटा राह सूत हम ताना ॥
शब्द २७६—बाबुल मरियो हो दइया मारे, कूर को दीन्ही ॥ टे० ॥ कूर अरोसी कूर परोसी कूरे भई सगाई ॥ कूरे कूर बराती आये, कूरे मिले संघाती ॥ अकवारमें गदहा दीन्हे, द्वारे दीन्हे घूस ॥ मंडवातरमें दीन्ह लुखरिया, लंबी लंबी पूछ ॥ दाल बनाये भात बनाये, बरा बनाये कच्चे ॥ सबे बराती जेवन बैठे सारसके-से बच्चे ॥ मंडवौ जरगै दुलहौ मरगै, दुलही भई अहवाती ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, नाचत चले बराती ॥
शब्द २७७—जियरा पराये बसनमें ॥ टे० ॥ सास ननद मोरी जनमकि बैरन, चरचा करे दसनमें ॥ काम क्रोध मद लोभ मोह बस, नफा नहीं है इसमें ॥ पांच पचीस घट भीतर, टरे नहीं निश दिनमें ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, सतगुरु चरन हियेमें ॥
शब्द २७८—निश बासर मोहिं नींद न आवै, लगा शब्दका तीरा हो ॥ टे० ॥ गांसी मारी सार शब्दकी, बिंध गइ सकल
(८६०)
कवीरपंथी—
शरीरा हो ॥ अंतरधान भये जब सतगुरु, छिन छिन व्याकुल शरीरा हो ॥ अब यह प्रान कौन बिधि राखों, कठिन बिरहकी पीरा हो ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, गुरुके चरन होय थीरा हो ॥
शब्द २७९—नाम अमल कहाँ पाये हो, देखो देखो सखीरी ॥ टे० ॥ सोवत थी मैं लोभ मोहमें, ज्ञानके दिष्ट जगायेहो ॥ बिषकी लहर उठी घट भीतर, अमृत बूंद चुवाये हो ॥ बंदी छोर मुकतिके दाता, जीवन बंध छुडाये हो ॥ साहेब कवीर मिले गुरु पूरे, तनके तपन बुझाये हो ॥
शब्द २८०—जिनको लगी शब्दकी चोट ॥ टे० ॥ का बरछी का छुरी कटारी, का ढालोंकी ओट ॥ का नदिया का कुवा बावडी, का खाई का कोट ॥ का भाई का बाप महतारी, का तिरिया का सोच ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बचे गुरुकी ओट ॥
शब्द २८१—दिलकी गुठिया खोल, सतगुरु भला करेगा ॥ टे० ॥ पांच तत्त्वकी या तन गुठिया, लगी पवनकी डोर ॥ इस गुठियामें दस दरवाजा, जतन जतनसे खोल ॥ इस गुठियामें लाल अमोलक, बे प्रमान ता मोल ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, बांध अगमकी डोर ॥
शब्द २८२—सुरत मतवाली राजा मोहि लिया ॥ टे० ॥ शील दयाका बना घाघरा, तत क्षमाकी सारी ॥ त्रिगुन तारकी अंगिया सोहै, तापर भौर गुँजारी ॥ कर कंकन बाजूबंद सोहै, दुलारी दया सँवारी ॥ हिये हार हिरदे बिच सोहै, जे हर शब्द अगारी ॥ रतन जतनके महल बना है, सुकित लगी किवारी ॥ भौर गुफामें सेज बिछी है, पौढी सुषमन नारी ॥ अपने पियाको सनमुख देखों, भर लोचन अधिकारी ॥ कहैं कवीर भरम जब छूटे, उपजे भगति करारी ॥
शब्दावली
(८६१)
शब्द २८३-बोलन लागी तूती साँची बोल॥टे०॥ दया धरमकी या तन कुंडी, तापर करत किलोल॥ भूल गई सब झूठी बतियाँ, अब जो भई अनमोल॥ सत्तनामकी साँची मिसरी, पी गइ जलमे घोर॥ सुरति निरतिके बने पायडे, आडा सुरति अडोल॥ अष्ट कमल ये आठ पंखुरी, दस खिरकी भइ गोल॥ छुटगौ तूती गरभ बसेरा, मिट गये डामाडोल॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, अब का तेरो मोल॥
शब्द २८४-लोगवा मतलबके गरजी, अब मोहि जान परी॥ टे०॥ जौलौ बैल लदे बनियांके, तौलौ चाह धनी॥ थकित भया कोइ बात न पूछे, फिरता गली गली॥ मोह भरमसे सती होत है, पियके फंद परी॥ हरदम साहब ना पहिचाना, सुरदा संग जरी॥ हरे वृच्छ पंछी दोय बैठे, किया मनोरथकी॥ पंछी उड़ गये पत्ता झर गये, यही रीत है जगकी॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, मनसा विषै भरी॥ मनुवा तो कहु अंते डोलै, जपता हरी हरी॥
शब्द २८५-सूरत मूल ठिकाना जानो । ताहि चीन्हके डोर संभारो, दिग्य दृष्टि पहिचानो॥ टे०॥ का भय पिंड ब्रह्मांडके खोजे, का भय पवन चढाये॥ का भय त्रिकुटी ध्यानके कीन्हे, का भय भँवर गुफाके पाये॥ वह तो सबनसो न्यारा, कायासे भिन्न पसारा॥ मूल डोर पुरुष सहिदानी, हंसन करे उवारा॥ बिन गुरुगम शिक्षा ना पावे, फिर काया ठहरावे॥ जो लग संधि हाथ ना आवे, तो लग भटक़ा खावे॥ गुरु जौहरी भेद बतावे, औघट घाट लखावे॥ सुरति निरति औ शब्द सहायक, गुरुमुख लोक सिधावे॥ कोट ज्ञानसो भिन्न पसारा, कहौ मूल निज बानी॥ जेहि प्रतापसे हंसा बांचे, सो है अगम निशानी॥ मूल ज्ञान
(८६२)
कवीरपंथी-
सबही सो न्यारा, संत लेव पहिचानी ॥ कहें कवीर धर्मनि निज मानो, मिटे नरककी खानी ॥
शब्द २८६-अनुरागी निरगुन जोखो हो । जो तुम सुकित अंश हमारे, यह निजज्ञान समोखो हो ॥८०॥ वह सकल घट व्यापक, घट घट रहो समाई ॥ उठत राग अनुराग सरूपी, ताको लखो बनाई ॥ जहाँ मूल उच्चार होत है, बिगसित मधुरी बानी ॥ गरज घुमड अंजोर होत है, चूवत फूही अघ्रानी ॥ अगम पंथ जहाँ पांव टिके नहीं, सो मारग है झीनी ॥ तिल प्रमान जहाँ लगी किंवारी, तहाँ सुरति गम कीनी ॥ जब वह मारग प्रगट उघरिहै, सुनो अमरकी बानी ॥ कहें कवीर धर्मनि निज मानो, मिटे नरककी खानी ॥
शब्द २८७-निजगत कहिये मोही । गुन निरगुन दोनोंकी महिमा, बूझत हैं गुरु तोहि ॥८१॥ को निरगुनको सरगुन कहिये, को करंत को करता ॥ लख चौरासी जिया जूनमें, सर्व मई होय बरता ॥ सुनो संत निरगुनकी महिमा, बूझे विरला कोई ॥ निरगुन फांसमें सबे फंदाने, सुर नर सुनिवर लोई ॥ आदि ब्रह्म निरगुन निहअछर, सो सबहीसे न्यारा ॥ सरगुन सकल व्यापक है माया, ये उलझे व्योहारा ॥ गुरु कवीर तव चरन मनाऊं, सब संतन सिरताजा ॥ धरमदास परदयाजु कीजै, बांह गहेकी लाजा ॥
शब्द २८८-समुझ बिन लाज नदीमें बोरे । जहाँ लाज तहाँ नेह न उपजै, शील समाधी फोरे ॥८२॥ संकुच सनीप हीनता घेरे, मन मलीन झकझोरे ॥ कोध अगिन मोह घन उपजे, ममता मंडल घेरे ॥ लाज लहरकी उठे तरंगा, विरह बूंद विष घोरे ॥ लाज समाय कुमत झरबरसे, कुपथ कुसंगत डोले ॥ ज्ञान देश की राह बिसारे, सतसंगत हित फोरे ॥ सतगुरु खोज लाज तज
शब्दावली
(८६३)
दीजै, वीरघटा मन मोरे ॥ कहै कवीर सतसंगति कीजै, सुमति तरंग हिलोरे ॥
शब्द २८९—जतन विन तन अभिमान उजारे ॥टेका॥ ताते कीजै शील किंवारी, मन बदलहर निवारे ॥ ममता मान महातम भारी, बिरहबान फटकारे ॥ वरषतकाम घट अंधियारी, लाजित मुख बिध टारे ॥ हांक डांक माया मद गरजे, जटाझार झरडारे ॥ डमडम गावे असत जगावे, लालच लहर फंवारें ॥ चारमास चारे पन बरसे, त्रिगुन तत्त्व गुन डारे ॥ पांचो तत्त्व पांचरंगबरसे, पन पन रंग किनारे ॥ बाल किशोर तरुन बृद्धापन, पल-पल चढ़त उतारे ॥ रंगकी लहर तरंग फूँहारे, सरसंधान संभारे ॥ प्रेम भक्ति लौ लीन रहे मन, सुरति निरति संभारे ॥ कहैं कवीर जो सतगुरु सेवै, सो अभिमान बिडारे ॥
शब्द २९०—जतन विन मोह दोहाई पारे ॥टेका॥ पशु पंछी सुर नर मुनि गंधर्व, मोह फांस ना टारे ॥ मोह महामद बिरह विकारी, समता धीर बिडारे ॥ मन मकरंद कंद सबहीके, रज तज बिरस सुधारे ॥ लालच ललित कुपंथ कुबानी, कुकरम कुमति पसारें ॥ लाज सकुच तृष्णाके बांकुरी, सत्य सुमति मतवारें ॥ पारखंड हेत कठोर मूढमत, शीलकी रास बिडारे ॥ जड अज्ञान दशा अतिचंचल, क्षमा धीरज झझकारे ॥ सतगुरु खोज शब्द सरसाजे, मोह बांकुरी फारे ॥ कहैं कवीर सतगुरु पदपरसे, आप तरे औ तारे ॥
शब्द २९१—जतन विन मिरगोंने खेत उजारे । पांच मिरगवा, पचीस मिरगनी तामे तीन शिकारे ॥टेका॥ अपने अपने रसके कारन, चरत हैं न्यारे न्यारे ॥ अति बलवंत बढ़ै ना काहू, बिड-
(८६४)
कवीरपंथी—
रत नाहिं बिडारे ॥ तन कर बारी मन कर बिझुका, गुरुका शब्द रखवारे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, मानो शब्द हमारे ॥
शब्द २९२—पतिबल जनके मोह निवारे छाडो दुख जंजाल सुमतिधर, माया मदहिं विसारे ॥ टेक ॥ मोह तजे निरमोही होवे, मोह फंद सब टारे ॥ तजे प्रपंच जोग तब पूजा, तीनों ताप संभारे ॥ तीरथ बरत प्रतिमा अस्थापन, डिभ कपट सब जारे ॥ तज प्रपंच विकार बाजी सब, जंत्र मंत्र विकारे ॥ विद्या वेद पुरान नाद मद, छंद बंद निरवारे ॥ नट नाटक तज भगति अराधे, तीनों पछ उबारे ॥ चार अचार वरन आश्रम तज, केवल भक्ति सुधारे ॥ कहैं कवीर सतगुरु बल बांचे, उतरि जास भौ पारे ॥
शब्द २९३—अपना काम संभारो भाई । सतगुरु शब्द गहौ चितलाई ॥ टेक ॥ मन औ काम कालके फंदा, एही फंदो संसारा ॥ विरला संत कोउ काम संभारो, पहुंचे लोक मंझारा ॥ नारी अपनी नार पराई, नार नार सब एका ॥ अपना नार दोष कहु नाहीं, सुकित करो विवेका ॥ नार पराई अपनीकै देखै, सो नर पार न पावै ॥ पूरे ठीक पिंडसे छूटे, चौरासी भरमावे ॥ नार पुरुष हमहीं रच लीन्हा, जीवन जुगन बँधाय ॥ कहैं कवीर कोई संत विवेकी, तनके काम बहाया ॥
शब्द २९४—तेरी काया मद्धे सार । सतगुरु पाया दीन दयाल ॥ टेक ॥ इस बोलतेका खोज करना, जीवतेही उल्टा मरना काहे को जमंडंड भरना ॥ उत्तर पैलै पार । महलकी जब सुधपाई, चीन्ह लीन्हा प्रान भाई ॥ अनंत मूरत दिष्ट आई, होगये निह-चल मिटे दुचितार्ई ॥ ऐसा तत्त्व बिचार ॥ कंद भीतर नाद गाजे ॥ जरा मरन उपाधि भाजे ॥ सुन्न महलमें उनमुख साधे ॥
शब्दावली
(८६५)
पावे पद निरवान ॥ ये तीनों है जमकी बाजी, अगम पंथ बैठे अविनाशी ॥ कहें कवीर सुन गोरख जोगी, चीन्ह ता निज-सार ॥
शब्द २९५-साहब ऐसा अपरंपार जाका सत्यशब्द आधार ॥टेक॥ ब्रह्मा जाको खोजत धावे । वेद किताब पार नहीं पावे । सुर नर मुनि बहुते पछतावे ॥ अस्तुति करे पार न पावे । बिना विवेक विचार ॥ पिंड ब्रह्मंड कथे ब्रह्मचारी । जबलग कायाके मंझारी ॥ काया जरबर होवे छारी । जाके आगे वस्तु अपार ॥ पावे तन मन पार ॥ षट् दर्शन मिल कथे जो ज्ञाना । अस्थिर चरका मरम न जाना । फिर फिर जोनी आय तुलाना । जमके हाथपरे पछताना ॥ कियो न तत्त्व विचार ॥ जो लग रहे कामिनि अर्धंगा । चरचा करे क्रोधके संगा ॥ इनसे भक्ति होत है भंगा ॥ जौलग नहीं पांचो एकसंगा ॥ छूटे न कपट लबार ॥ ये तीनों परंपंची देवा । जीव लगावे अपनी सेवा ॥ करे प्रपंच लखै ना भेवा । उन जीवनको लगे न खेवा ॥ बूडे कालीधार ॥ जहाँ नहीं मन मनसा दोई । आशा तृष्णा लखै न कोई ॥ पाप पुन्य तहाँ एक न होइ । निरभय नाम जपो नर सोई ॥ छूटे सकल विकार ॥ सतगुरु मिलै तो लागे तीरा । जम जालिमके मेटे पीरा ॥ हंसा होय ऐसे मतके धीरा । निरभय पद सतनाम कवीरा ॥ आवा-गमन निबार ॥
शब्द २९६-ऐसा जानता कोई ख्याल ऐसा ॥टेक॥ धरती बेध पतालहिं जावे । शेषनागको बसकर लावे ॥ बासुक अहे सत्यका सारा । निश वासर जाका विस्तारा ॥ कमठ पीठपर साल ॥ पूरबमें पछमको लावे । अंधाधुंधका भेद मिटावे ॥ दच्छिन कवीरपंथी शब्दावली २८
(८६६)
कवीरपंथी-
शिला द्वार दे राखा । उत्तर दिशा सजीव न चारखा ॥ चार दिशाको हाल ॥ दिनके सोध रैनमें लावे । रैनके भीतर भानु जगावै ॥ भानुके भीतर शशिखा बासा । शशिके भीतर दिवस प्रकाशा ॥ ताबिच सार न तार ॥ नौको सोध सिलसिला लावे ॥ एक बार सुमेर डुलावे ॥ मेरु दंडपर आसन लावे । मन मुख धागा सुरति गहावे ॥ गगन गुफाके हाल ॥ गगन गुफामें अति उजियाला । अजपा जाप जपे तहां माला ॥ वीना शंख सहनाई बाजे ॥ चहुँदिश राय निरंजन गाजे ॥ हीरा जनम मोहाल ॥ कहैं कवीर कोइ बिरला पावे । जाको सतगुरु अलख लखावे ॥ क्षमा शील संतोष समाई । दया गरीबी आवे भाई ॥ सो चले हमारे नाल ॥
शब्द २९७-शब्द जहाज चढो रे मन भाई ॥ टेक ॥ कर करता से कौल गरभमें लिया बसेरा ॥ माताको दुख दिया मास नौ रहा अकेला । शिर नीचे पग ऊपर ॥ करतासे करे पुकार ॥ त्रिगुन फंद निरवारो स्वामी । अब ना आऊं यह देश गोसाई ॥ बालापनमें भूल नाम, हिरदे ना लीन्ह ॥ तरुनापन जब लगा, मोह त्रियासे कीन्ह ॥ आये बुढापा बावरा मुखसे कहे न नाम ॥ तीनों पन ऐसेमें खोई, नर देही बेबाद गवाई ॥ भगति करै कछु आपतरे, औरनको तारे इतनी मनकी दौर ॥ दर्शन मिले न साधको, निशदिन रहे उदास ॥ ले बैठारो अजर अमर घर, बहुर न आऊं यह देश गोसाई ॥ धर्मदासकी बीनती, सुनियो सत्त कवीर ॥ एक बार एको ना रहिहै, फिर करता कछु और उपाई ॥
शब्द २९८-चेत सबेरा चलना बाट । यह जग देखा झूठा ठाट ॥ टे० ॥ चलनेकी तजबीज न कीन्ह ॥ मजलोंकी खर्ची ना
शब्दावली
(८६७)
लीन्हा ॥ अच्छी राह ताहि ना चीन्हा । अब का सोता गाफल खाट ॥ चंचल मनका घोड़ा कीन्हा । ज्ञान लगाम ताहि दै दीन्हा ॥ होय होशियार बाग गहि लीन्हा । भौसागरके चौडा पाट ॥ मित्र कुटम कोई ना तेरा । यह सब है स्वारथका बेरा ॥ यहां नहीं तेरा निहचल डेरा । इनसे चलना वेग उचाट ॥ मग-माँही ठगवाग लगाया । वह तंबूसा छप्पर छाया ॥ औरनको ठग लड़डू लाया । मार लिया स्वादोंका घाट ॥ तन सरायमें मन अरुझाना, भटयारीके रूप लुभाना ॥ निश वासरसो मनमें दीन्हा । सौदाकर सतगुरुकी हाट ॥ कहै कवीर दयासे पावे । अपनो ज्ञान तोहि समुझावे ॥ तेरे भलेकी राह जनावे । जम कूचलकी पेंच न आवे ॥ बार-बार कहो तोसे डाट ॥
शब्द २९९-मन नेकी करले दो दिनका मिजमानरे ॥ टे० ॥ जोहू लडका कुटम कबीला, दो दिनका तन मनका मेल ॥ अंतकाल उठ चला अकेला तज माया मंडानरे ॥ कहाँसे आया कहाँ जायगा, तन छूटे मन कहाँ समायगा ॥ आखिर तुझको कौन कहेगा, गुरु बिन आतम ज्ञानरे ॥ कौन तुम्हारा सच्चा साई, झूठी है यह सकल सगई ॥ कहाँ सुकाम कहाँ ठिकाना, का बस्ती का नामरे ॥ रहट माल पनघट जो भरता ॥ आवत जात भरा औ रीता, जुगन जुगन तू मरता जीता ॥ क्यों करता अभिमान रे ॥ लाख चौरासी छेखे तासा, ऊंच नीच घर लेता बासा ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधो, जपना गुरुका नामरे ॥
शब्द ३००-मन मौला जाने गुजर गई गुजरानरे ॥ टे० ॥ कोइ दिन रूखा सूखा रांधा । कोइ दिन दूध मलीदा छांदा ॥ कोइ दिन पत्रपरायल कांदा । कोइ दिन रहै हैरानरे ॥ कोइ दिन शाल दुशाला अंगे, कोइ दिन फाटेनंगे ॥ कोइ दिन खासे रंगे