कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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शब्द २८३-बोलन लागी तूती साँची बोल॥टे०॥ दया धरमकी या तन कुंडी, तापर करत किलोल॥ भूल गई सब झूठी बतियाँ, अब जो भई अनमोल॥ सत्तनामकी साँची मिसरी, पी गइ जलमे घोर॥ सुरति निरतिके बने पायडे, आडा सुरति अडोल॥ अष्ट कमल ये आठ पंखुरी, दस खिरकी भइ गोल॥ छुटगौ तूती गरभ बसेरा, मिट गये डामाडोल॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, अब का तेरो मोल॥
शब्द २८४-लोगवा मतलबके गरजी, अब मोहि जान परी॥ टे०॥ जौलौ बैल लदे बनियांके, तौलौ चाह धनी॥ थकित भया कोइ बात न पूछे, फिरता गली गली॥ मोह भरमसे सती होत है, पियके फंद परी॥ हरदम साहब ना पहिचाना, सुरदा संग जरी॥ हरे वृच्छ पंछी दोय बैठे, किया मनोरथकी॥ पंछी उड़ गये पत्ता झर गये, यही रीत है जगकी॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, मनसा विषै भरी॥ मनुवा तो कहु अंते डोलै, जपता हरी हरी॥
शब्द २८५-सूरत मूल ठिकाना जानो । ताहि चीन्हके डोर संभारो, दिग्य दृष्टि पहिचानो॥ टे०॥ का भय पिंड ब्रह्मांडके खोजे, का भय पवन चढाये॥ का भय त्रिकुटी ध्यानके कीन्हे, का भय भँवर गुफाके पाये॥ वह तो सबनसो न्यारा, कायासे भिन्न पसारा॥ मूल डोर पुरुष सहिदानी, हंसन करे उवारा॥ बिन गुरुगम शिक्षा ना पावे, फिर काया ठहरावे॥ जो लग संधि हाथ ना आवे, तो लग भटक़ा खावे॥ गुरु जौहरी भेद बतावे, औघट घाट लखावे॥ सुरति निरति औ शब्द सहायक, गुरुमुख लोक सिधावे॥ कोट ज्ञानसो भिन्न पसारा, कहौ मूल निज बानी॥ जेहि प्रतापसे हंसा बांचे, सो है अगम निशानी॥ मूल ज्ञान