कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
सबही सो न्यारा, संत लेव पहिचानी ॥ कहें कवीर धर्मनि निज मानो, मिटे नरककी खानी ॥
शब्द २८६-अनुरागी निरगुन जोखो हो । जो तुम सुकित अंश हमारे, यह निजज्ञान समोखो हो ॥८०॥ वह सकल घट व्यापक, घट घट रहो समाई ॥ उठत राग अनुराग सरूपी, ताको लखो बनाई ॥ जहाँ मूल उच्चार होत है, बिगसित मधुरी बानी ॥ गरज घुमड अंजोर होत है, चूवत फूही अघ्रानी ॥ अगम पंथ जहाँ पांव टिके नहीं, सो मारग है झीनी ॥ तिल प्रमान जहाँ लगी किंवारी, तहाँ सुरति गम कीनी ॥ जब वह मारग प्रगट उघरिहै, सुनो अमरकी बानी ॥ कहें कवीर धर्मनि निज मानो, मिटे नरककी खानी ॥
शब्द २८७-निजगत कहिये मोही । गुन निरगुन दोनोंकी महिमा, बूझत हैं गुरु तोहि ॥८१॥ को निरगुनको सरगुन कहिये, को करंत को करता ॥ लख चौरासी जिया जूनमें, सर्व मई होय बरता ॥ सुनो संत निरगुनकी महिमा, बूझे विरला कोई ॥ निरगुन फांसमें सबे फंदाने, सुर नर सुनिवर लोई ॥ आदि ब्रह्म निरगुन निहअछर, सो सबहीसे न्यारा ॥ सरगुन सकल व्यापक है माया, ये उलझे व्योहारा ॥ गुरु कवीर तव चरन मनाऊं, सब संतन सिरताजा ॥ धरमदास परदयाजु कीजै, बांह गहेकी लाजा ॥
शब्द २८८-समुझ बिन लाज नदीमें बोरे । जहाँ लाज तहाँ नेह न उपजै, शील समाधी फोरे ॥८२॥ संकुच सनीप हीनता घेरे, मन मलीन झकझोरे ॥ कोध अगिन मोह घन उपजे, ममता मंडल घेरे ॥ लाज लहरकी उठे तरंगा, विरह बूंद विष घोरे ॥ लाज समाय कुमत झरबरसे, कुपथ कुसंगत डोले ॥ ज्ञान देश की राह बिसारे, सतसंगत हित फोरे ॥ सतगुरु खोज लाज तज