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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

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दीजै, वीरघटा मन मोरे ॥ कहै कवीर सतसंगति कीजै, सुमति तरंग हिलोरे ॥

शब्द २८९—जतन विन तन अभिमान उजारे ॥टेका॥ ताते कीजै शील किंवारी, मन बदलहर निवारे ॥ ममता मान महातम भारी, बिरहबान फटकारे ॥ वरषतकाम घट अंधियारी, लाजित मुख बिध टारे ॥ हांक डांक माया मद गरजे, जटाझार झरडारे ॥ डमडम गावे असत जगावे, लालच लहर फंवारें ॥ चारमास चारे पन बरसे, त्रिगुन तत्त्व गुन डारे ॥ पांचो तत्त्व पांचरंगबरसे, पन पन रंग किनारे ॥ बाल किशोर तरुन बृद्धापन, पल-पल चढ़त उतारे ॥ रंगकी लहर तरंग फूँहारे, सरसंधान संभारे ॥ प्रेम भक्ति लौ लीन रहे मन, सुरति निरति संभारे ॥ कहैं कवीर जो सतगुरु सेवै, सो अभिमान बिडारे ॥

शब्द २९०—जतन विन मोह दोहाई पारे ॥टेका॥ पशु पंछी सुर नर मुनि गंधर्व, मोह फांस ना टारे ॥ मोह महामद बिरह विकारी, समता धीर बिडारे ॥ मन मकरंद कंद सबहीके, रज तज बिरस सुधारे ॥ लालच ललित कुपंथ कुबानी, कुकरम कुमति पसारें ॥ लाज सकुच तृष्णाके बांकुरी, सत्य सुमति मतवारें ॥ पारखंड हेत कठोर मूढमत, शीलकी रास बिडारे ॥ जड अज्ञान दशा अतिचंचल, क्षमा धीरज झझकारे ॥ सतगुरु खोज शब्द सरसाजे, मोह बांकुरी फारे ॥ कहैं कवीर सतगुरु पदपरसे, आप तरे औ तारे ॥

शब्द २९१—जतन विन मिरगोंने खेत उजारे । पांच मिरगवा, पचीस मिरगनी तामे तीन शिकारे ॥टेका॥ अपने अपने रसके कारन, चरत हैं न्यारे न्यारे ॥ अति बलवंत बढ़ै ना काहू, बिड-