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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(८६३)

दीजै, वीरघटा मन मोरे ॥ कहै कवीर सतसंगति कीजै, सुमति तरंग हिलोरे ॥

शब्द २८९—जतन विन तन अभिमान उजारे ॥टेका॥ ताते कीजै शील किंवारी, मन बदलहर निवारे ॥ ममता मान महातम भारी, बिरहबान फटकारे ॥ वरषतकाम घट अंधियारी, लाजित मुख बिध टारे ॥ हांक डांक माया मद गरजे, जटाझार झरडारे ॥ डमडम गावे असत जगावे, लालच लहर फंवारें ॥ चारमास चारे पन बरसे, त्रिगुन तत्त्व गुन डारे ॥ पांचो तत्त्व पांचरंगबरसे, पन पन रंग किनारे ॥ बाल किशोर तरुन बृद्धापन, पल-पल चढ़त उतारे ॥ रंगकी लहर तरंग फूँहारे, सरसंधान संभारे ॥ प्रेम भक्ति लौ लीन रहे मन, सुरति निरति संभारे ॥ कहैं कवीर जो सतगुरु सेवै, सो अभिमान बिडारे ॥

शब्द २९०—जतन विन मोह दोहाई पारे ॥टेका॥ पशु पंछी सुर नर मुनि गंधर्व, मोह फांस ना टारे ॥ मोह महामद बिरह विकारी, समता धीर बिडारे ॥ मन मकरंद कंद सबहीके, रज तज बिरस सुधारे ॥ लालच ललित कुपंथ कुबानी, कुकरम कुमति पसारें ॥ लाज सकुच तृष्णाके बांकुरी, सत्य सुमति मतवारें ॥ पारखंड हेत कठोर मूढमत, शीलकी रास बिडारे ॥ जड अज्ञान दशा अतिचंचल, क्षमा धीरज झझकारे ॥ सतगुरु खोज शब्द सरसाजे, मोह बांकुरी फारे ॥ कहैं कवीर सतगुरु पदपरसे, आप तरे औ तारे ॥

शब्द २९१—जतन विन मिरगोंने खेत उजारे । पांच मिरगवा, पचीस मिरगनी तामे तीन शिकारे ॥टेका॥ अपने अपने रसके कारन, चरत हैं न्यारे न्यारे ॥ अति बलवंत बढ़ै ना काहू, बिड-

(८६४)

कवीरपंथी—

रत नाहिं बिडारे ॥ तन कर बारी मन कर बिझुका, गुरुका शब्द रखवारे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, मानो शब्द हमारे ॥

शब्द २९२—पतिबल जनके मोह निवारे छाडो दुख जंजाल सुमतिधर, माया मदहिं विसारे ॥ टेक ॥ मोह तजे निरमोही होवे, मोह फंद सब टारे ॥ तजे प्रपंच जोग तब पूजा, तीनों ताप संभारे ॥ तीरथ बरत प्रतिमा अस्थापन, डिभ कपट सब जारे ॥ तज प्रपंच विकार बाजी सब, जंत्र मंत्र विकारे ॥ विद्या वेद पुरान नाद मद, छंद बंद निरवारे ॥ नट नाटक तज भगति अराधे, तीनों पछ उबारे ॥ चार अचार वरन आश्रम तज, केवल भक्ति सुधारे ॥ कहैं कवीर सतगुरु बल बांचे, उतरि जास भौ पारे ॥

शब्द २९३—अपना काम संभारो भाई । सतगुरु शब्द गहौ चितलाई ॥ टेक ॥ मन औ काम कालके फंदा, एही फंदो संसारा ॥ विरला संत कोउ काम संभारो, पहुंचे लोक मंझारा ॥ नारी अपनी नार पराई, नार नार सब एका ॥ अपना नार दोष कहु नाहीं, सुकित करो विवेका ॥ नार पराई अपनीकै देखै, सो नर पार न पावै ॥ पूरे ठीक पिंडसे छूटे, चौरासी भरमावे ॥ नार पुरुष हमहीं रच लीन्हा, जीवन जुगन बँधाय ॥ कहैं कवीर कोई संत विवेकी, तनके काम बहाया ॥

शब्द २९४—तेरी काया मद्धे सार । सतगुरु पाया दीन दयाल ॥ टेक ॥ इस बोलतेका खोज करना, जीवतेही उल्टा मरना काहे को जमंडंड भरना ॥ उत्तर पैलै पार । महलकी जब सुधपाई, चीन्ह लीन्हा प्रान भाई ॥ अनंत मूरत दिष्ट आई, होगये निह-चल मिटे दुचितार्ई ॥ ऐसा तत्त्व बिचार ॥ कंद भीतर नाद गाजे ॥ जरा मरन उपाधि भाजे ॥ सुन्न महलमें उनमुख साधे ॥

शब्दावली

(८६५)

पावे पद निरवान ॥ ये तीनों है जमकी बाजी, अगम पंथ बैठे अविनाशी ॥ कहें कवीर सुन गोरख जोगी, चीन्ह ता निज-सार ॥

शब्द २९५-साहब ऐसा अपरंपार जाका सत्यशब्द आधार ॥टेक॥ ब्रह्मा जाको खोजत धावे । वेद किताब पार नहीं पावे । सुर नर मुनि बहुते पछतावे ॥ अस्तुति करे पार न पावे । बिना विवेक विचार ॥ पिंड ब्रह्मंड कथे ब्रह्मचारी । जबलग कायाके मंझारी ॥ काया जरबर होवे छारी । जाके आगे वस्तु अपार ॥ पावे तन मन पार ॥ षट् दर्शन मिल कथे जो ज्ञाना । अस्थिर चरका मरम न जाना । फिर फिर जोनी आय तुलाना । जमके हाथपरे पछताना ॥ कियो न तत्त्व विचार ॥ जो लग रहे कामिनि अर्धंगा । चरचा करे क्रोधके संगा ॥ इनसे भक्ति होत है भंगा ॥ जौलग नहीं पांचो एकसंगा ॥ छूटे न कपट लबार ॥ ये तीनों परंपंची देवा । जीव लगावे अपनी सेवा ॥ करे प्रपंच लखै ना भेवा । उन जीवनको लगे न खेवा ॥ बूडे कालीधार ॥ जहाँ नहीं मन मनसा दोई । आशा तृष्णा लखै न कोई ॥ पाप पुन्य तहाँ एक न होइ । निरभय नाम जपो नर सोई ॥ छूटे सकल विकार ॥ सतगुरु मिलै तो लागे तीरा । जम जालिमके मेटे पीरा ॥ हंसा होय ऐसे मतके धीरा । निरभय पद सतनाम कवीरा ॥ आवा-गमन निबार ॥

शब्द २९६-ऐसा जानता कोई ख्याल ऐसा ॥टेक॥ धरती बेध पतालहिं जावे । शेषनागको बसकर लावे ॥ बासुक अहे सत्यका सारा । निश वासर जाका विस्तारा ॥ कमठ पीठपर साल ॥ पूरबमें पछमको लावे । अंधाधुंधका भेद मिटावे ॥ दच्छिन कवीरपंथी शब्दावली २८

(८६६)

कवीरपंथी-

शिला द्वार दे राखा । उत्तर दिशा सजीव न चारखा ॥ चार दिशाको हाल ॥ दिनके सोध रैनमें लावे । रैनके भीतर भानु जगावै ॥ भानुके भीतर शशिखा बासा । शशिके भीतर दिवस प्रकाशा ॥ ताबिच सार न तार ॥ नौको सोध सिलसिला लावे ॥ एक बार सुमेर डुलावे ॥ मेरु दंडपर आसन लावे । मन मुख धागा सुरति गहावे ॥ गगन गुफाके हाल ॥ गगन गुफामें अति उजियाला । अजपा जाप जपे तहां माला ॥ वीना शंख सहनाई बाजे ॥ चहुँदिश राय निरंजन गाजे ॥ हीरा जनम मोहाल ॥ कहैं कवीर कोइ बिरला पावे । जाको सतगुरु अलख लखावे ॥ क्षमा शील संतोष समाई । दया गरीबी आवे भाई ॥ सो चले हमारे नाल ॥

शब्द २९७-शब्द जहाज चढो रे मन भाई ॥ टेक ॥ कर करता से कौल गरभमें लिया बसेरा ॥ माताको दुख दिया मास नौ रहा अकेला । शिर नीचे पग ऊपर ॥ करतासे करे पुकार ॥ त्रिगुन फंद निरवारो स्वामी । अब ना आऊं यह देश गोसाई ॥ बालापनमें भूल नाम, हिरदे ना लीन्ह ॥ तरुनापन जब लगा, मोह त्रियासे कीन्ह ॥ आये बुढापा बावरा मुखसे कहे न नाम ॥ तीनों पन ऐसेमें खोई, नर देही बेबाद गवाई ॥ भगति करै कछु आपतरे, औरनको तारे इतनी मनकी दौर ॥ दर्शन मिले न साधको, निशदिन रहे उदास ॥ ले बैठारो अजर अमर घर, बहुर न आऊं यह देश गोसाई ॥ धर्मदासकी बीनती, सुनियो सत्त कवीर ॥ एक बार एको ना रहिहै, फिर करता कछु और उपाई ॥

शब्द २९८-चेत सबेरा चलना बाट । यह जग देखा झूठा ठाट ॥ टे० ॥ चलनेकी तजबीज न कीन्ह ॥ मजलोंकी खर्ची ना

शब्दावली

(८६७)

लीन्हा ॥ अच्छी राह ताहि ना चीन्हा । अब का सोता गाफल खाट ॥ चंचल मनका घोड़ा कीन्हा । ज्ञान लगाम ताहि दै दीन्हा ॥ होय होशियार बाग गहि लीन्हा । भौसागरके चौडा पाट ॥ मित्र कुटम कोई ना तेरा । यह सब है स्वारथका बेरा ॥ यहां नहीं तेरा निहचल डेरा । इनसे चलना वेग उचाट ॥ मग-माँही ठगवाग लगाया । वह तंबूसा छप्पर छाया ॥ औरनको ठग लड़डू लाया । मार लिया स्वादोंका घाट ॥ तन सरायमें मन अरुझाना, भटयारीके रूप लुभाना ॥ निश वासरसो मनमें दीन्हा । सौदाकर सतगुरुकी हाट ॥ कहै कवीर दयासे पावे । अपनो ज्ञान तोहि समुझावे ॥ तेरे भलेकी राह जनावे । जम कूचलकी पेंच न आवे ॥ बार-बार कहो तोसे डाट ॥

शब्द २९९-मन नेकी करले दो दिनका मिजमानरे ॥ टे० ॥ जोहू लडका कुटम कबीला, दो दिनका तन मनका मेल ॥ अंतकाल उठ चला अकेला तज माया मंडानरे ॥ कहाँसे आया कहाँ जायगा, तन छूटे मन कहाँ समायगा ॥ आखिर तुझको कौन कहेगा, गुरु बिन आतम ज्ञानरे ॥ कौन तुम्हारा सच्चा साई, झूठी है यह सकल सगई ॥ कहाँ सुकाम कहाँ ठिकाना, का बस्ती का नामरे ॥ रहट माल पनघट जो भरता ॥ आवत जात भरा औ रीता, जुगन जुगन तू मरता जीता ॥ क्यों करता अभिमान रे ॥ लाख चौरासी छेखे तासा, ऊंच नीच घर लेता बासा ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधो, जपना गुरुका नामरे ॥

शब्द ३००-मन मौला जाने गुजर गई गुजरानरे ॥ टे० ॥ कोइ दिन रूखा सूखा रांधा । कोइ दिन दूध मलीदा छांदा ॥ कोइ दिन पत्रपरायल कांदा । कोइ दिन रहै हैरानरे ॥ कोइ दिन शाल दुशाला अंगे, कोइ दिन फाटेनंगे ॥ कोइ दिन खासे रंगे

(८६८)

कवीरपंथी—

चंगे, कोइ दिन तोरे तानरे ॥ कोइ देवल कोइ दिन महजित ॥ कोइ दिन बाग बगीचा बाडी, कोइ दिन रहे वृक्षकी छाँहीं ॥ कोइ दिन रहे मैदानरे ॥ हिलमिल रहना देखे खाना ॥ नेकी बात सिखाते रहना ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जपना निर- गुन नामरे ॥

शब्द ३०१—मारगमें लूटे पांच जनी ॥ टे० ॥ पांच पचीसने रोके बाटा, साधू चढगये औघटघाटा जाय लिया उन उबट बाटा, जो न उबारो आप धनी ॥ आशा तुज्जना नदिया भारी, बहिगये संत बडे ब्रह्मचारी ॥ जो उबरे सो शरण तुम्हारी, शिर- पर चमके सेल अनी ॥ संकट लूटे नेजाधारी, उनकी रहयत कोन बिचारी ॥ त्रिदेवा लूटे सब झारी, चमके निरगुन तीन अनी ॥ बनमें डसलिये मुनिजन नागा, डसलियो ममता उन उठ भागा ॥ जाके कान गुरू ना लागा, शृंगीऋषि सो आन बनी ॥ मारग बांका पथ दुहेला, रामानंद कीन्हें तहँ मेला ॥ साहेब कवीर देत जहाँ हेला, सुनिये सिरजन आप धनी ॥

शब्द ३०२—देखके मगन भये गगन बहारवा ॥ टे० ॥ रतन- सिंहासन पुरुषबिराजे, कोट भानु छबि निरखत लाजे ॥ माथे क्रीट मनोरथ राजे, चात्रिक भई लख दरस अपार वा ॥ विन- पग निरत होत जहाँ रुमझुम, घुंघुर बाजे छुमछुम ॥ ताथेइ ताथेइ नाचे ठुमठुम, तबला बाजे गुमगुम ॥ उठत राग छत्तीस उचरवा ॥ अरर अरर जहाँ अरबी बाजे, झरझर झरझर झालर साजे ॥ किडधो किडधो नौबत गाजे, शब्द सुहावन मुरली बाजे ॥ सहनाई सुर बजत विशालवा ॥ भरो अमोलक अमी- सरोवर, पीवत हंसा करे कुतूहल ॥ लगी सुधा जहाँ झुरझुर झुरझुर ॥ मन भौरा जहाँ करत गुंजारवा ॥ लीला देखि भयो

शब्दावली ।

(८६९)

मन अस्थिर ॥ विषय वासना छूटी तत्पर ॥ मोतीदास कहैं धनधन सतगुरु उलट अभी पी पायो निजघर ॥ सत्यनाम सोई है निज सारवा ॥

शब्द ३०३-मनुष तन पायके तुस । भजलो सिरजन हार ॥ टे० ॥ कैसे रहे अचेत कबै फिर औसर पैहो ॥ फिर न मिले ऐसो दाव, बहुर पाछे पछतैहो ॥ लखचौरासी जियाजूनमें, मानुष जन्म अनूप ॥ ताहि पाय चेतत नाहींरे, कहा रंक भूप ॥ गरभ बासमें कौल किया मैं, भजिहौं तोही ॥ निशदिन सुमरों नाम, कष्टते काढो मोही ॥ एकनामको जानके, रहों नाम लौलाय । नेक न तोहि विसारिहौं, या तन रहे की जाय ॥ इतना किया करार काढ प्रभु, बाहर कीन्हा ॥ भूल गये वह बात भये माया आधीना ॥ भूली बतियाँ वा दिनकी, आय गई मत आन ॥ बाराबरस तो ऐसे बीते, खेलेत फिरत नदान ॥ तरुनापन जब लगा, देह जोवन मदमाता ॥ चलत निनारे छाँह, तमकके बोले बाता ॥ चोवा चंदन लायके, पहिरे बसन बनाय ॥ गलियारे झाँखत फिरे, परत्रिया देख मुसकाय ॥ तरुनापन गये बीत, बुढापा आय तुलानो ॥ कंपन लागे शीश, चलत दौय चरन पिरानो ॥ नैन नासिका चूवन लगै, मुखसे न आवै स्वास ॥ वात कफने घेर लिया है, छूट गया तन आश ॥ माता पिता सुत नार, कहो काके संगलागी । तन मन धन बरजत नहीं, कामिन होत सुभागी ॥ एकदिन काल गरासई, परिहो जमके दाव ॥ बिन सतगुरु ना बाँचहूँ, कोटन करो उपाय ॥ सुफल भई या देह, नेह साहेबसो कीजै ॥ सतगुरु दाता आहि, मुक्तपद उनसे लीजे ॥ सुफल भई मनकामना, सुमरन लागे पीर ॥ यह लीला है मुक्तिकी, गावे साहेब कवीर ॥

(८७०)

कबीरपंथी-

शब्द ३०४-का सोचत बारमबारा, प्रभुका नाम न लेत गँवारा ॥ टे० ॥ बाजीगर डंक बजाया, सब लोग तमाशे आया ॥ बाजीगर डंक सकेला, तब रहगये आप अकेला ॥ मनुवां जहाँ हाट लगाया, दुनिया सौदागर आया ॥ सौदागर सौदा कीन्हा, बिरले सौदागर चीन्हा ॥ जब पार उतरना चाहिये, तब खेवटसे मिल रहिये ॥ जब उतर गये भौपारा, तबको हमको संसारा ॥ जब वस्तु अगोचर चाहिये, तब दीपक बारत रहिये ॥ जब वस्तु अगोचर पाई, तब जोतमें जोत समाई ॥ जब मुखडा देखन चाहिये, तब दरपन मांजत रहिये ॥ जब दरपन लागीं काई, तब दरशन कहाँते पाई ॥ जब फूल पत्र फल चाहिये, तब विरवा सींचत रहिये ॥ जब फूल पत्र फल लागा, तब दिलका दुविधा भागा ॥ साहेब कबीर कहे हम जाना, जानेसे मेरा मन माना ॥ कहनेसे नाँहि पतीजे तो मूरखसे का कीजे ॥ ✽

शब्द ३०५-कोई लोढ़िरे संत सुजान, काया बन फूल रही ॥ टे० ॥ एकहि एक मिले गुरुपूरा, मूलमंत्र जो पावे ॥ साधु संतकी बानी बूझै, मन परतीत बढावे ॥ दूजे तनकी दुविधा मेटे, दूजा भाव न लावे ॥ भीतर बाहर एक देखे सो वह संतहि पावे ॥ तीजै तीनों गुनसे न्यारा, तिरबेनी अस्नाना ॥ त्रिकुटी महलमें आसन मारे, अनहद धुन सुन काना ॥ चौथे चंचल बसकर राखे, चतुराई सब त्यागे ॥ चढके प्रेम हिंदोरा झूले, गुरुसो भगति वर मांगे ॥ पांचे पांच तत्त्व प्रकासे, पांचो इंद्री साधे ॥ पकड़ पवनकापरचे करके, मनओ पवन गहि बांधे ॥ छठयें छऊ चक्रको बेधे, षट दल होय प्रकाशा ॥ इंगला पिंगला मारग सोधे, करै गुफामें बासा ॥ साते सत बचन परकासे, सत्य सुरत लखि आवे ॥ मकरतारकी डोरी गहिके, अजर अमर घर

शब्दावली

(८७१)

पावे ॥ आठे अष्ट कमल दलफूले, घट उजियारी होई ॥ आतम होय परमातम चीन्हे, संत कहावे सोई ॥ निरख देख नोमीके द्वारा, जब गुरु पूरा पावे ॥ अहे संधि कायासे न्यारी, जो गुरु संधि लखावे ॥ दसई दसो द्वारको पावे, पटले एक पहारा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, बहुतन साधो आरा ॥

शब्द ३०६—दोय नैनोके बीच सुसाफिर रमरहुरे ॥ ॥ टे० ॥ धोबी धोवे कापडा, झांझ मऊके घाट ॥ मछरी साबुन लेगईरे, धोबिया गा बारह बाट ॥ धोबिनियां लुट गईरे ॥ कोठी ऊपर कोठरी, जहाँ चढ बोले मोर ॥ मोर बिचारा का करे, घरमें घुसगा चोर ॥ सबी धन लुटि गयोरें, सँराक कुवा पताल जल-पानी, लंबी लागी डोर ॥ थरहर कंपे बाला जियरा, को प्रेमी लेत निचोर ॥ सुघर घर होय रहोरें कहें कवीर सुनो भाइ साधो, सौदा करले हाट ॥ हाट उसल गये सौदा बिक गये, होगये बारा-बाट ॥ जहाँके तहाँ होय गयोरें ॥

शब्द ३०७—मिलना कठिन है मैं कैसे मिलों पिय जाय ॥ टे० ॥ अगम भूमि जहाँ महल पियाको, हमपे चढयो न जाय ॥ औघट घाट गैल रपटीली, पांव नहीं ठहराय ॥ सावधान पग धरो पंथ-पर, बार बार डिंगजाय ॥ अति बारीक पंथ बहु झीना, सुरति झकोरा खाय ॥ लोकलाज मरजाद जगतकी, देखत मन सकु-चाय ॥ जो या बात नये जोबनकी, लाज तजी ना जाय ॥ दूजे सतगुरु मिले पंथपर, मारग दिये बताय ॥ साहेब कवीर मुक्ति के दाता शीतल अंग लगाय ॥

शब्द ३०८—सोहागिन चेत करो तोरे आवागमन नगिचाय ॥ टे० ॥ बालापनमें खेल गँवाये, चलिया चाल कुचाल ॥ कोन जबब देहु मोरि सखियां साहेब पूछ हवाल ॥ समुझ बिनका

(८७२)

कवीरपंथी—

करवे ॥ सतसुकृतकी चूनरि पहिरो, सत मत रंग रंगाव ॥ प्रेम- तन्वके मांग सँवारो, निरभे सिंदुर लाव ॥ घुंचट पट खोल चलो तुम ससुरे, नेहर नाहिं निबाह ॥ नेहर नेह पैहों सखियां, मत तुम भरम भुलाव ॥ भुलाने पिया न पैहो ॥ आगे इत भौसागर, गहिरा सूझे वार न पार ॥ किस बिध पार उतरबे सखिया, बिन खेवट कडिहार ॥ खेवइया बिनका करबे ॥ कहें कवीर सोई सहवाती, पियरंग राजी होय ॥ अमर लोक अस्थाना पावौ, तब तोर अटल सोहाग, मंडल बिसराम करो ॥

शब्द ३०९.—सबका साक्षी मेरा साईं । ब्रह्मा विष्णु रुद्र ईश्व- रलो, औ अद्याकृत ताईं ॥ टे० ॥ पांचपचीस सो सचै करले, ये सब जग भर माया ॥ अकार उकार मकार मात्रा, इनके परे बताया ॥ जागृत सपन सुषोषत तुरिया, इनते न्यारा होईं ॥ राजस तामस सात्त्विक त्रिगुन, इनते न्यारा सोईं ॥ सूछम अस्थूल आनंदमय कहिये, इन मिल भोग बखाना ॥ राजस तेज प्रकाशहि कहिये, इनते न्यारा जाना ॥ परा पसंति मधमा वैखरी, चौबानी प्रपंच प्रमाणी ॥ पंचकोश नीचे कर देखो, इनमो राम न जानी ॥ पंचज्ञानके पंच कर्म हैं, दस इंद्रि मानो ॥ चतुष्ट अन्तहकरण बखाने, इनमो राम न जानो ॥ कुर्मसेष किरकला धनंजय, देवदत्तहू देखो ॥ चौदा देव इंद्रिया चौदह, इनमें अलख न पेंखो ॥ तत पद त्वं पद और असि पद, बाच्य लच्छ ससु- झावे ॥ कहें कवीर सोईं गुरु पूरा, न्यारा कर बतलावे ॥ पं ❁

शब्द ३१०.—सब औगुनका सिर अभिमान । तेउ न मूढ तंज अज्ञान ॥ टे० राजस जग्य नृपतिने कीन्हे, सुर नर मुनि अचवे जलपान ॥ संख पंचायन तबहीं बाजे, सुपचभगत रस लीन्हों सान ॥ यही चूक चूके लंकापति, काटे शिर दशरथ सुत आन ॥

शब्दावली

(८७३)

दुर्घोषनके मेवा त्यागे, दासी सुत घर गये भगवान् ॥ झूठे बेर सेवरी के खाये, प्रेम प्रीत हित अपने जान ॥ शुक्रदेव मुनिसे को बड होई, इंद्री जीत विष डारो छान ॥ वैकुंठमें आदर नाही, कृपा भई न सुने गुरुज्ञान ॥ जोग जग्य व्रत तप कर संयम, चार वेद औ सुने पुरान ॥ कहें कवीर थीर नहिं लागै, जो लग संत नहीं पहचान ॥

शब्द ३११-धनहो धन्य बलखके मीरा । अपने जीव मुक्ति के कारण, सब तज भये फकीरा ॥ टेक ॥ तखतहु छोड दुलीचा छोडा, अंमारीके मीरा ॥ कोटन कोट खजाना छोडा लाल जँवाहर हीरा ॥ जाके पग हुरमनसे मलते, ऐसे नरम शरीरा ॥ बिन पादत्रान बन बन डोले, कसकत नहीं शरीरा ॥ सोरा सहस सहेलरि छोडे, खासा मखमल चीरा ॥ तुरी लाप अट्टारा छोंडे, लगा शब्दके तीरा ॥ धन्य तुम्हारे मात पिताको, जाके पिये तुम छीरा ॥ धन तेरी करतूत कमाई, धन तेरे गुरुपीरा ॥ ज्यों-हारिल लकरीको पकरे, यों मत गहिर गंभीरा ॥ कहें कवीर ऐसी लौलावे, साहेब हाल हजूरा ॥

शब्द ३१२-सुलतानसोबलकबुखारेका ॥ जाके खाना अजब सरहना, मिसरी कंद छोहारेका ॥ टेक ॥ जाकी सुरति लगी कदमसो; अछह पीर पियारेका ॥ जाके सेज फूलसो विछती, करते सुख तन सारेका ॥ अब तो घास बिछावन लागे, मुठी एक गलियारेका ॥ जाके संग कटक दल बादल, झंडा न्यारे न्यारे का ॥ माल सुलक तज लई फकीरी, धनसो कीन्ह विचारेका ॥ जो तनके चोला जोबनते, सवा टंक सब सारेका ॥ सो तो बोझ उठावन लागे, मन दस गूदर भारेका ॥ जासुख चीज नेवाला खाते, करते जीव अहारेका ॥ सो अब रूखा पावन लागे, टुकरा

(८७४)

कवीरपंथी

शाम शकारेका ॥ आदमसे होगये औलिया, एक शब्द निर- बारेका ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, फकर आद अखाडेका ॥

शब्द ३१३-दिवाने बंदे का गावे घर दूर ॥ टे० ॥ अनल हक हककर बोले, सूली दिया मनसूर ॥ सेख फरीद कुवामें लटके होगये चकनाचूर ॥ साह सुलतान बलख तज निकसे, छाँडे सोरहसौ हूर ॥ गोरख गोपीचंद भरथरी, शिरमें डारे धूर ॥ नानक नामा औ बाजिंदा, झिलमिल दरसे नूर ॥ खोजत खोजत उमर सिराने, ना पहुंचे रहे दूर ॥ या कलियुगके नर पाखंडी कबहुं न रहत हजूर ॥ इनके मनमें कुफर बसत है, मायाके मग हर ॥ गोरख काया खोज भुलाने, ना पाया भरपूर ॥ कहैं कवीर दया सतगुरुकी, सब घट दरसे नूर ॥

शब्द ३१४-अबहम सबही मध्य विराजे ॥ दोय दल जोर दिखावैं कौतुक, हम जूझें हम भाजें ॥ टे० ॥ हस्ती चीटी लख चौरासी, लघु दीरघ हत खेलें ॥ उत्पति परले खेल हमारा, आप पसा रस केलें ॥ त्रिभुवन सार सकल रसभोगी, घटघट हमरी पूजा ॥ सरग नरक दोउ खेल हमारा, हम बिन और न दूजा ॥ हमही देव असुर सुर राच्छस, हम ऋषि मुनि हम देवा ॥ हमही ठाकुर आप पुजारी, हम साहब हम सेवा ॥ अवनि अगिन जल पवन सुर शशि, हम जगसैं प्रगटाया ॥ कहैं कवीर तत दरसी जाने, कहेसे को पतियाया ॥

शब्द ३१५-मेरे जान मुझे न दिलसे भूल ॥ टे० ॥ डार डारमें, पात पातमें तुम्ही रंगीला फूल ॥ है हाजरको दूर बतावे, का नियरे का दूर ॥ मक्का दूढा मदीना दूढा तबहुं न मिलत रसूल ॥ स्याही गई सपेदी आई, कर चलनेका सुर ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, सब घट दरसे नूर ॥

शब्दावली

(८७५)

शब्द ३१६-साईका अरस तखत है दूर ॥ बिन सुरसद कोई भेद न पावै, भटक सुए सब कूर ॥ लाज छोड़ जिन काज किया है, भया कदमका धूर ॥ चौदा तबक खावकी रचना, ज्यों आतसका फूल ॥ जो निजके कोई समुझे बूझे, इसमें नहीं सहूर ॥ नासूतमें माया खड़ी, मलकूत गुन अस्थूल ॥ जबरूतमें जंजालह लाहूत अच्छर फूर ॥ हाहूतमें अर्चितपुर, बाजत अनहद तूर ॥ वेद पुरान कुरान कहिये, इहाँ लौं खबर हजूर ॥ सात सुन्न दोय बेसुन कहिये, दसो धाम निज मूल । ईछा सोहैं उहाँसो आये, घट घट व्यापक नूर ॥ कहैं कवीर हम खुदके अहदी, लाये हुकम हजूर ॥ सब रहनके दर्द जानके, संप्रथ वचन कबूल ॥

शब्द ३१७-जगतमें काहु न मन बस कीन्ह ॥ टेक ॥ भरथ खंडमें भरथ जोगी, भुग सुत मन हर लीन्ह ॥ ता कारन नर दोष लगाये, भरथ देह दोय दीन्ह ॥ सूखे पत्र पवन भस्व रहते, पारा सुरसे ज्ञानी ॥ तिनहुँ रूप देख बनिताके, कामकंदला ठानी ॥ शृंगीऋषी बन भीतर रहते, बिषै विकार न जाना ॥ पठई नार भूप दशरथने पकर अजोध्या आना ॥ पारबतीसी पतनी कहिये, तिनके मन क्यों डोला ॥ छकित भये शिव देख मोहनी, हाहा करके बोला ॥ सोरा सहस उरवसी जाके, ताका मन बौराना ॥ गौतम ऋषिकी नार अहिल्या, ताहि देख ललचाना ॥ नारद मुनिसे तपसी कहिये, कन्या हाथ दिखायो ॥ मांग्यो रूप भूपश्रीपतिको, स्वांग बंदरको लायो ॥ जमदग्नी जाके नारि रेनुका, जात जमुना जल भरने ॥ मोही देख भूपके मंदिर, छकित भये दोयनैने ॥ एकहि नाल कमलसुत ब्रह्मा, जग उपराज कहायो ॥ कहैं कवीर एक नाम भजन बिन, जिव बिसराम न पायो ॥

(८७६)

कवीरपंथी-

शब्द ३१८-अलख हमारे राजा जाके बाजत अनहद-बाजा ॥ टेक ॥ शंकरसे जाके जोगी कहिये, ब्रह्मासे ब्रह्मचारी ॥ सुर-पतिसे जाके सुरता कहिये, कृष्णसे औतारी ॥ सात समुंदर शायर कहिये, अनगिनती नदि नारा ॥ अठरा भार रोमावसि कहिये, गिरि परवतसे भारा ॥ भूपति एक महाबलि राजा, चहुँ दिशि फिरे दोहाई ॥ अनंत कोट करताके बागो, यहां प्रगटे ठकुराई ॥ तन बिन मेख तारबिन तंबू, ऐसा तंबूताना ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, तंबू माँहि समाना ॥

शब्द ३१९-पाछे समुझ परेगा भाई ॥ टेक ॥ इहाँ अहार उदरभर कीन्हें बहुविधि मांस कढाई ॥ जीव जंत बहु झटका मारे, यह लेखा सब जाई ॥ इहवाँ लूट खावत तुम परधन, गले फाँसरी लाई ॥ सात सिपाही आगे पाछे, पल पल खबर जनाई ॥ या जग आये राज कराये, पातुर भांड नचाई ॥ एक बुंदके कारन मेरे, कुलके धरम नशाई ॥ ईहां तो कीन्हें साधुकि निंदा सातो जनम नशाई ॥ पैग पैग जम कांटा गाडे, उलटा फाँस लगाई ॥ सांच कहाँ तो मारन धावे, झूठा जग पतियाई ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, भरम भूल दुनियाई ॥

शब्द ३२०-निगम सुत कोन ऋषी उबरे ॥ टेक ॥ प्रथमें ब्रह्मा विष्णु भुलाने, जननी सो बिगरे । सत्यभक्ति जाने बिन डुरलभ, कहु कोने उबरे ॥ नारद मुनि जो डुरमति कीन्हें, बन-चर रूप धर । पराशरऋषि कुहरा उपराजे, पुत्रीसों बिगरे ॥ आसन मार जंगलमें बैठे, वृच्छके चाम चरे । सो भगवान भोगके कारन, शृंगीऋषि बिगरे ॥ दूब अहार कीन डुरबासा, अन्नको त्याग करे । ममता जोर रहे कायामें, इंद्रसभा बिगरे । गुरुगनेश बुद्धिके सागर, शिवके पास खडे । चले अजोग जोग

शब्दावली

(८७७)

के कारण, नीरंजन बिगरे ॥ चौदालोक वेदको मंडल, जहां लग व्यास पड़े । सोरा खंड अच्छर भगवाना, उपजके बिनस मरे ॥ सत्राखंड पर अधर दीप जहां, शब्द अतीत खड़े । ताके आगे चार धाम है, रैन दिवस न टरे ॥ लोमस हंस मिले साहेबसों, चहुं जुग मुक्ति भरे, कहें कवीर सुनो मतिमंदा, सो हंसा उबरे ॥

शब्द ३२१-नानक ऐसा न्याय निवेरो । कलह कालकी ज्वाल न झंपे, मिटे भरमके फेरो ॥ टेक ॥ जो तन तंबू बहु विस्तारा, बिनही मेख लगाना ॥ महातत्त्वका लकडा गाडो, पांच सदर ले ताना ॥ जैसे घटा आवमें ढूबे बिन सीझेना बाजे ॥ पांच तत्त्वके मिश्रित लागी सहजे करत अवाजे ॥ जैसे जंत्री जंत्र बजावे, बाजे सोई बजावे ॥ वाजत है पर दीसत नाही, ताकौ कहा लखावे ॥ चाम महलमें बानी बोले, रूप सवाया रानी ॥ ना जानो यह कहाँसे आया, बिनसे कहाँ समानी ॥ तत है वितमें वित है ततमें, तत बित कहिये सोई ॥ पहले देखै ब्रह्म आरसी, दूजा धोखा होई ॥ कहें कवीर फकीर फिकर तज, न्याय सहित रहो भाई ॥ आवा जाई झूठ कल्पना, सहजे रहो समाई ॥

शब्द ३२२-मन हरना बड हुशियार एकदिन चोरवा आवेगा ॥ टेक ॥ तबल तीर तलवार वरछी, ना बंदूक चलावेगा ॥ आवत जात लखे ना कोई, घरमें दुंद मचावेगा ॥ ना गढ तोरे ना गढ फोरे, ना कछु रूप दिखावेगा ॥ नगरीसे कछु काम नहीं है, तुम्हें पकर लेजावेगा ॥ नहीं सुने फिरियाद सकल पुनि, ऐसा तस्कर आवेगा ॥ लोग कुटम परिवार घनेरे, खोजी खोज न पावेगा ॥ ऐसा है कोई संत विवेकी, नाम भजन गुन गावेगा ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, खोल किंवारी जावेगा ॥

(८७८)

कबीरपंथी-

शब्द ३२३—अन घडिया देवा कोन करे तोरि सेवा ॥ टे० ॥ घडे देवको सब कोई पूजै, जस भीतीका लेवा ॥ जाकी सकलो सृष्टि रची है, ताहि लहे ना भेवा ॥ को निरगुन को सरगुन कहिये को किरतम को करता ॥ आपमें सर्व सर्वमें व्यापक, सर्व मई होय बरता ॥ ब्रह्म विष्णु महादेव कहिये, तिनहुँको लागी टंकिया ॥ पूरन ब्रह्म अखंडित न्यारा, सो करता अन घडिया ॥ दस औतार निरंजन कीन्हा, सो करता ना होई ॥ वे तो आपन करनी भुगते, करता औरै कोई ॥ जोगी जती तपी सन्यासी, आप आप मिल मुडिया ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो, अलख लखै सो तरिया ॥

शब्द ३२४—ननदी जाहुरी महलनको, अपनो बीरन जगाव ॥ ॥ टे० ॥ बीरन जगाये ना जगेरी, लग न सके कछुदाव ॥ काया गठमें भई अंधियरिया, कोन करे वाके भाव ॥ भरमके ताला लगे महलमें, कीमत कुंजी लगाव ॥ कपट किवारिया खोलके तुम, या बिधि पियको रिझाय ॥ भक्ति घाघरा चित्त चुनरिया, चोली चाल सियाव ॥ कर्म मसीकी काजर करले, या बिधि पिया को रिझाय ॥ ज्ञानके दीपक कर गह लीजे, बातीबार लगाव ॥ ततको तेल डार दीपकमें, मगन मसाल जराव ॥ सुरतिके बिजनी करगहि लीन्हा, सेवा सेज बिछाव ॥ शीतल चँवर दार प्रीतमपर, प्रीति पिछोर उठाव ॥ बारंबार मिले नहीं या तन, भूल कोई मत जाव ॥ कहत कमाल कबीर के बालक, फिर ना मिले ऐसो दाव ॥

शब्द ३२५—काह भये मुखराम कहेसे ॥ टे० ॥ अंतर कपट बचन मुख चातुर, अति अधीन होय मनन कियेसे ॥ जैसे भुजंग ओट टाटीके बहु जीवनको हतन कियेसे ॥ जैसे बधिक

शब्दावली

(८७९)

ओट टाटीके बहु जीवनको हतन कियेसे कहें कवीर वाके संग न करिये, बिनती विवेक जिन भेख लियेसे ॥

शब्द ३२६-मोको कहाँ दूँठे बंदे मैं तो तेरे पासमें ॥ टेक ॥ ना मैं बकरी ना मैं चिकवा, ना मैं डुरी गड़ासमें ॥ ना हों मैं खाल पूछमे, ना हड्डी ना मासमें ॥ ना मैं मिलों जोग तप कीन्हें, ना बिराग संन्यासमें ॥ खोजी होय सो तुरत मिलावे, पलभरके तल्लासमें ॥ ना देवलमें ना महजिदमें, ना काशी कैलाशमें, ना मैं आऊं अवध द्वारका, मैतो सांचे आसमें ॥ मैं बसता सैरतमें तेरी, मेरी पुरी मवासमें ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, सब स्वासनके स्वासमें ॥

शब्द ३२७-गाफिला क्यों बिसराया घनी, तेरी सुंदर काया बनी ॥ टेक ॥ काल करंते आजुई करले, आजु करंते अबही ॥ शिरपर तेरा काल खडा है, सुरक जात जस आनी ॥ धीरे धीरे पाँव उठावो, सिद्धिया है अति घनी ॥ या तन तेरी खास मिलेगी, कीरति रहेगी बनी ॥ या भौसागर अगम भरा है, नाव लगी अति झीनी ॥ गुरु मुख गुरुमुख पार उतरगये, निगुरा बूडे अनी ॥ बालापन तरुनापन बीते, देखलेव दरपनी ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, भली बिसाहन बनी ॥

शब्द ३२८-खबर नहीं जगमें पलकी । सुकृत करले नाम सुमिरले, को जाने कलकी ॥ टेक ॥ कौड़ी कौड़ी माया जोरी बात करे छलकी ॥ पाप पुन्यकी बांध पोटरिया, कैसे होवे हलकी ॥ तारन बीच चंद्रमा झलके, जोत झला झलकी ॥ एक दिन पंछी निकस जायगा, मट्टी जंगलकी ॥ मात पिता परिवार भाई बंधु, तिरिया मतलबकी ॥ माया लोभी नगर बसत-

(८८०)

कवीरपंथी-

है, या अपने कबकी ॥ या संसार रैनका सपना, ओस बुंद झलकी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बातें सतगुरुकी ॥

शब्द ३२९-महेरम होय सो लखि पावे, संतो ऐसा देश हमारा ॥ टेक ॥ बेद किताब पार ना पावे, कहन सुनन सो न्यारा ॥ जात बरन कुल किरिया नाही, संध्या नेम अचारा ॥ बिन घन वादर बिजली चमके, बिन सूरज उजियारा ॥ बिन नैनन जहां मोती पो है, बिन सुर सबद उचारा ॥ जैसे बुंद परे दरियामें, ना मीठा ना खारा ॥ सुन्न सिखरपर गजल संगीता, किंनरी बीन सितारा ॥ जो जो गये ब्रह्म तेहि दरसे, गहुअच्छर तत सारा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो पहुँचे गुरुका प्यारा ॥

शब्द ३३०-संतो मूलन बेटा जायो, जिन खोज कुटुम्ब सब खायो ॥ टे० ॥ जनमत खाई ममता भाई, दुख सुख दोनों भाई ॥ पाप पुन्य पारोसी खाये, ओ तृष्णासी दाई ॥ काम क्रोध दोय काका खाये, मन अभिमानी मामा ॥ मोह नगरके राजा खाये, तब पहुँचे सुखधामा ॥ हम बड़ दादा तुम बड़ दादू, देखतही मन मूवा ॥ आनंदरूप बधाई बाजे, तब वह बालक हूवा ॥ ज्ञानी नाम धरे लड़काको, उनकी महिमा गार्ई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सुखमें रहो समाई ॥

शब्द ३३१-हंसा उड़ चल आपन देश, प्रीति पुरानी भयली नारे ॥ टे० ॥ हंसा सिंगलदीपके, उड़ि आये यदि देश ॥ बेघे मोती ना चुगे, हीडे आपन देश ॥ उड़ हंस कोदवारी लागे, मूरख विडारे जाय ॥ अरे अरे मूरख बावरा, कही कोदवा हंस न खाय ॥ ना हंसाके खेती बारी, नहीं बन जावै पार ॥ अन-बेघे मोती चुगे, सो पुरवे करतार ॥ शशि झंपे दरियावमें, मीन चढ़ी अकाश ॥ जानेगा कोइ संत जौहरी, कहैं कवीर कोइ दास ॥

शब्दावली

(८८१)

शब्द ३३२-जो कोइ निरगुन झर लख पावे ॥ टे० ॥ निर- खत कूप कूप बिन वारी, बिन कर रहट चलावे ॥ जल बिन शीश शीश बिन वारी, सो जल आन पियावे ॥ बिन करताल पखावज बाजे, बिन रसना गुनगावे ॥ गावन हारके रूप न रेखा, सो पद आन मिलावे ॥ कदलीपत्र जहर जंगलमें, बिन गुरुके नहीं खावे ॥ उठत सनेह मरमना पावे, आगमके गोह- रावे ॥ जोगी जती तपी संन्यासी, नाहक भेख बनावे ॥ बिना नामके भौरा घूमै, सुख सपने नहीं पावे ॥ पुरहन पत्र बसे नित दाडुर, सोऊ सवाद न पावे ॥ कमल कलीके भौरा लोभी, सौ जोजन उडजावे ॥ काजी हाथ किताब न आवे, मुलना बांग न भावे ॥ वेद पुरान विप्र ना भावे, राजा राज न भावे ॥ कर बिन कलम कलम बिन कागद, बिन मसि अंक बनावे ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, सतगुरु मिले लखावे ॥

शब्द ३३३-संतो समुझैका मतन्यारा, जो आतम तत्त्व बिचारा ॥ टे० ॥ औरनसो कहें आपा खोजो, आप अपन ना जाने ॥ मुख कछु आन हिये कछु आना, कैसे राम पहिचाने ॥ औरनसो कहें मोह न कीजे, निरमोही होय रहिये ॥ माया मोह सकल आपहिमें, या दुख कासो कहिये ॥ औरनको कहे तजो बडाई, आप बडाई चावे ॥ जोर बडाई छूटत नाही, झीना पीर कहावे ॥ औरनसो कहें पछ न कीजे, आपा पछ न छूटे ॥ कहन सुननको साधु कहावे, सांच कहे रिस छूटे ॥ जौ लग राग द्वेष मन माहीं, अस्तुति निंदा भावे ॥ तब लग तोनों ताप ना छूटे, कहा भये बहुगावे ॥ पद सारखी औरन समुझावे, आपा समु- झत नाही ॥ कहें कवीर राम क्यों दूरसे, मैं तैं छूटत नाही ॥

शब्द ३३४-करोरे बंदे वा दिनकी तदबीर ॥ टे० ॥ लाल

(८८२)

कबीरपंथी—

खंभपर देत ताडना, सहि न सके शरीर ॥ मारमार सुगदर प्राण निकासे, नैनन भर आवे नीर ॥ रंगमहल एक कामिनि वैठी, कर शृंगार गंभीर ॥ दुनियाँ दौलत महल संग न जात शरीर ॥ भौसागरके राह कठिन है, नदिया अति गंभीर ॥ नाव न बारे लोग घनोरे, खेवनवाला बे पीर ॥ जब जमराजा पकर मँगावे, पाँयन परे जंजीर ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, अब ना करू तकसीर ॥

शब्द ३३५—नाम गत पार न पावे कोई ॥ टे० ॥ मच्छ कच्छ बाराहौ मर गये, नरसिंह रूप जो होई ॥ परशराम बलिबावन मरगये, कहो कहा कह रोई ॥ रघुबर मरे मरे वे दशरथ, भरथ शत्रुहन दोई ॥ रावन मार बिभीषण थापे, उनहूके लक विगोई ॥ जडुपति मरे मरे डुर्योधन, एक रात ना होई ॥ पाँच पंडवा सिद्धे हिमाले, मुक्त कहो नरलोई ॥ अंमरीष औ व्यास परी- च्छित, मरत देर ना होई ॥ अज फल खाये धनंतर मर गये, तिनहूकी सुदबुद खोई ॥ कहें कवीर सुनो नर भोंड़, तुमरी कौन गत होई ॥ उपजत विनशत जुग चारों गये, रहत न देखा कोई ॥

शब्द ३३६—जुगवे निशवासर जोग जती ॥ टे० ॥ जैसे ब्रह्मा वेदको जुगवे, शिवको जुगवे पारबती ॥ जैसे सुनार सोनाको जुगवे, घटन न पावे पाव रती ॥ जैसे नार पुरुषको जुगवे, बरत अगिन हो जात सती ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, का गजा- का छत्रपती ॥

शब्द ३३७—बैरागी रामारे मगन फकीरी तेरी पूरी ॥ टे० ॥ हाथ कमंडल बगलमें सोटा, चारों मुलक जगीरी ॥ दिल अंदर दीदार करोगे, आठों, पहर हजुरी ॥ रूखा सूखा साग अलोना