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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८७७)

के कारण, नीरंजन बिगरे ॥ चौदालोक वेदको मंडल, जहां लग व्यास पड़े । सोरा खंड अच्छर भगवाना, उपजके बिनस मरे ॥ सत्राखंड पर अधर दीप जहां, शब्द अतीत खड़े । ताके आगे चार धाम है, रैन दिवस न टरे ॥ लोमस हंस मिले साहेबसों, चहुं जुग मुक्ति भरे, कहें कवीर सुनो मतिमंदा, सो हंसा उबरे ॥

शब्द ३२१-नानक ऐसा न्याय निवेरो । कलह कालकी ज्वाल न झंपे, मिटे भरमके फेरो ॥ टेक ॥ जो तन तंबू बहु विस्तारा, बिनही मेख लगाना ॥ महातत्त्वका लकडा गाडो, पांच सदर ले ताना ॥ जैसे घटा आवमें ढूबे बिन सीझेना बाजे ॥ पांच तत्त्वके मिश्रित लागी सहजे करत अवाजे ॥ जैसे जंत्री जंत्र बजावे, बाजे सोई बजावे ॥ वाजत है पर दीसत नाही, ताकौ कहा लखावे ॥ चाम महलमें बानी बोले, रूप सवाया रानी ॥ ना जानो यह कहाँसे आया, बिनसे कहाँ समानी ॥ तत है वितमें वित है ततमें, तत बित कहिये सोई ॥ पहले देखै ब्रह्म आरसी, दूजा धोखा होई ॥ कहें कवीर फकीर फिकर तज, न्याय सहित रहो भाई ॥ आवा जाई झूठ कल्पना, सहजे रहो समाई ॥

शब्द ३२२-मन हरना बड हुशियार एकदिन चोरवा आवेगा ॥ टेक ॥ तबल तीर तलवार वरछी, ना बंदूक चलावेगा ॥ आवत जात लखे ना कोई, घरमें दुंद मचावेगा ॥ ना गढ तोरे ना गढ फोरे, ना कछु रूप दिखावेगा ॥ नगरीसे कछु काम नहीं है, तुम्हें पकर लेजावेगा ॥ नहीं सुने फिरियाद सकल पुनि, ऐसा तस्कर आवेगा ॥ लोग कुटम परिवार घनेरे, खोजी खोज न पावेगा ॥ ऐसा है कोई संत विवेकी, नाम भजन गुन गावेगा ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, खोल किंवारी जावेगा ॥