कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी-
शब्द ३२३—अन घडिया देवा कोन करे तोरि सेवा ॥ टे० ॥ घडे देवको सब कोई पूजै, जस भीतीका लेवा ॥ जाकी सकलो सृष्टि रची है, ताहि लहे ना भेवा ॥ को निरगुन को सरगुन कहिये को किरतम को करता ॥ आपमें सर्व सर्वमें व्यापक, सर्व मई होय बरता ॥ ब्रह्म विष्णु महादेव कहिये, तिनहुँको लागी टंकिया ॥ पूरन ब्रह्म अखंडित न्यारा, सो करता अन घडिया ॥ दस औतार निरंजन कीन्हा, सो करता ना होई ॥ वे तो आपन करनी भुगते, करता औरै कोई ॥ जोगी जती तपी सन्यासी, आप आप मिल मुडिया ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो, अलख लखै सो तरिया ॥
शब्द ३२४—ननदी जाहुरी महलनको, अपनो बीरन जगाव ॥ ॥ टे० ॥ बीरन जगाये ना जगेरी, लग न सके कछुदाव ॥ काया गठमें भई अंधियरिया, कोन करे वाके भाव ॥ भरमके ताला लगे महलमें, कीमत कुंजी लगाव ॥ कपट किवारिया खोलके तुम, या बिधि पियको रिझाय ॥ भक्ति घाघरा चित्त चुनरिया, चोली चाल सियाव ॥ कर्म मसीकी काजर करले, या बिधि पिया को रिझाय ॥ ज्ञानके दीपक कर गह लीजे, बातीबार लगाव ॥ ततको तेल डार दीपकमें, मगन मसाल जराव ॥ सुरतिके बिजनी करगहि लीन्हा, सेवा सेज बिछाव ॥ शीतल चँवर दार प्रीतमपर, प्रीति पिछोर उठाव ॥ बारंबार मिले नहीं या तन, भूल कोई मत जाव ॥ कहत कमाल कबीर के बालक, फिर ना मिले ऐसो दाव ॥
शब्द ३२५—काह भये मुखराम कहेसे ॥ टे० ॥ अंतर कपट बचन मुख चातुर, अति अधीन होय मनन कियेसे ॥ जैसे भुजंग ओट टाटीके बहु जीवनको हतन कियेसे ॥ जैसे बधिक