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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(८७९)

ओट टाटीके बहु जीवनको हतन कियेसे कहें कवीर वाके संग न करिये, बिनती विवेक जिन भेख लियेसे ॥

शब्द ३२६-मोको कहाँ दूँठे बंदे मैं तो तेरे पासमें ॥ टेक ॥ ना मैं बकरी ना मैं चिकवा, ना मैं डुरी गड़ासमें ॥ ना हों मैं खाल पूछमे, ना हड्डी ना मासमें ॥ ना मैं मिलों जोग तप कीन्हें, ना बिराग संन्यासमें ॥ खोजी होय सो तुरत मिलावे, पलभरके तल्लासमें ॥ ना देवलमें ना महजिदमें, ना काशी कैलाशमें, ना मैं आऊं अवध द्वारका, मैतो सांचे आसमें ॥ मैं बसता सैरतमें तेरी, मेरी पुरी मवासमें ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, सब स्वासनके स्वासमें ॥

शब्द ३२७-गाफिला क्यों बिसराया घनी, तेरी सुंदर काया बनी ॥ टेक ॥ काल करंते आजुई करले, आजु करंते अबही ॥ शिरपर तेरा काल खडा है, सुरक जात जस आनी ॥ धीरे धीरे पाँव उठावो, सिद्धिया है अति घनी ॥ या तन तेरी खास मिलेगी, कीरति रहेगी बनी ॥ या भौसागर अगम भरा है, नाव लगी अति झीनी ॥ गुरु मुख गुरुमुख पार उतरगये, निगुरा बूडे अनी ॥ बालापन तरुनापन बीते, देखलेव दरपनी ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, भली बिसाहन बनी ॥

शब्द ३२८-खबर नहीं जगमें पलकी । सुकृत करले नाम सुमिरले, को जाने कलकी ॥ टेक ॥ कौड़ी कौड़ी माया जोरी बात करे छलकी ॥ पाप पुन्यकी बांध पोटरिया, कैसे होवे हलकी ॥ तारन बीच चंद्रमा झलके, जोत झला झलकी ॥ एक दिन पंछी निकस जायगा, मट्टी जंगलकी ॥ मात पिता परिवार भाई बंधु, तिरिया मतलबकी ॥ माया लोभी नगर बसत-

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