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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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(८८०)

कवीरपंथी-

है, या अपने कबकी ॥ या संसार रैनका सपना, ओस बुंद झलकी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बातें सतगुरुकी ॥

शब्द ३२९-महेरम होय सो लखि पावे, संतो ऐसा देश हमारा ॥ टेक ॥ बेद किताब पार ना पावे, कहन सुनन सो न्यारा ॥ जात बरन कुल किरिया नाही, संध्या नेम अचारा ॥ बिन घन वादर बिजली चमके, बिन सूरज उजियारा ॥ बिन नैनन जहां मोती पो है, बिन सुर सबद उचारा ॥ जैसे बुंद परे दरियामें, ना मीठा ना खारा ॥ सुन्न सिखरपर गजल संगीता, किंनरी बीन सितारा ॥ जो जो गये ब्रह्म तेहि दरसे, गहुअच्छर तत सारा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो पहुँचे गुरुका प्यारा ॥

शब्द ३३०-संतो मूलन बेटा जायो, जिन खोज कुटुम्ब सब खायो ॥ टे० ॥ जनमत खाई ममता भाई, दुख सुख दोनों भाई ॥ पाप पुन्य पारोसी खाये, ओ तृष्णासी दाई ॥ काम क्रोध दोय काका खाये, मन अभिमानी मामा ॥ मोह नगरके राजा खाये, तब पहुँचे सुखधामा ॥ हम बड़ दादा तुम बड़ दादू, देखतही मन मूवा ॥ आनंदरूप बधाई बाजे, तब वह बालक हूवा ॥ ज्ञानी नाम धरे लड़काको, उनकी महिमा गार्ई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सुखमें रहो समाई ॥

शब्द ३३१-हंसा उड़ चल आपन देश, प्रीति पुरानी भयली नारे ॥ टे० ॥ हंसा सिंगलदीपके, उड़ि आये यदि देश ॥ बेघे मोती ना चुगे, हीडे आपन देश ॥ उड़ हंस कोदवारी लागे, मूरख विडारे जाय ॥ अरे अरे मूरख बावरा, कही कोदवा हंस न खाय ॥ ना हंसाके खेती बारी, नहीं बन जावै पार ॥ अन-बेघे मोती चुगे, सो पुरवे करतार ॥ शशि झंपे दरियावमें, मीन चढ़ी अकाश ॥ जानेगा कोइ संत जौहरी, कहैं कवीर कोइ दास ॥