कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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शब्द ३३२-जो कोइ निरगुन झर लख पावे ॥ टे० ॥ निर- खत कूप कूप बिन वारी, बिन कर रहट चलावे ॥ जल बिन शीश शीश बिन वारी, सो जल आन पियावे ॥ बिन करताल पखावज बाजे, बिन रसना गुनगावे ॥ गावन हारके रूप न रेखा, सो पद आन मिलावे ॥ कदलीपत्र जहर जंगलमें, बिन गुरुके नहीं खावे ॥ उठत सनेह मरमना पावे, आगमके गोह- रावे ॥ जोगी जती तपी संन्यासी, नाहक भेख बनावे ॥ बिना नामके भौरा घूमै, सुख सपने नहीं पावे ॥ पुरहन पत्र बसे नित दाडुर, सोऊ सवाद न पावे ॥ कमल कलीके भौरा लोभी, सौ जोजन उडजावे ॥ काजी हाथ किताब न आवे, मुलना बांग न भावे ॥ वेद पुरान विप्र ना भावे, राजा राज न भावे ॥ कर बिन कलम कलम बिन कागद, बिन मसि अंक बनावे ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, सतगुरु मिले लखावे ॥
शब्द ३३३-संतो समुझैका मतन्यारा, जो आतम तत्त्व बिचारा ॥ टे० ॥ औरनसो कहें आपा खोजो, आप अपन ना जाने ॥ मुख कछु आन हिये कछु आना, कैसे राम पहिचाने ॥ औरनसो कहें मोह न कीजे, निरमोही होय रहिये ॥ माया मोह सकल आपहिमें, या दुख कासो कहिये ॥ औरनको कहे तजो बडाई, आप बडाई चावे ॥ जोर बडाई छूटत नाही, झीना पीर कहावे ॥ औरनसो कहें पछ न कीजे, आपा पछ न छूटे ॥ कहन सुननको साधु कहावे, सांच कहे रिस छूटे ॥ जौ लग राग द्वेष मन माहीं, अस्तुति निंदा भावे ॥ तब लग तोनों ताप ना छूटे, कहा भये बहुगावे ॥ पद सारखी औरन समुझावे, आपा समु- झत नाही ॥ कहें कवीर राम क्यों दूरसे, मैं तैं छूटत नाही ॥
शब्द ३३४-करोरे बंदे वा दिनकी तदबीर ॥ टे० ॥ लाल