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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी—

खंभपर देत ताडना, सहि न सके शरीर ॥ मारमार सुगदर प्राण निकासे, नैनन भर आवे नीर ॥ रंगमहल एक कामिनि वैठी, कर शृंगार गंभीर ॥ दुनियाँ दौलत महल संग न जात शरीर ॥ भौसागरके राह कठिन है, नदिया अति गंभीर ॥ नाव न बारे लोग घनोरे, खेवनवाला बे पीर ॥ जब जमराजा पकर मँगावे, पाँयन परे जंजीर ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, अब ना करू तकसीर ॥

शब्द ३३५—नाम गत पार न पावे कोई ॥ टे० ॥ मच्छ कच्छ बाराहौ मर गये, नरसिंह रूप जो होई ॥ परशराम बलिबावन मरगये, कहो कहा कह रोई ॥ रघुबर मरे मरे वे दशरथ, भरथ शत्रुहन दोई ॥ रावन मार बिभीषण थापे, उनहूके लक विगोई ॥ जडुपति मरे मरे डुर्योधन, एक रात ना होई ॥ पाँच पंडवा सिद्धे हिमाले, मुक्त कहो नरलोई ॥ अंमरीष औ व्यास परी- च्छित, मरत देर ना होई ॥ अज फल खाये धनंतर मर गये, तिनहूकी सुदबुद खोई ॥ कहें कवीर सुनो नर भोंड़, तुमरी कौन गत होई ॥ उपजत विनशत जुग चारों गये, रहत न देखा कोई ॥

शब्द ३३६—जुगवे निशवासर जोग जती ॥ टे० ॥ जैसे ब्रह्मा वेदको जुगवे, शिवको जुगवे पारबती ॥ जैसे सुनार सोनाको जुगवे, घटन न पावे पाव रती ॥ जैसे नार पुरुषको जुगवे, बरत अगिन हो जात सती ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, का गजा- का छत्रपती ॥

शब्द ३३७—बैरागी रामारे मगन फकीरी तेरी पूरी ॥ टे० ॥ हाथ कमंडल बगलमें सोटा, चारों मुलक जगीरी ॥ दिल अंदर दीदार करोगे, आठों, पहर हजुरी ॥ रूखा सूखा साग अलोना