सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 897, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 897

शब्दावली

(८८३)

टुकरा, राखत सदक सबूरी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, जोगियाको जुगत जहूरी ॥

शब्द ३३८—जग देखा ठाठ तम्बूरेदा । पाँच तत्त्वका बना तँबूरा, त्रिगुन तार सहूरेदा ॥ टे० ॥ बाजत है पर दीसत नाहीं, इस मनही सहूरेदा ॥ टुट गये तार उखड गई खूँटी, मिल गये धूरम धूरेदा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, साहेब हाल हजूरेदा ॥

शब्द ३३९—सौदा कर सोई जाने, कायागढ खूब बजार ॥ ॥ टे० ॥ या काया गढमें हाट लगी है, लालच लोभ दलाल ॥ या काया गढमें हीरा मोती, परखेगा परखनहार ॥ या काया गढमें काजी मुलना, निशदिन करत पुकार ॥ या काया गढमें धनी विराजे, तूनेके ओट पहार ॥ या काया गढमें सात सखुंदर, कोई मीठा कोई खार ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, गुरु बिन जग अंधियार ॥

शब्द ३४०—मेरा दिल साहेब जाने गुदरिया गलतान ॥ टे० ॥ पांचतत्त्वकी बनी गुदरिया, परी रहै मैदान ॥ अच्छे वृच्छ तर आसन मारा, गुरु मूरतको ध्यान ॥ अर्थ उर्ध्व बिच डोरी लागी, अनहद चढी कमान ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, पाया पद निरबान ॥

शब्द ३४१—चितवत चितवत नैन दुखित भये, अजहूँ न आये साजनवा ॥ टे० ॥ निहारे बार अपार भई, सखि छूटो शिंगार सब दरपनवा ॥ पियाकी सोच रमोरी मनमें परी, सखि नीको न लागे जेवनवा ॥ एक पग ठाढी तोहे मनाऊं, ठाढी पछताऊं सखि आंगनवा ॥ धरमदासकी अरज गोसाईं, गावत पद सखी निरगुनवा ॥