सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 898, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 898

(८८४)

कवीरपंथी-

शब्द ३४२-ना कीन्हहा तैने हरिका सुमरन, सब दिन यो ही गयेरे ॥ टे० ॥ बालापन तो खेल गमाये, अबतो तरुन भयेरे ॥ बृद्ध भये कफ वायने घेरे, दुख नहीं जात सहेरे ॥ चार पहर धंधेमें खोये, अबतो सांझ भयेरे ॥ का गफलतमें सोता प्रानी, संगी निकस गयेरे ॥ मूंड मुंडाये जटा बढाये, जोगी राज भयेरे ॥ परमारथकी राह न जानी, अध बिच लटक रहेरे ॥ सुंदर देह देख मत भूलो, नाहक भार भरेरे ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साथी, तेरी जननी बोझ मरेरे ॥

शब्द ३४३-सखी सुन सतगुरु तान, नींद नहीं आती बिरहा-पर सूरति गयी पछारे खाती ॥ टेक ॥ सखी हिरदे भयो अंधियार भरमकी राती ॥ सखी बिना नाम अंजार होत कस पाती ॥ सखि नैन सैनसे खोज पिया दूँदलाती ॥ सखी पिया मिले सुख चैन नाम गुन गाती ॥ सखी मान सरोवर चल हंसनके पांती ॥ छबि देखत भये निहाल काल पछताती ॥ सखी जरा मरनके बात सबे मिट जाती ॥ जो धर्मनि कहै पुकार सीप मिल स्वाती ॥

शब्द ३४४-सोला कला मन विचार देखो पद पावे निरबानी ॥ टे० ॥ पहिले कलामें, बुंद डारदै दूजै धूर जमाई ॥ तीजे कलामें अंग फरुके चौथे मिट्टी बनाई ॥ पांचे कलामें पांचों मिल गये, आठे आगम जानी ॥ नवे कला नौखंड विराजे, दसपैंदस दरवाजा ॥ इग्यारहें कलामें साहेब राजी, बारह बाजत बाजा ॥ तेरह कलामें तिरगुन मिल गये चौदसजासी ॥ पूनो व्याला पूरन पाये, कहै कवीर अविनाशी ॥

शब्द ३४५-बाबा कवीर गुरु पूरा है ॥ टे० ॥ पूरे गुरुके जाउँ बलिहारी, जाका सकल जहूरा है ॥ सबमें व्यापक सबते