कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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न्यारा, हरदम रहत हजूरा है ॥ स्वेत ध्वजा फहरात गगनमें, बाजत अनहद तूरा है ॥ नाम कवीर जपे जन सूरा, नानक चरनके धूरा है ॥
शब्द ३४६-कर नैनो दीदार महलमें प्यारा है ॥ टे० ॥ नौ दरवाजा परगट दीसे, दसवां द्वारा मुंद कुलफ जडतारा है ॥ उलट सर्पनी गगन सँवारे, षट्चक्रकी सोध विचारे मेरु डंडपर सीधा पवन दो धारा है ॥ चंद सूर दोउ एक घरलावे, सुषुमन सेती ध्यान लगावे, तिरबेनीके घाट उतर भौपार है ॥ गगन मँडलमें उर्ध सुख कूवा, सूरा होयसो भरभरपीवा, निगुरा जात पियासे, हिये अंधियारा है ॥ नेती धोती वस्ती पाई, आसन पवन जुगत ठहराई, गम घोडा असवार, भरमसे न्यारा है ॥ शब्द विहंगम चाल हमारी, कहें कवीर सतगुरु ले तारी, खुल-गइ भरम किंवारी, सार शब्द झनकारा है ॥
शब्द ३४७-जबसे मन परतीत भई । मेरे गुरुने सजीवन मूरदई ॥ टे० ॥ दिन दिन औगुन छूटन लागे, बाढन लागी प्रीति नई ॥ पावे दाव भाव बन आवे, मिलगये सतगुरु साहेब सही ॥ सुरति निरति दोय ज्ञान जौहरी, निरख परखके वस्तु लई ॥ थोरे बनज लाभ भो भारी, उपजन लागे लाल मई ॥ मानकपुरमें मोती उपजे, हीरा नगसो भेट भई ॥ आगम निगम नित खोज निरंतर, गुरुने नाम निज वस्तु दई ॥ सुखसागर असनान जो करले, स्वात बूंद सो भेट भई ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, हती विकार सो दूर गई ॥
शब्द ३४८-बालापन वांके बतिया हँसा सुध करो ना ॥ टे० ॥ दसो दिशाके गम जहां नाहीं, संकट परे दिन रतिया ॥ बार-बार तुम कौल किये हौ, बसुधामें करव भगतिया ॥ गरभहिसे