कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 900, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(८८६)
कवीरपंथी
बाहिर प्रभु कीन्हा, माया घरे दूनों अंखिया ॥ पांच पचीस कंठ चढ बैठे, परले तू मौज लफसिया ॥ बालापन बलहीमें बीते, तरुनीमें कडके छतिया ॥ काम कोध दस इंद्री जागे, ना सूझे जात न पतिया ॥ अंतसमें में जान परी है, जब जम घरे डुर- रिया ॥ देवा देवी एको ना लागे, झूठी होवे जड़ियासे बुटिया ॥ केसो दुख समुझके गावे, गुरुजीसे करे बिनवतिया ॥ श्याम बिहारी समुझके चेतो, अंतमें कोऊ ना संचतिया ॥*
शब्द ३४९ तुम कौन हो मियां कहाँके ॥८०॥ कहाँसे आये कहाँ जावोगे, किनने भेजा कौन काम है, नई नगरिया झाँके ॥ आतेही तुम रोय दिया, का लायेथे सो खोय दिये, किस जिंग- रमें हो किस फिकरमें हो, आंखें खोलो का ढाँके ॥ वतन तुम्हारा कौन ठामहै, बड़ा शहर वोहै कोई गाम । उत्तर दखिन पूरव पश्चिम, नैरितके हो ईशानके ॥ आये हो इस नगरीमें, कुछ मौज साईका सुख देखो. अब ऐसी ना कीजिये, ना ईहांके हो ना उहांके ॥ हिंदू या मुसलमीन हो, दुनियां द्वार फकीर नदान, कहें कवीर सुनो भाइ साधों, तिरछे हो के वाँके ॥
शब्द ३५०—हम तो सदा बने रंगलाल । लंडी दौलत का है पाल ॥८०॥ चार खूंट जागीर हमारी, गल बिच तुलसी माल ॥ काम धाम सब लिया बगलमें, कोई न पावे हाल ॥ अन जल आटा सब कुछ मिलता, घी गुड़ चावल दाल ॥ बहुत खजाना पास भरा है, देता है गोपाल ॥ खुसीसे भिक्षा लेते है हम, नासिर फोरी चाल ॥ साई खातर लिया फकीरी, झूठी माया जाल ॥ दया धरम कुछ करले बंदे, निकल जायगी खाल ॥ जितनी संपत् उतनी बिपत, नाहक बजावे गाल ॥ सत्तनामका दिया है डंका, हाथ जोड़ता काल ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधों, लगा भजनका ढाल ॥