कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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शब्द ३५१-कोन गुरु कालसो बांचे । जोतसरूपी नाथ बनाये, तामो सब नाचे ॥ टे० ॥ इच्छा सुरती जपते उपजी, भई जगत कांचे ॥ सत्तर जुग गये एक पलमें, ताही ब्रह्मा राचे ॥ कर षट् दर्शन चार संपदा, सब जगको बांधे ॥ एकइस पुरी अखंड बसुधा, को कहु कैसे नाधे ॥ दान पुन्यका बड़ा भरोसा, या जुगमें सांचे ॥ पंडराजसे को बड़ दानी, दुंदकाल महीं फांसे ॥ केवल ब्रह्मको सबे भुलाने, चले जोत जांचे ॥ अंधधुंधमें सुरति भुलाने, फिर भागे पीछे ॥ घाटे घाटे चौकी वैठी, कठिन काल आसे ॥ शब्द बिना कोई जान न पावे, ताहि पकर तरासे ॥ जोतके आगे सतगुरु साहेब, अजर अमर सांचे ॥ कहैं कवीर हम आवें जावें, हंस लिये साथे ॥
शब्द ३५२-कोई सफा न देखा दिलका । कहीं कुत्ता कहीं बकुली देखा, कहीं साप देखा बिलका ॥ टे० ॥ कहीं पंडित कहीं काजी देखा, सुलना देखा अकिलका ॥ कहीं पूरब कहीं पश्चिम देखा, उत्तर देखा दक्षिणका ॥ ऊपर मनसे कथनि कहत है, भीतर गोला पथरका ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, एही हाल खिलकतका ॥
शब्द ३५३-काया नगरीमें कोनसा पुरुष ॥ टेक ॥ आपहि गरजे आपहि बरसे, आपहि पवन झकोरता फिरत ॥ आपहि माली आप बगीचा, आपहि कलियां तोरता फिरत ॥ आपहि तखरी आपन राजी, आपहि सब जग तौलता फिरत ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, आपहि घट घट बोलता फिरत ॥
शब्द ३५४-मेरा हीरा हेरागये कचरेमें ॥ टेक ॥ कोई पूरब कोई पछिम बतावे, कोई बतावे पानी पथरेमें ॥ पंडित वेद पुरान बतावे, उरझ रहे जग झगरेमें ॥ सुर नर मुनि और पीर