कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
औलिया, भूल गये सब नखरेमें ॥ धर्म दास गुरु हीरा पाये, बांध लिये निज अँचरेमें ॥
शब्द ३५५-गरीबी है सबमें सिरदार ॥ टे० ॥ उलटके देखो ज्ञान गरीबी, जाकी पैनी धार ॥ भौ भंजन सुखदायक जनको, कहर बिडारन हार ॥ सतयुग त्रेता द्वारा कलियुग, परले टारन हार ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, हंस उबारन हार ॥
शब्द ३५६-छकोरे मन गगन गली, जहाँ बजत बीन सुर झीनी ॥ टे० ॥ रुनक झुनक अनहद झुन गरजे, झिलमिल दरसे जोती ॥ बिन बादल जहाँ बिजली चमके, वरषत हीरा मोती ॥ अधर देहरा अधर पुजारी, अधरे सकल बनाया ॥ अधर बैठ मन निहचल कीजे, ब्रह्ममें जीव समाया ॥ स्वेत सिंहासन स्वेत छत्र सिर, स्वेत ध्वजा फहराई ॥ हरो लाल पीरो असमानी, बहुरंगी दरसाई ॥ साहब मोमें मैं साहबमें, झिल मिल दरसे नूर ॥ कहें कवीर दया सतगुरुकी, बैठे हाल हजूर ॥
शब्द ३५७-मेरे दिलदा सौख फकीरी । धन सतगुरु उपदेश दियो है, सुरति भई मेरी थोरी ॥ टेक ॥ सुन्न सिखर पर गजल संगीता, रहता सत्त सबूरी ॥ सत्त अवाज करो दरगाहमें, भिछा मिले भरपूरी ॥ पांच उमराव हजूर बंदगी, आठो पहर उजीरी ॥ अजब ख्याल देखा दरगाहमें, बाजे रबाब नफीरी ॥ काम क्रोध दोनों दल जीते, हठ आसन तत सीरी ॥ सब घट साहेब समकर जाने, ऐसी रहन गंभीरी ॥ मांगो न भीख डरो ना, दो मेरे दिलकी सीरी ॥ कहें कवीर दया सतगुरुकी, सहज भई घर मेरी ॥
शब्द ३५८-तरे कायामें गुलजार, बागों मत जा रे ॥ टेक ॥ मन माली परमोधके, संजमकी कर बार ॥ दया पौद सूखे नहीं, क्षमा शील जड़ डार ॥ करनी कयारी बोइये, रहनी कर रखवार ॥