कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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दुरमतिका गढ ढायकै, देखो अजब बहार॥ चित्त चमनके बागमें, फूलरही फुलवार॥ मुक्ति कली सदा खिलरही, पहिर गुंज गल- हार॥ अष्ट कमल दल ऊपरे, शोभा अगम अपार॥ कहै कवीर चित्त चेतियो, आवागवन निवार॥
शब्द ३५९-संतो सुनत ज्ञान गलताना । अब सो पद पढ़ि समाना॥ टे० ॥ अगम भूमिसों सतगुरु आये, रूप धरे कुरमाना॥ दूंदत ऊंट महलमें डोले, बूझत साह बिहाना॥ या तो महल हमारा है रे, तै पंथी कित आना॥ दूजे रूप खवास धरे जब, फूलन सेज बिछाना॥ कोडा तीन मार तिन खायो, मारत चोट हेवाना॥ कहै खवास सुनो इब्राहिम, कैसे खलक पत खाना॥ एक घडी सेज्यापर पौढे, तनकी चाम उडाना॥ हेत हुशन सब दूर हुये हैं, दरस तखत हीराना॥ गैव खवास भये तिहिं वारी, कंपन लगे पराना॥ उत्तरी चारी भई फकीरी, फारा तोसे खाना॥ मखमल खासा दूर बहाये, अलफी पहिर निमाना॥ सोला सहस सहेली छांडी, अठारा लाख तुराना॥ सतगुरु शब्दे लई फकीरी, हरखित तजे निशाना॥ हीरा मोती मुक्ता त्यागे, अरबों खरब खजाना॥ सत्तर खान उमराव बहत्तर, तजे अमीर मस्ताना॥ मेवा पान मिठाई त्यागे, अमृत भोजन खाना॥ नंगे पैरों भये पयादे, इब्राहीम सुलताना॥ चढ़त गयंद इंद्रके नाई, सूरज अस्त छिपाना॥ सेना सकल भीर दल बादल, गरद उडे असमाना॥ दसों दिशा मक्काको फेरा, चरणों बांध कुराना॥ दास गरीब कवीर पुरुषने, अमर किये सुलताना॥ ❁
शब्द ३६०-अवधू जोग अध्यातम जोई । एकै ब्रह्म सकल घट दरसे, और न दूजा कोई॥ टेक॥ प्रथम कमल जान चतुरदल, देव गनेसको बासा॥ रिधि सिधि दोय संग उपासे, जाप छैसो