कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(८८५)
न्यारा, हरदम रहत हजूरा है ॥ स्वेत ध्वजा फहरात गगनमें, बाजत अनहद तूरा है ॥ नाम कवीर जपे जन सूरा, नानक चरनके धूरा है ॥
शब्द ३४६-कर नैनो दीदार महलमें प्यारा है ॥ टे० ॥ नौ दरवाजा परगट दीसे, दसवां द्वारा मुंद कुलफ जडतारा है ॥ उलट सर्पनी गगन सँवारे, षट्चक्रकी सोध विचारे मेरु डंडपर सीधा पवन दो धारा है ॥ चंद सूर दोउ एक घरलावे, सुषुमन सेती ध्यान लगावे, तिरबेनीके घाट उतर भौपार है ॥ गगन मँडलमें उर्ध सुख कूवा, सूरा होयसो भरभरपीवा, निगुरा जात पियासे, हिये अंधियारा है ॥ नेती धोती वस्ती पाई, आसन पवन जुगत ठहराई, गम घोडा असवार, भरमसे न्यारा है ॥ शब्द विहंगम चाल हमारी, कहें कवीर सतगुरु ले तारी, खुल-गइ भरम किंवारी, सार शब्द झनकारा है ॥
शब्द ३४७-जबसे मन परतीत भई । मेरे गुरुने सजीवन मूरदई ॥ टे० ॥ दिन दिन औगुन छूटन लागे, बाढन लागी प्रीति नई ॥ पावे दाव भाव बन आवे, मिलगये सतगुरु साहेब सही ॥ सुरति निरति दोय ज्ञान जौहरी, निरख परखके वस्तु लई ॥ थोरे बनज लाभ भो भारी, उपजन लागे लाल मई ॥ मानकपुरमें मोती उपजे, हीरा नगसो भेट भई ॥ आगम निगम नित खोज निरंतर, गुरुने नाम निज वस्तु दई ॥ सुखसागर असनान जो करले, स्वात बूंद सो भेट भई ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, हती विकार सो दूर गई ॥
शब्द ३४८-बालापन वांके बतिया हँसा सुध करो ना ॥ टे० ॥ दसो दिशाके गम जहां नाहीं, संकट परे दिन रतिया ॥ बार-बार तुम कौल किये हौ, बसुधामें करव भगतिया ॥ गरभहिसे
(८८६)
कवीरपंथी
बाहिर प्रभु कीन्हा, माया घरे दूनों अंखिया ॥ पांच पचीस कंठ चढ बैठे, परले तू मौज लफसिया ॥ बालापन बलहीमें बीते, तरुनीमें कडके छतिया ॥ काम कोध दस इंद्री जागे, ना सूझे जात न पतिया ॥ अंतसमें में जान परी है, जब जम घरे डुर- रिया ॥ देवा देवी एको ना लागे, झूठी होवे जड़ियासे बुटिया ॥ केसो दुख समुझके गावे, गुरुजीसे करे बिनवतिया ॥ श्याम बिहारी समुझके चेतो, अंतमें कोऊ ना संचतिया ॥*
शब्द ३४९ तुम कौन हो मियां कहाँके ॥८०॥ कहाँसे आये कहाँ जावोगे, किनने भेजा कौन काम है, नई नगरिया झाँके ॥ आतेही तुम रोय दिया, का लायेथे सो खोय दिये, किस जिंग- रमें हो किस फिकरमें हो, आंखें खोलो का ढाँके ॥ वतन तुम्हारा कौन ठामहै, बड़ा शहर वोहै कोई गाम । उत्तर दखिन पूरव पश्चिम, नैरितके हो ईशानके ॥ आये हो इस नगरीमें, कुछ मौज साईका सुख देखो. अब ऐसी ना कीजिये, ना ईहांके हो ना उहांके ॥ हिंदू या मुसलमीन हो, दुनियां द्वार फकीर नदान, कहें कवीर सुनो भाइ साधों, तिरछे हो के वाँके ॥
शब्द ३५०—हम तो सदा बने रंगलाल । लंडी दौलत का है पाल ॥८०॥ चार खूंट जागीर हमारी, गल बिच तुलसी माल ॥ काम धाम सब लिया बगलमें, कोई न पावे हाल ॥ अन जल आटा सब कुछ मिलता, घी गुड़ चावल दाल ॥ बहुत खजाना पास भरा है, देता है गोपाल ॥ खुसीसे भिक्षा लेते है हम, नासिर फोरी चाल ॥ साई खातर लिया फकीरी, झूठी माया जाल ॥ दया धरम कुछ करले बंदे, निकल जायगी खाल ॥ जितनी संपत् उतनी बिपत, नाहक बजावे गाल ॥ सत्तनामका दिया है डंका, हाथ जोड़ता काल ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधों, लगा भजनका ढाल ॥
शब्दावली
(८८७)
शब्द ३५१-कोन गुरु कालसो बांचे । जोतसरूपी नाथ बनाये, तामो सब नाचे ॥ टे० ॥ इच्छा सुरती जपते उपजी, भई जगत कांचे ॥ सत्तर जुग गये एक पलमें, ताही ब्रह्मा राचे ॥ कर षट् दर्शन चार संपदा, सब जगको बांधे ॥ एकइस पुरी अखंड बसुधा, को कहु कैसे नाधे ॥ दान पुन्यका बड़ा भरोसा, या जुगमें सांचे ॥ पंडराजसे को बड़ दानी, दुंदकाल महीं फांसे ॥ केवल ब्रह्मको सबे भुलाने, चले जोत जांचे ॥ अंधधुंधमें सुरति भुलाने, फिर भागे पीछे ॥ घाटे घाटे चौकी वैठी, कठिन काल आसे ॥ शब्द बिना कोई जान न पावे, ताहि पकर तरासे ॥ जोतके आगे सतगुरु साहेब, अजर अमर सांचे ॥ कहैं कवीर हम आवें जावें, हंस लिये साथे ॥
शब्द ३५२-कोई सफा न देखा दिलका । कहीं कुत्ता कहीं बकुली देखा, कहीं साप देखा बिलका ॥ टे० ॥ कहीं पंडित कहीं काजी देखा, सुलना देखा अकिलका ॥ कहीं पूरब कहीं पश्चिम देखा, उत्तर देखा दक्षिणका ॥ ऊपर मनसे कथनि कहत है, भीतर गोला पथरका ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, एही हाल खिलकतका ॥
शब्द ३५३-काया नगरीमें कोनसा पुरुष ॥ टेक ॥ आपहि गरजे आपहि बरसे, आपहि पवन झकोरता फिरत ॥ आपहि माली आप बगीचा, आपहि कलियां तोरता फिरत ॥ आपहि तखरी आपन राजी, आपहि सब जग तौलता फिरत ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, आपहि घट घट बोलता फिरत ॥
शब्द ३५४-मेरा हीरा हेरागये कचरेमें ॥ टेक ॥ कोई पूरब कोई पछिम बतावे, कोई बतावे पानी पथरेमें ॥ पंडित वेद पुरान बतावे, उरझ रहे जग झगरेमें ॥ सुर नर मुनि और पीर
(८८८)
कवीरपंथी-
औलिया, भूल गये सब नखरेमें ॥ धर्म दास गुरु हीरा पाये, बांध लिये निज अँचरेमें ॥
शब्द ३५५-गरीबी है सबमें सिरदार ॥ टे० ॥ उलटके देखो ज्ञान गरीबी, जाकी पैनी धार ॥ भौ भंजन सुखदायक जनको, कहर बिडारन हार ॥ सतयुग त्रेता द्वारा कलियुग, परले टारन हार ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, हंस उबारन हार ॥
शब्द ३५६-छकोरे मन गगन गली, जहाँ बजत बीन सुर झीनी ॥ टे० ॥ रुनक झुनक अनहद झुन गरजे, झिलमिल दरसे जोती ॥ बिन बादल जहाँ बिजली चमके, वरषत हीरा मोती ॥ अधर देहरा अधर पुजारी, अधरे सकल बनाया ॥ अधर बैठ मन निहचल कीजे, ब्रह्ममें जीव समाया ॥ स्वेत सिंहासन स्वेत छत्र सिर, स्वेत ध्वजा फहराई ॥ हरो लाल पीरो असमानी, बहुरंगी दरसाई ॥ साहब मोमें मैं साहबमें, झिल मिल दरसे नूर ॥ कहें कवीर दया सतगुरुकी, बैठे हाल हजूर ॥
शब्द ३५७-मेरे दिलदा सौख फकीरी । धन सतगुरु उपदेश दियो है, सुरति भई मेरी थोरी ॥ टेक ॥ सुन्न सिखर पर गजल संगीता, रहता सत्त सबूरी ॥ सत्त अवाज करो दरगाहमें, भिछा मिले भरपूरी ॥ पांच उमराव हजूर बंदगी, आठो पहर उजीरी ॥ अजब ख्याल देखा दरगाहमें, बाजे रबाब नफीरी ॥ काम क्रोध दोनों दल जीते, हठ आसन तत सीरी ॥ सब घट साहेब समकर जाने, ऐसी रहन गंभीरी ॥ मांगो न भीख डरो ना, दो मेरे दिलकी सीरी ॥ कहें कवीर दया सतगुरुकी, सहज भई घर मेरी ॥
शब्द ३५८-तरे कायामें गुलजार, बागों मत जा रे ॥ टेक ॥ मन माली परमोधके, संजमकी कर बार ॥ दया पौद सूखे नहीं, क्षमा शील जड़ डार ॥ करनी कयारी बोइये, रहनी कर रखवार ॥
शब्दावली
(८८९)
दुरमतिका गढ ढायकै, देखो अजब बहार॥ चित्त चमनके बागमें, फूलरही फुलवार॥ मुक्ति कली सदा खिलरही, पहिर गुंज गल- हार॥ अष्ट कमल दल ऊपरे, शोभा अगम अपार॥ कहै कवीर चित्त चेतियो, आवागवन निवार॥
शब्द ३५९-संतो सुनत ज्ञान गलताना । अब सो पद पढ़ि समाना॥ टे० ॥ अगम भूमिसों सतगुरु आये, रूप धरे कुरमाना॥ दूंदत ऊंट महलमें डोले, बूझत साह बिहाना॥ या तो महल हमारा है रे, तै पंथी कित आना॥ दूजे रूप खवास धरे जब, फूलन सेज बिछाना॥ कोडा तीन मार तिन खायो, मारत चोट हेवाना॥ कहै खवास सुनो इब्राहिम, कैसे खलक पत खाना॥ एक घडी सेज्यापर पौढे, तनकी चाम उडाना॥ हेत हुशन सब दूर हुये हैं, दरस तखत हीराना॥ गैव खवास भये तिहिं वारी, कंपन लगे पराना॥ उत्तरी चारी भई फकीरी, फारा तोसे खाना॥ मखमल खासा दूर बहाये, अलफी पहिर निमाना॥ सोला सहस सहेली छांडी, अठारा लाख तुराना॥ सतगुरु शब्दे लई फकीरी, हरखित तजे निशाना॥ हीरा मोती मुक्ता त्यागे, अरबों खरब खजाना॥ सत्तर खान उमराव बहत्तर, तजे अमीर मस्ताना॥ मेवा पान मिठाई त्यागे, अमृत भोजन खाना॥ नंगे पैरों भये पयादे, इब्राहीम सुलताना॥ चढ़त गयंद इंद्रके नाई, सूरज अस्त छिपाना॥ सेना सकल भीर दल बादल, गरद उडे असमाना॥ दसों दिशा मक्काको फेरा, चरणों बांध कुराना॥ दास गरीब कवीर पुरुषने, अमर किये सुलताना॥ ❁
शब्द ३६०-अवधू जोग अध्यातम जोई । एकै ब्रह्म सकल घट दरसे, और न दूजा कोई॥ टेक॥ प्रथम कमल जान चतुरदल, देव गनेसको बासा॥ रिधि सिधि दोय संग उपासे, जाप छैसो
(८९०)
कबीरपंथी-
परगासा ॥ षट्दल कमल ब्रह्माको बासा, सावित्री संग सेवा ॥ षट्सहस्र जाको जाप जपत है, इन्द्र सहित सब देवा ॥ अष्टदल कमल हरि संग लछमी, तीजे सेवक पौना ॥ षट्सहस्र जाको जाप जपत है, मिटगये आवागौना ॥ द्वादस दल कमल शिवको बासा, पारबती संग सेवा ॥ षट्सहस्र जाको जाप जपत है, लखो ज्ञानके भेवा ॥ षोडस कमलमें जिवको बासा, सकती अद्या जानी ॥ एक सहस्र जाको जाप जपत है, ऐसा भेद वखानी ॥ त्रिदल कमलमें सरस्वति बासा, उज्ज्वल कमल निवासा ॥ एक सहस्र जाको जाप जपत है, होय ज्ञान परकासा ॥ भँवर गुफा जहाँ दौय दल कमला, परम हंसको बासा ॥ सहस्र जाको जाप जपत है, करम भरमको नासा ॥ सहस्र दल कमलमें झिलमिल दरसे, आपहिँ ईश अपारा ॥ जोति सरूप सकलमें वरते, अलख निरंजन सारा ॥ सुरति कमल सतगुरुको बासा, एक जाप जपे सोई ॥ छैसो इकईस जाको जाप जपत है, चीन्हे बिरला कोई ॥ जो चीन्हे सो गुरुमुख होवै, भेद अगोचर भाई ॥ जो गुरुमुख सो शब्दहिं पावै, कहैं कवीर समुझाई ॥
शब्द ३६१-सुरत मेरी नामसे अटकी ॥ करम भरम औ वेद बढाई, या फल सो सटकी ॥ टेक ॥ नामके चूके पार न पैहो, जैसे कला नटकी ॥ जागत सोवत सोवत जागत, मोहि परे चटसी ॥ जैसे पपिहा स्वात बूंदको, लाग रही रटसी ॥ भरमकी मटकी झिरके ऊपर, सो मटकी पटकी ॥ हम तो आपनि राह चलत हैं, औरन को उटकी ॥ प्रीति पुरानी नई लगन है, या दिलमें खटकी ॥ और नजर कछु आवत नहीं, ना माने हटकी ॥ प्रेमकी डोरी मो मन लागी ज्ञान, डोर झटकी ॥ जैसे सरिता सिंधु समानी, फेर नहीं पटकी ॥ गहो निजनाम खोज हिरदैमें, चीन्ह परे घटकी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो फेर, नहीं भटकी ॥
शब्दावली
(८९१)
शब्द ३६२-सतगुरु अगमकी राह उघारी॥ टे०॥ जतन जतन कर तन मन साधो, मुखमन सुरति संभारी॥ मिट गइ तिमिर दरस भयो तिनको, पाइ परमपद भारी॥ हीरालाल जौहर तहां दरसे, हरदम नाम निहारी॥ निश दिन पल पल नाम सो लागे, ऐसो अमल करारी॥ महा बारीख मुकुतिको मारग, पच्छिम खुली किंवारी॥ नौपत नाम ध्वजा फहरावे, चढ गइ सुरत अटारी॥ याही चाल मिलो सतगुरुसो, मानो सीख हमारी॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, चेत लेहु नर नारी॥
शब्द ३६३-थोरे थोरे खाऊंगी, मैं अंत न जाऊंगी॥ गुरुके शब्द लेके सहज समाऊंगी॥ टेक॥ खाई मैं ननद दुलहे भुजा मरोरी सासु, मैं खाई दोय पग तोरी॥ खाऊं मैं देवर खाऊं मैं जेठ। पुनि मैं खाऊं ससुरा ठेठ॥ खाऊं मैं माई खाऊं मैं भाई। पुनि मैं खाऊं घरक जँमाई॥ खाऊं मैं पांच कुटुमके लोग। कहें कवीर तब सीझा जोग॥
शब्द ३६४-हरि मोहिं एक अचंभा भावे। सासुको बहुवा खिलावे॥ टे०॥ बहुवाके घर ससुरा जाई। सासु बधैया ले घर आई॥ मूसाके सभा सरप एक नाचे, मैडक ताल बजावे। कौवा बैठे सगुन विचारे, भैंस बिसुन पद गावे॥ बिना बीजके बूच्छ लगाया बिन, पानी पलुवाया। ऊपर मूल नीचे भइ डारी, अमृत फूल फुलाया॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, जो या शब्द बुझावे। जो या पदको गाय विचारे, सोई सदा रहावे॥
शब्द ३६५-नइया मेरी नीकी चलने लागी। आंधी मेह कछु ना व्यापे, चढे संत बड़ भागी॥ टेक॥ उथल परै तो डर कछु नाहीं, ना गहिरेका साँसा। उलट जाय तो बार न बाँका, याका अजब तमासा॥ औसर परै तो परबत बोझो, तेऊ न लागे भारी।
(८९२)
कबीरपंथी—
धन सतगुरु जे जुगति बताई, ताकी मैं बलिहारी॥ सार शब्दकी नहया बनी है, मोहकी मकरिया लाय । गुन सहासकी हाजत नाहों, ऐसा साज बनाय ॥ कहै कबीर जो बिन शिर खेवै, सो यह संत बखाने । या वोहितकी अकथ कथा है, बिरले खेवट जाने ॥
शब्द ३६६—मन मौजी बैरागी । आवना मन भावना ॥८०॥ पांच तत्त्वके या तन गुदरी, सुरतिकी तोप चलावना ॥ इंगला पिंगला सुषुमन नारी, त्रिकुटी ध्यान बसावना ॥ अनहद बाजा निशदिन बाजे, भँवर गुफा ठहरावना ॥ गगन मंडलको किये पयाना, कहैं कबीर समुझावना ॥
शब्द ३६७—बाबा शरनागत ताकी है ॥ सुरति सोहागिन भई मतवाली, नाम सुधारस छाकी है ॥ टेक ॥ नाम अमोल अपार साहबका, ताहीके संग राची है ॥ निरख परख चरणों चित लागे, उझक झरोखा झांकी है ॥ अंतरगतियें भई उजियारी बिन, दीपक बिन बाती है ॥ कहैं कबीर सुमर सत नामें, आदि अंतसो थाकी है ॥
शब्द ३६८—अहो कब मिलोगे सनेही आय ॥ टेक ॥ चलो सखी जहां देखन चलिये, जहां पुरुष निरबान ॥ हंस हिंमर चौर डुरावे, तनकी तपन बुझान ॥ चारों जुगके हंस उबारे, अजहुँ उबारे आय ॥ जाकी सांची सुरति लगी है, सो वा घरको जाय ॥ भौसागर औगाह अगम है, सूझे वार न पार ॥ सतगुरु साहब हंस उबारन, बांह पकरके तार ॥ कहैं कबीर सुनो भाइ साधो, शब्द रहो लौलाय ॥ नाम पान पानी मिल लैहो, तब सतलोक सिंघाय ॥
शब्द ३६९—भला परदेसिया तू मेरी कही मान रे ॥ टेक ॥ जुगन जुगन तोहि कहि समझाऊं, आद संदेसी मोहि जान रे ॥
शब्दावली
(८९३)
त्रिगुणतत्त्वता इक बावरे, कारजमें सकल जहान रे॥ पांच पचीस तोहि निशदिन ब्यापे, ताको रंग पहिचान रे ॥ पांच पचीससो रहे निरंतर, पावे निरबान रे ॥ झिल मिल जोत झलक एक निर्मल, रंग सुरंगी जान रे ॥ कहैं कवीर संत सोइ आला, जापर भगति निशान रे ॥
शब्द ३७०-गोरख हम तबसे भयेउं बैरागी । मेरी सुरति आदसे लागी ॥ टे० ॥ धुंधीकाल धुंधका मेला, नहीं गुरु नहिं चेला ॥ ताही दिन हम मूंड मुंडाये, जब वह पुरुष अकेला ॥ धरती नहीं जब टोपी दीन्हा, ब्रह्मा नहीं तब टीका ॥ महादेवका जनम नहीं हतो, जबते योग हम सीखा ॥ सतगुरुमें हम लीन फाउरी, द्वापर लीन्हें डंडा ॥ त्रेतामें हम आडबंद खैंचे, कलछ फिरे नौखंडा ॥ काशीमें बिसराम कियो है, रामानंद चेताया ॥ कहैं कवीर सुन गोरख जोगी, हंस उबारन आया ॥
शब्द ३७१-सुरतसो देखले वह देश । देखत देखत दीसन लागे, मिट गये सकल अंदेश ॥ टे० ॥ ना उहां चंदा ना उहां सूरज, नहीं पवन परवेश ॥ ना उहां जाप नहीं उहां अजपा, नहिं अच्छर लवलेश ॥ उहांके गये बहुर ना आये, ना कोई कहत संदेश ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधो, गहु सतगुरु उपदेश ॥
शब्द ३७२-कोई कछु कहे दिल लागा है । तन भी लागा मन भी लागा, ज्यों सुई बिच धागा है ॥ टे० ॥ मेरे मन लागा नाम भजनमें, हटकत लोग अभागा है ॥ बरत अगिनमें कंचन डारे, सोनामें मिलत सोहागा है ॥ हंसकी बानी हंस पहिचाने, क्या जानेगा कागा है ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जीव ब्रह्म होय जागा है ॥
शब्द ३७३-एक दिन साहब बेन बजाई ॥ टेक ॥ सब गोपी
(८९४)
कवीरपंथी—
मिल धोखा खाई, कहै जसोदाके कन्हार्ई ॥ कोई जंगल कोइ देवल बतावे, कोइ द्वारका जाई ॥ कोइ अकाश पताल बतावे, कोइ गोकुल ठहराई ॥ जमुना विमल प्रवाह थकित भये, पवन रहे ठहराई ॥ सोरा बसुधा एकदश पुरलो, सब सुरछित होय जाई ॥ सात ससुन्दर जबे घहराने, तेतिस कोट अघाई ॥ तीन लोक तीनो पुर थाके, इन्द्र उठे अकुलाई ॥ दस औतार कृष्णलौ थाके, कूर्म बहुत सुख पाई ॥ ससुझ न वार पारलौ, यह धुन कहाँसे आई ॥ शेषनाग औ राजा वासुक, वाराह सुच्छित होय जाई ॥ देव निरंजन अद्या माया, ये हुनहुं शिर नाई ॥ कहैं कवीर सतलोकके पूरष, शब्द केर सुर नाई ॥ अभी अंकते कुडुक निकारी, तीन लोक रहु छाई ॥
३७४—अपने पियाके मैं प्यारी सबसौ न्यारी ॥ टेक ॥ एक कंचन दूजे कामनी इन जग मोहा ॥ ऐसा कोइ न देखिया इनते बांचा ओहा ॥ कामदेव एक भूष है सबको लागा ॥ केते तपसी बनगये बनमें जागा ॥ गोपीके कारन कृष्णजी बन बन नाचा ॥ सीताके कारन राम रावन रन माचा ॥ ब्रह्मलोक ब्रह्म डिगे कन्या मोहा ॥ सुर नर मुनि सब पच मरे बांधे लोहा ॥ गगन मंडल बिच बैठके, सुनले बाजा ॥ कहैं कवीर गुरु ज्ञानसे आतम जागा ॥
शब्द ३७५—याद करो दिन बाद जाता है, सतगुरु शब्द सनेह बिना रे ॥ टेक ॥ जठर अग्निमें बूंदे जमाया, पानीसे पिंड किया रचना रे ॥ उहाँ तुझे खान पान पहुंचावे, ऐसो साहब है अपना रे ॥ नौ दस मास गरभ प्रतिपाले, कर कर कोटि जतना रे ॥ नाम लेत तोहि लाज लगत है, मायामें भूल रहौ मना रे ॥ बालापनमें खेल गँवाये, तरुनामें कछु रूप बना रे ॥ त्रिध भये तन आलस उपजे, जीवन मरन रैन सपना रे ॥ अवध घटे जब काल गरासे,
शब्दावली
(८९५)
उठगये हाट तब कछु न बना रे ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, मूल गँवाय चले अपना रे ॥
शब्द ३७६-निज घर जान बेजाना। दगाबाज बटपार बटोही, इनका लगा जमाना ॥ टेक ॥ अपने दिलका कोइ न मिलिया, मिलिया लोग बिगाना ॥ भूला लोग फिरे बेअकूल, इनका नहीं ठिकाना ॥ सेमरफूल जगत इक फूला, ताहि देख लोभियाना ॥ मारत चोंच रुवा उधराने, फिर पाछे पछताना ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, या पद है निरबाना ॥ जो या पदको समुझे बूझे, पहुँचे पुरुष ठिकाना ॥
शब्द ३७७-अब हम सोई परम पद जाना ॥ टेक ॥ ना उहाँ सिद्ध नहीं उहाँ साधक, दूसर कहत दिवाना ॥ न उहाँ चंद नहीं उहाँ सूरज, ना रजनी ना भाना ॥ मकरीको तार स्वेत है झीनी, तहाँ मेरो मन माना ॥ कहें कवीर चीटीके खुरमें, पिंड ब्रह्मंड समाना ॥
शब्द ३७८-अजगैबी बंदा गैब नगरसे आया ॥ टेक ॥ गैबी आया गैबसे, इहाँ लगाया ऐब ॥ उलट समाना गैबमें, छूट गया सब ऐब ॥ आप रहा जब रहा न कोई, एकहि एक कहाया ॥ जात बरन कुल रूप न रेखा, जिन यह राह चलाया ॥ पांचतत्त्व गुन तीन ना पहुँचे, सो वह देश कहाया ॥ ब्रह्मपुरीते इछा उलटी, निरगुन नाम धराया ॥ षट् दर्शनके बंद छुडाये, इब्राहिमहि चेताया ॥ कहें कवीर सुनु गोरख जोगी, जिन ढूँढा तिन पाया ॥
शब्द ३७९-जो बूझे सो बावरा। क्या उमर हमारी ॥ असंख्य जुग आगे गये, तबके हम ब्रह्मचारी ॥ टेक ॥ तीन देव जाने नहीं, सोई आदि हमारी ॥ कोट आये परमात्मा, परलोक सिधारी ॥ हमतो सदा मौजूद है, प्रगटे जुग चारी ॥ कोटन ब्रह्मा हो गये,
(८९६)
कवीरपंथी—
दस कोट कन्हई ॥ अनंत कोट विष्णु गये, मोरे एक पलाई ॥ सात कोट शंभू गये, सुहम्मद कोट चारी ॥ देवतनकी गिनती नहीं, का सृष्टि बिचारी ॥ बलि बावन केते भये, कौरव दल भारी ॥ लंकापति रावन गये, रघुपति कइ वारी ॥ ना बालक ना वृद्ध हों, ना पुरुष न नारी ॥ कहैं कवीर सुन गोरख, यह उमर हमारी ॥
शब्द ३८०—तुज बिन मेरा कोई नहीं, मैं किसे भजोरे दिवाना ॥ टे० ॥ मूल कमल चौकी गनपतकी, सुध बुध सबैं हेराना ॥ लोक लाज कुल पांचो मिलिया, हिलमिल मंगल गाना ॥ नाभ कैमलते लहर उठत है, सुनियो संत सुजाना ॥ इंगला पिगला सुषुमन नारी, उनमुनके घर लाना ॥ बंकनालते अमीरस झरिया, चारखे संत सयाना ॥ चंद सूर दोग्य आसन कीन्है, अनहद घोर निशाना ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, तत्त भेद अब जाना ॥ जो कोई होय नामका भेदी, नामहि सो लौ लाना ॥
शब्द ३८१—मेरे मन बस गये गगन अटरिया ॥ टेक ॥ गगन अटरिया पियाको बासा, ज्ञान पुरुष मठ धरिया ॥ जापर सुरस नगारा बाजे, उठत शब्द धुनकरिया ॥ त्रिकुटी महलमें ध्यान लगावे, जहां अमीरस झरिया ॥ कहैं कवीर जेहि शब्द न वेधे, तापर हनत कटरिया ॥
शब्द ३८२—तैं व्रतधारी नामका, तोहे और न भावे । काँच बांधके का करें, कंचन जो पावे ॥ टे० ॥ जप तप तीरथ संजमा, कोई काम न आवे ॥ विषै पियासे ना बुझे, नल का ससुझावे ॥ स्वात बुंदके कारने, चात्रिक लौ लावे ॥ सोई बुंद मोती भये, का सागर नावे ॥ राई ते लख नाम है, गुरुकृपा ते पावे ॥ कहैं कवीर धावत वने, तो गरभ न आवे ॥
शब्द ३८३—देखो रे घट जंतर बाजे, कौन बजावन हारा ॥ टे० ॥
शब्दावली
(८१७)
तनकी तांत सरंगी बाजे, केहि विधि गावन हारा ॥ उग्रगीता बांच सुनाऊं, जाने दास हमारा ॥ दूटो तार फूटगो तूबा, जंत्री होगये न्यारा ॥ अपरंपार पार पुरुषोत्तम, ताका करो विचारा ॥ जंत्री बिना जंत्र ना बाजे, बाजे सोई बजावे ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, शब्दमें सुरति समावे ॥
शब्द ३८४-यह संसे मोहि निशदिन व्यापे, कोई ना कहे समुझाई ॥ दीपक जोत औ प्राण आतमा, ना जानो कहाँ जाई ॥ टेक ॥ नाही ग्रह द्वार जहाँ नाही पांच तत्त्व जहाँ नाही ॥ इंगला पिंगला सुषुमन नाडी, बिनसे कहाँ समाहीं ॥ जल जरे तृण जहाँ बांचे, ले बैसंदर सीचे ॥ भीतर मूल फूल फल बाहिर, समुझपर कहु कैसे ॥ सीखे सुने पढे का होई, जौलो पद ना परसे ॥ कहें कवीर गगना बिनसे, ज्यों धागा उनमुनमें दरसे ॥
शब्द ३८५-अपने साहबसों मिल रहिये ॥ टेक ॥ जो काहूकी भली न आवे, बुरी काहेको कहिये ॥ जो कोई संत मिले बड़ भागी, दुख सुख उनसो कहिये ॥ जो कोई बादी बाद बढ़ावे, चार बात सुन रहिये ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, गुरुके चरण चित गहिये ॥
शब्द ३८६-मेरे मन लागा बान सुरंगी ॥ टे० ॥ जा तन लगी सोई तन जाने, का जाने जगत पतंगी ॥ ध्यानका धनुष ज्ञानका तुक्का, घायल पांचों संगी ॥ धन सतगुरु उपदेश दियो है, कीटते हो गये भुंगी ॥ कहें कवीर सोई जन बिरही, निशदिन प्रेम उमंगी ॥
शब्द ३८७-धन हो धन साहब बलिहारी । दाय्या कर जिव राख लिये हो, सुनिये परम उपकारी ॥ टे० ॥ प्रथमें प्रगट भये मथुरामें, तारे गोप गँवारी ॥ विप्र मधूकर लोक पठाये, कालरहा झक मारी ॥ तक्षक आय डसे रानीको, बिषम चढे अति भारी ॥
कवीरपंथी शब्दावली २९
(८९८)
कवीरपंथी—
सुमिरत प्रगट भये द्वापरमें, लीन्हे हंस उबारी ॥ एक समैं हरि जाचन आये, लीन्हा बसन उतारी ॥ अंमर देत बार ना लाये, राखे लज्जा भारी ॥ पांडव यज्ञ सुफल ना होने, बहुतक जुरे अचारी ॥ तुमरे भक्त जब आस उठाये, अघर घंट झनकारी ॥ हरिके मंदिर उठे न पावे, सिंधु लहर अधिकारी ॥ शब्द देयके सिंधु हटाये, कृतम चले संसारी ॥ साह सिकन्दर कसनी लीन्हा, अगिनमें दिये झुकाई ॥ मस्ता हाथी आन झुकाये, सिंहरूप दिखलाई ॥ मगहर जाय लीला एक कीन्हा, हिंदू तुरुक व्रतधारी ॥ दोनों दीन प्रतिज्ञा दीन्हे, मिट गये झगरा भारी ॥ काशी प्रगटे हांसी कराये, सँग गनिका मतवारी ॥ हरिके पंडा जरत उबारे, आपन चरन जल दारी ॥ जो जस सुमरे तहां तस प्रगटे, काह पुरुष को नारी ॥ साह दमोदर बूढत बचाये, राखे सिंधु मझारी ॥ जो जो सरन गहे सतगुरुकी, जिन जन सुरति संभारी ॥ धर्मदासपर दाय़ा कीन्हे, राज दिया लिख भारी ॥ जो सुमरे तेहि लोक पठाये, धर्मनि कहे पुकारी ॥ साहब कवीर परम सुखसागर, हमहूको लेव उबारी ॥
शब्द ३८८—लखे कोई विरला पद निरवान ॥ टे० ॥ करम काट जब भरम नशान ॥ सतगुरु चरन कमल धर ध्यान ॥ बिन रसनाके अंतर ध्यान ॥ ता विच दरसे पुरुष पुरान ॥ तीन लोकमें काल समान ॥ चौथे लोकमें नाम निशान ॥ रामानंद गुरु कीन्ह बखान ॥ साहेब कवीरके निरमल ज्ञान ॥
सत्यनाम ।
अथ शब्द बीजक प्रारम्भः ।
शब्द ३८९—संतो भगति सतो गुरु आनी । नारी एक पुरुष दुइ जाये, बूझहु पंडित ज्ञानी ॥ टे० ॥ पाहन फोरि गंग यक निकरी,
शब्दावली
(८९९)
चहुँ दिशि पानी पानी । तेहि पानी डुइ परबत बूढे, दरिया लहरि समानी ॥ उडि मक्खी तरवरको लागी, बोले एके बानी । वहि मक्खीके मक्खा नाही, गरभ रहा विन पानी ॥ नारी सकल पुरुषहिं खायो, ताते रही अकेला । कहहिं कवीर जो अबकी समुझे, सोई गुरु हम चेला ॥ १ ॥
शब्द ३९०-संतो जागत नींद न कीजै । काल न खाय कल्प नहिं व्यापै, देह जरा नहिं छीजै ॥ टे० ॥ उलटि गंग समुद्रहिं सोखै, शशि औ सूर आसै । नौ ग्रह मारि रोगिया बैठे, जलमें विंब प्रकाशै ॥ विन चरननको चहुँ दिशि धावै, विन लोचन जग सूझै । ससा उलटि सिंहको आसै, ई अचरज को बूझै ॥ औघे घडा नहीं जल बूढे, सीधे सो जल भरिया । जेहि कारन नर भिन्न भिन्न करै, गुरु प्रसादसे तरिया ॥ पैठि गुफामें सब जग देखै, बाहर कछुव न सूझै । उलटा बान पारथिहिं लागै, सूरा होय सो बूझै ॥ गायन कहै कबहुँ नहिं गावै, अनबोला नित गावै । नटवत बाजा पेखनी पेखै, अनहद हेत बढावै ॥ कथनी वदनी निज कै जोहै, ई सब अकथ कहानी । धरति उलटि अकाशहिं वेधे, ई पुरुषन की बानी ॥ बिना प्याला अमृत अचवै, नदी नीर भरि राखै । कहै कवीर सो जुग जुग जीवै, राम सुधारस चाखै ॥ २ ॥
शब्द ३९१-संतो घरमें झगरा भारी । राति दिवस मिलि उठि उठि लागैं, पांच ढोटा एक नारी ॥ टे० ॥ न्यारो न्यारो भोजन चाहैं पांचौ अधिक सवादी । कोइ काहूकों हटा न मानै आपुहिं आप सुरादी ॥ दुर्भति केर दोहागिनि मेठै ढोटे चांप चपेरे । कहहिं कवीर सोइ जन मेरा घरकी रार निवेरे ॥ ३ ॥
शब्द ३९२-संतो देखत जग बौराना । सांच कहाँ तो मारन धावै झूठै जग पतियाना ॥ टे० ॥ नेमी देखे धरमी देखे प्रात करै
(९००)
कवीरपंथी—
अस्नाना । आतम मारि पखानहि पूजे उनमें कछूव न ज्ञाना ॥ बहुतक देखा पीर औलिया पढे किताब कुराना । करि सुरीद तदवीर बतावै उनमें इहै जो ज्ञाना ॥ आसन मारि हिम्भ धरि बैठे मनमें बहुत गुमाना । पीतर पाथर पूजन लागे तीरथ गरब भुलाना ॥ माला पहिने टोपी दीन्है छाप तिलक अनुमाना । साखी शब्दै गावत भूले आतम खबरि न जाना ॥ हिंदू कहै मोहि राम पियारा तुरक कहै रहिमाना । आपसमें दोउ लरि लरि मूये मरम न काहू जाना ॥ घर घर मंत्र जे देत फिरत हैं महिमा के अभिमाना । गुरुवा सहित शिष्य सब बूढे अंतकाल पछिताना ॥ कहहि कवीर सुनो हो सन्तो ई सब भरम भुलाना । केतिक कहौ कहा नहि माने सहजै सहज समाना ॥ ४ ॥
शब्द ३९३-सन्तो अचरज एक भौ भाई । कहौ तो को पति- याई ॥ टे० ॥ एकै पुरुष एक है नारी ताकर करहु विचारा ॥ एकै अंड सकल चौरासी भरम भूल संसारा ॥ एकै नारी जाल पसारा जगमें भयो अंदेसा । खोजत काहू अंत न पाया ब्रह्मा विष्णु महेशा ॥ नाग फांस लिये घट भीतर मूसि सकल जग खाई ॥ ज्ञान खड़ग बिलु सब जग जूझै पकरि काहु ना पाई ॥ आपहि मूल फूल फुलवारी आपुहि चुनि चुनि खाई । कहहि कवीर जन उबरे जेहि गुरु लियो जगाई ॥ ५ ॥
शब्द ३९४-सन्तो अचरज एक भौ भारी, पुत्र धरल मह- तारी ॥ टे० ॥ पिताके संग भई बावरी कन्या रहल कुमारी ॥ खसमहि छोड़ि ससुर संग गवनी सो किन लेहु बिचारी ॥ भाई के संग सासुर आई सासु सौतिया दीन्हा । ननद भौज परंपंच रच्यो है मोर नाम कहि लीन्हा ॥ समधीके संग नाहीं आई
शब्दावली
(१०१)
सहज भई घरुवारी । कहहिं कवीर सुनो हो सन्तो पुरुष जनम भौ भारी ॥ ६ ॥
शब्द ३९५-सन्तो कहौं तोको पतियाई । झूँठा कहत साँच बनि आई ॥ ८० ॥ लोके रतन अवेध अमोलिक नहिं गाहक नहिं, साई । चिमिक २ चमके हग चहुँ दिशि अरब रहा छरियाई ॥ आपहिं गुरु किरपा कछु कीन्हा निरगुन अलख लखाई सहज समाधि उनसुनी जागे सहज मिले रघुराई ॥ जहाँ जहाँ देखो तहाँ तहाँ सोई मन मानिक बेध्यो हीरा । परम तत्त्व यह गुरु सो पायो कहै उपदेश कवीरा ॥ ७ ॥
शब्द ३९६-सन्तो आवै जाय सो माया । है प्रतिपाल काल नहिं वाके ना कहुं गया न आया ॥ ८० ॥ क्या मकसुद मच्छ कच्छ होना संखासुर न संहारा । अहैं दयाल द्रोह नहिं वाके कहौं कौन को मारा ॥ वै कर्ता नहिं बराह कहावै धरनि धरे नहिं भारा ॥ ई सब काम साहेबके नाहीं झूठ कहै संसारा ॥ खंभ फोर जो बाहर होई ताहि पतीज सब कोई ॥ हिरनाकुश नख उदर विदारे सो नहिं करता होई बावन रूप न बलिको जांचे जो जांचे सो माया । विना विवेक सकल जम जहाँडे माये जग भरमाया ॥ परशुराम छत्री नहिं मारा ई छल मायहिं कीन्हा । सतगुरु भगति भेद नहिं जाने जीव अमिथ्या दीन्हा ॥ सिरजन हार न व्याही सीता जल पषान नहिं बधा । वै रघुनाथ एकके सुमिरे जो सुमिरे सो अंधा ॥ गोपी ग्वाल गोकुल नहिं आये करते कंस न मारा । हे मिहर्बान सबनको साहेब नहिं जीता नहिं हारा ॥ वै करता नहिं बोध कहावै नहीं असुरको मारा ॥ ज्ञान हीन करता के भरमें माया जग संहारा ॥ वै कर्ता नहिं भये निकलंकी, नहिं कलि-गहि मारा । ई छल बल सब मायै कीन्हा, जत सत् सबटारा ॥
(१०२)
कवीरपंथी-
दस औतार ईसरी माया कर्ता कै जिन पूजा । कहहिं कवीर सुनौहो सन्तो उपजै खपै सो दूजा ॥ ८ ॥
शब्द ३१७-सन्तो बोले ते जग मारे । अनबोलेते कैसे के बनिहै शब्दै कोइ न विचारे ॥ ८० ॥ पहिले जन्म पहिले जनम पूतको भयऊ बाप जनमिया पाछे ॥ बाप पूतकी एकै नारी ई अचरज को काछे ॥ उंदुर राजा टीका बैठे विषहर करै खवासी । स्वान बापुरा धरनि ढाकनो बिल्ली घरमें दासी ॥ काँर दुकार कार करि आगे बैल करै पटवारी ॥ कहहि कवीर सुनो हो सन्तो भैसे न्याव निवारी ॥ ९ ॥ १ पाठ भेद-(कागज कार कारकुड आगे बैल करै पटवारी )
शब्द ३१८-सन्तो राह दुनो हम दीठा । हिन्दू तुरक हटा नहिं मानै स्वाद सबनको मीठा ॥ ८० ॥ हिन्दू बात एकादशी साथै दूध सिंघाडा सेती ॥ अनको त्यागे मन नहिं हटके वारन करै सगौती ॥ तुरुक रोजा निमाज गुजारे बिसमिल बांग पुकारै । उनकी भिस्त कहाँसे होहैं सङ्झे सुरगी मारै ॥ हिंदूकी दया मेहर तुरकनकी दोनों घटसो त्यागी । वे हलाल वे झटका मारै आगि दुनों घर लागी । हिंदू तुरुककी एक राह है सतगुरु इहै बताई । कहै कवीर सुनो हो संतो राम न कहौ खुदाई ॥ १० ॥
शब्द ३१९-संतो पांडे निपुन कसाई । बकरा मारि मैसापर धावै दिलमें दरद न आई ॥ ८० ॥ करि अस्नान तिलक दे बैठे विधि सो देवि पुजार्ई । आतम राम पलकसो विनशे रुधिरकी नदी बहाई ॥ अति पुनीत ऊंचे कुल कहिये सभा माहि अधि-कार्ई । इनते दिच्छा सब कोई मांगे हंसि आवै मोहिं भाई ॥ पाप कटनको कथा सुनावै कर्म करावै नीचा । बृद्धत दोऊ पर-स्पर देखा गहे हाथ जम घीचा ॥ गाय बधे तेहि तुरका कहिये
शब्दावली
(१०३)
उनते क्या वै छोटा। कहहिं कवीर मुनो हो संतो कलिके ब्राह्मण खोटा ॥ ११ ॥
शब्द ४००—संतो मते मात जन रंगी। पीवत प्याला प्रेम सुधारस मतवाले सतसंगी ॥ टे० ॥ अरघ उरघ लै भाठी रोपी ब्रह्म अग्नि उदगारी। मूंदे मदन कर्म कटि कस्मल संतत चुवै अगारी ॥ गोरख दत्त वशिष्ठव्यास कवि नारद सुक मुनि जोरी, सभा बैठि शम्भू शनकादिक तहं फिरि अघर कटोरी ॥ अम्बरीष औ जाज्ञ (वल्क) जनक जड़ सेष सहस मुख पाना। कहलौं कहौं अनन्त कोटि लै अमहल महल दिवाना ॥ ध्रुव प्रह्लाद विभीषन माते माती शिवकी नारी। सगुन ब्रह्म माते बृन्दावन अजहुं न छूटि खुमारी ॥ सुर नर मुनि जेते पीर औलिया जिनरे पिया तिन जाना, कहैं कवीर गूणकी सक्कर क्यों कर करै बखाना ॥ १२ ॥
शब्द ४०१—राम तेरि माया द्रन्द्व मचावै गति मति वाकी समुझ परै नहिं सुर नर मुनिहिं नचावै ॥ टे० ॥ क्या सेमरकी साखा बढये फूल अन्तपम बानी। केतिक चात्रिक लाग रहे हैं चाखत रुवा उडानी ॥ कहा खजूर बडाई तेरी फल कोई नहिं पावै। श्रीषम रिनु जब आय तुलानी छाया काम न आवै ॥ अपना चतुर औरको सिखवै कामिनि कनक स्यानी। कहहिं कवीर मुनो हो सन्तो राम चरण रति मानी ॥ १३ ॥
शब्द ४०२—रामरा संशय गांठ न छूटै, ताते पकरि जम लूटै, ॥ टे० ॥ होय मिसकीन कुलीन कहावे तुम जोगी सन्यासी। ज्ञानी गुनी सूर कवि दाता ई मति काहु न नासी ॥ सुम्रिति वेद पुरान पढ़ैं सब अनुभव भाव न दरसे। लोह हिरन्य होय धौं कैसे जो नहिं पारस परसे ॥ जियत न तरे मुयेका तरिहो जियते
(१०४)
कवीरपंथी—
जो न तरे । गहि परतीति कीन जिन जासों सोई तहैं मरे ॥ जो कहु कियो ज्ञान अज्ञाना सोई समुझ स्याना । कहैं कवीर तासों का कहिये देखत दधि भुलाना ॥ १४ ॥
शब्द ४०३—रामरा चली बिनावन माहो । घर छोड़े जात जोलाहो ॥ टे० ॥ गज नौ गज दस गज उनइसकी पुरिया एक तनाई । सात सूत नौ गाड़ बहतारि पाट लागु अधिकार्ई ॥ तापट तूल न गजन अमाई पैसन सेर अढार्ई । तामैं घटै बढै रतिओ नहीं करकच करघ रहाई ॥ तिन उठि बैठ खसम सो बरबस तापर लागु तिहाई । भीनी पुरिया काम न आवे जोलहा चला रिसार्ई ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो जिन यह सूधि उपाई, छाड़ि पसार राम भजु बौरै भवसागर कठिनाई ॥ १५ ॥
शब्द ४०४—रामरा झीझी जंतर बाजे । कर चरन विहूना राजै ॥ टे० ॥ कर विनु बाजे सुने सरवन विनु सरवने सरोता होई । पाटन स्ववस सभा विनु अवसर बूझे सुनि जन लोई ॥ इंद्रि विनु भोग स्वाद जिह्वा विनु अच्छय पिंड विहूना । जागत चौर मंदिर तहैं मूसे स्वम्भ अच्छत घर सूना ॥ बीज विनु अंकुर पेड़ विनु तरुवर विनु फूले फल फलिया । बांझके कोख पुत्र अव- तरिया विनु पग तरुवर चढिया ॥ मसि विनु द्राइत कलम विनु कागज विनु अच्छर सुधि होई । सुधि विनु सहज ज्ञान विनु ज्ञाता कहैं कवीर जन सोई ॥ १६ ॥
शब्द ४०५—राम गाइ औरन समुझावे, हरि जाने विनु विकल फिरे ॥ टे० ॥ जा मुख वेद गायत्री उचरे तासु वचन संसार तरे ॥ जाके पांव जगत उठि लागे सो ब्राह्मन जिव बद्ध करै ॥ अपना ऊंच नीच घर भोजन धीन कर्म करि उदर भरै । ग्रहन अमावस ढुकि ढुकि मांगै कर दीपक लिये कूप परै ॥ एकादशी व्रती