कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
अस्नाना । आतम मारि पखानहि पूजे उनमें कछूव न ज्ञाना ॥ बहुतक देखा पीर औलिया पढे किताब कुराना । करि सुरीद तदवीर बतावै उनमें इहै जो ज्ञाना ॥ आसन मारि हिम्भ धरि बैठे मनमें बहुत गुमाना । पीतर पाथर पूजन लागे तीरथ गरब भुलाना ॥ माला पहिने टोपी दीन्है छाप तिलक अनुमाना । साखी शब्दै गावत भूले आतम खबरि न जाना ॥ हिंदू कहै मोहि राम पियारा तुरक कहै रहिमाना । आपसमें दोउ लरि लरि मूये मरम न काहू जाना ॥ घर घर मंत्र जे देत फिरत हैं महिमा के अभिमाना । गुरुवा सहित शिष्य सब बूढे अंतकाल पछिताना ॥ कहहि कवीर सुनो हो सन्तो ई सब भरम भुलाना । केतिक कहौ कहा नहि माने सहजै सहज समाना ॥ ४ ॥
शब्द ३९३-सन्तो अचरज एक भौ भाई । कहौ तो को पति- याई ॥ टे० ॥ एकै पुरुष एक है नारी ताकर करहु विचारा ॥ एकै अंड सकल चौरासी भरम भूल संसारा ॥ एकै नारी जाल पसारा जगमें भयो अंदेसा । खोजत काहू अंत न पाया ब्रह्मा विष्णु महेशा ॥ नाग फांस लिये घट भीतर मूसि सकल जग खाई ॥ ज्ञान खड़ग बिलु सब जग जूझै पकरि काहु ना पाई ॥ आपहि मूल फूल फुलवारी आपुहि चुनि चुनि खाई । कहहि कवीर जन उबरे जेहि गुरु लियो जगाई ॥ ५ ॥
शब्द ३९४-सन्तो अचरज एक भौ भारी, पुत्र धरल मह- तारी ॥ टे० ॥ पिताके संग भई बावरी कन्या रहल कुमारी ॥ खसमहि छोड़ि ससुर संग गवनी सो किन लेहु बिचारी ॥ भाई के संग सासुर आई सासु सौतिया दीन्हा । ननद भौज परंपंच रच्यो है मोर नाम कहि लीन्हा ॥ समधीके संग नाहीं आई