कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 913, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(८९९)
चहुँ दिशि पानी पानी । तेहि पानी डुइ परबत बूढे, दरिया लहरि समानी ॥ उडि मक्खी तरवरको लागी, बोले एके बानी । वहि मक्खीके मक्खा नाही, गरभ रहा विन पानी ॥ नारी सकल पुरुषहिं खायो, ताते रही अकेला । कहहिं कवीर जो अबकी समुझे, सोई गुरु हम चेला ॥ १ ॥
शब्द ३९०-संतो जागत नींद न कीजै । काल न खाय कल्प नहिं व्यापै, देह जरा नहिं छीजै ॥ टे० ॥ उलटि गंग समुद्रहिं सोखै, शशि औ सूर आसै । नौ ग्रह मारि रोगिया बैठे, जलमें विंब प्रकाशै ॥ विन चरननको चहुँ दिशि धावै, विन लोचन जग सूझै । ससा उलटि सिंहको आसै, ई अचरज को बूझै ॥ औघे घडा नहीं जल बूढे, सीधे सो जल भरिया । जेहि कारन नर भिन्न भिन्न करै, गुरु प्रसादसे तरिया ॥ पैठि गुफामें सब जग देखै, बाहर कछुव न सूझै । उलटा बान पारथिहिं लागै, सूरा होय सो बूझै ॥ गायन कहै कबहुँ नहिं गावै, अनबोला नित गावै । नटवत बाजा पेखनी पेखै, अनहद हेत बढावै ॥ कथनी वदनी निज कै जोहै, ई सब अकथ कहानी । धरति उलटि अकाशहिं वेधे, ई पुरुषन की बानी ॥ बिना प्याला अमृत अचवै, नदी नीर भरि राखै । कहै कवीर सो जुग जुग जीवै, राम सुधारस चाखै ॥ २ ॥
शब्द ३९१-संतो घरमें झगरा भारी । राति दिवस मिलि उठि उठि लागैं, पांच ढोटा एक नारी ॥ टे० ॥ न्यारो न्यारो भोजन चाहैं पांचौ अधिक सवादी । कोइ काहूकों हटा न मानै आपुहिं आप सुरादी ॥ दुर्भति केर दोहागिनि मेठै ढोटे चांप चपेरे । कहहिं कवीर सोइ जन मेरा घरकी रार निवेरे ॥ ३ ॥
शब्द ३९२-संतो देखत जग बौराना । सांच कहाँ तो मारन धावै झूठै जग पतियाना ॥ टे० ॥ नेमी देखे धरमी देखे प्रात करै