कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
सुमिरत प्रगट भये द्वापरमें, लीन्हे हंस उबारी ॥ एक समैं हरि जाचन आये, लीन्हा बसन उतारी ॥ अंमर देत बार ना लाये, राखे लज्जा भारी ॥ पांडव यज्ञ सुफल ना होने, बहुतक जुरे अचारी ॥ तुमरे भक्त जब आस उठाये, अघर घंट झनकारी ॥ हरिके मंदिर उठे न पावे, सिंधु लहर अधिकारी ॥ शब्द देयके सिंधु हटाये, कृतम चले संसारी ॥ साह सिकन्दर कसनी लीन्हा, अगिनमें दिये झुकाई ॥ मस्ता हाथी आन झुकाये, सिंहरूप दिखलाई ॥ मगहर जाय लीला एक कीन्हा, हिंदू तुरुक व्रतधारी ॥ दोनों दीन प्रतिज्ञा दीन्हे, मिट गये झगरा भारी ॥ काशी प्रगटे हांसी कराये, सँग गनिका मतवारी ॥ हरिके पंडा जरत उबारे, आपन चरन जल दारी ॥ जो जस सुमरे तहां तस प्रगटे, काह पुरुष को नारी ॥ साह दमोदर बूढत बचाये, राखे सिंधु मझारी ॥ जो जो सरन गहे सतगुरुकी, जिन जन सुरति संभारी ॥ धर्मदासपर दाय़ा कीन्हे, राज दिया लिख भारी ॥ जो सुमरे तेहि लोक पठाये, धर्मनि कहे पुकारी ॥ साहब कवीर परम सुखसागर, हमहूको लेव उबारी ॥
शब्द ३८८—लखे कोई विरला पद निरवान ॥ टे० ॥ करम काट जब भरम नशान ॥ सतगुरु चरन कमल धर ध्यान ॥ बिन रसनाके अंतर ध्यान ॥ ता विच दरसे पुरुष पुरान ॥ तीन लोकमें काल समान ॥ चौथे लोकमें नाम निशान ॥ रामानंद गुरु कीन्ह बखान ॥ साहेब कवीरके निरमल ज्ञान ॥
सत्यनाम ।
अथ शब्द बीजक प्रारम्भः ।
शब्द ३८९—संतो भगति सतो गुरु आनी । नारी एक पुरुष दुइ जाये, बूझहु पंडित ज्ञानी ॥ टे० ॥ पाहन फोरि गंग यक निकरी,