कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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तनकी तांत सरंगी बाजे, केहि विधि गावन हारा ॥ उग्रगीता बांच सुनाऊं, जाने दास हमारा ॥ दूटो तार फूटगो तूबा, जंत्री होगये न्यारा ॥ अपरंपार पार पुरुषोत्तम, ताका करो विचारा ॥ जंत्री बिना जंत्र ना बाजे, बाजे सोई बजावे ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, शब्दमें सुरति समावे ॥
शब्द ३८४-यह संसे मोहि निशदिन व्यापे, कोई ना कहे समुझाई ॥ दीपक जोत औ प्राण आतमा, ना जानो कहाँ जाई ॥ टेक ॥ नाही ग्रह द्वार जहाँ नाही पांच तत्त्व जहाँ नाही ॥ इंगला पिंगला सुषुमन नाडी, बिनसे कहाँ समाहीं ॥ जल जरे तृण जहाँ बांचे, ले बैसंदर सीचे ॥ भीतर मूल फूल फल बाहिर, समुझपर कहु कैसे ॥ सीखे सुने पढे का होई, जौलो पद ना परसे ॥ कहें कवीर गगना बिनसे, ज्यों धागा उनमुनमें दरसे ॥
शब्द ३८५-अपने साहबसों मिल रहिये ॥ टेक ॥ जो काहूकी भली न आवे, बुरी काहेको कहिये ॥ जो कोई संत मिले बड़ भागी, दुख सुख उनसो कहिये ॥ जो कोई बादी बाद बढ़ावे, चार बात सुन रहिये ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, गुरुके चरण चित गहिये ॥
शब्द ३८६-मेरे मन लागा बान सुरंगी ॥ टे० ॥ जा तन लगी सोई तन जाने, का जाने जगत पतंगी ॥ ध्यानका धनुष ज्ञानका तुक्का, घायल पांचों संगी ॥ धन सतगुरु उपदेश दियो है, कीटते हो गये भुंगी ॥ कहें कवीर सोई जन बिरही, निशदिन प्रेम उमंगी ॥
शब्द ३८७-धन हो धन साहब बलिहारी । दाय्या कर जिव राख लिये हो, सुनिये परम उपकारी ॥ टे० ॥ प्रथमें प्रगट भये मथुरामें, तारे गोप गँवारी ॥ विप्र मधूकर लोक पठाये, कालरहा झक मारी ॥ तक्षक आय डसे रानीको, बिषम चढे अति भारी ॥
कवीरपंथी शब्दावली २९