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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(१०१)

सहज भई घरुवारी । कहहिं कवीर सुनो हो सन्तो पुरुष जनम भौ भारी ॥ ६ ॥

शब्द ३९५-सन्तो कहौं तोको पतियाई । झूँठा कहत साँच बनि आई ॥ ८० ॥ लोके रतन अवेध अमोलिक नहिं गाहक नहिं, साई । चिमिक २ चमके हग चहुँ दिशि अरब रहा छरियाई ॥ आपहिं गुरु किरपा कछु कीन्हा निरगुन अलख लखाई सहज समाधि उनसुनी जागे सहज मिले रघुराई ॥ जहाँ जहाँ देखो तहाँ तहाँ सोई मन मानिक बेध्यो हीरा । परम तत्त्व यह गुरु सो पायो कहै उपदेश कवीरा ॥ ७ ॥

शब्द ३९६-सन्तो आवै जाय सो माया । है प्रतिपाल काल नहिं वाके ना कहुं गया न आया ॥ ८० ॥ क्या मकसुद मच्छ कच्छ होना संखासुर न संहारा । अहैं दयाल द्रोह नहिं वाके कहौं कौन को मारा ॥ वै कर्ता नहिं बराह कहावै धरनि धरे नहिं भारा ॥ ई सब काम साहेबके नाहीं झूठ कहै संसारा ॥ खंभ फोर जो बाहर होई ताहि पतीज सब कोई ॥ हिरनाकुश नख उदर विदारे सो नहिं करता होई बावन रूप न बलिको जांचे जो जांचे सो माया । विना विवेक सकल जम जहाँडे माये जग भरमाया ॥ परशुराम छत्री नहिं मारा ई छल मायहिं कीन्हा । सतगुरु भगति भेद नहिं जाने जीव अमिथ्या दीन्हा ॥ सिरजन हार न व्याही सीता जल पषान नहिं बधा । वै रघुनाथ एकके सुमिरे जो सुमिरे सो अंधा ॥ गोपी ग्वाल गोकुल नहिं आये करते कंस न मारा । हे मिहर्बान सबनको साहेब नहिं जीता नहिं हारा ॥ वै करता नहिं बोध कहावै नहीं असुरको मारा ॥ ज्ञान हीन करता के भरमें माया जग संहारा ॥ वै कर्ता नहिं भये निकलंकी, नहिं कलि-गहि मारा । ई छल बल सब मायै कीन्हा, जत सत् सबटारा ॥

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