कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
दस औतार ईसरी माया कर्ता कै जिन पूजा । कहहिं कवीर सुनौहो सन्तो उपजै खपै सो दूजा ॥ ८ ॥
शब्द ३१७-सन्तो बोले ते जग मारे । अनबोलेते कैसे के बनिहै शब्दै कोइ न विचारे ॥ ८० ॥ पहिले जन्म पहिले जनम पूतको भयऊ बाप जनमिया पाछे ॥ बाप पूतकी एकै नारी ई अचरज को काछे ॥ उंदुर राजा टीका बैठे विषहर करै खवासी । स्वान बापुरा धरनि ढाकनो बिल्ली घरमें दासी ॥ काँर दुकार कार करि आगे बैल करै पटवारी ॥ कहहि कवीर सुनो हो सन्तो भैसे न्याव निवारी ॥ ९ ॥ १ पाठ भेद-(कागज कार कारकुड आगे बैल करै पटवारी )
शब्द ३१८-सन्तो राह दुनो हम दीठा । हिन्दू तुरक हटा नहिं मानै स्वाद सबनको मीठा ॥ ८० ॥ हिन्दू बात एकादशी साथै दूध सिंघाडा सेती ॥ अनको त्यागे मन नहिं हटके वारन करै सगौती ॥ तुरुक रोजा निमाज गुजारे बिसमिल बांग पुकारै । उनकी भिस्त कहाँसे होहैं सङ्झे सुरगी मारै ॥ हिंदूकी दया मेहर तुरकनकी दोनों घटसो त्यागी । वे हलाल वे झटका मारै आगि दुनों घर लागी । हिंदू तुरुककी एक राह है सतगुरु इहै बताई । कहै कवीर सुनो हो संतो राम न कहौ खुदाई ॥ १० ॥
शब्द ३१९-संतो पांडे निपुन कसाई । बकरा मारि मैसापर धावै दिलमें दरद न आई ॥ ८० ॥ करि अस्नान तिलक दे बैठे विधि सो देवि पुजार्ई । आतम राम पलकसो विनशे रुधिरकी नदी बहाई ॥ अति पुनीत ऊंचे कुल कहिये सभा माहि अधि-कार्ई । इनते दिच्छा सब कोई मांगे हंसि आवै मोहिं भाई ॥ पाप कटनको कथा सुनावै कर्म करावै नीचा । बृद्धत दोऊ पर-स्पर देखा गहे हाथ जम घीचा ॥ गाय बधे तेहि तुरका कहिये