कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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उनते क्या वै छोटा। कहहिं कवीर मुनो हो संतो कलिके ब्राह्मण खोटा ॥ ११ ॥
शब्द ४००—संतो मते मात जन रंगी। पीवत प्याला प्रेम सुधारस मतवाले सतसंगी ॥ टे० ॥ अरघ उरघ लै भाठी रोपी ब्रह्म अग्नि उदगारी। मूंदे मदन कर्म कटि कस्मल संतत चुवै अगारी ॥ गोरख दत्त वशिष्ठव्यास कवि नारद सुक मुनि जोरी, सभा बैठि शम्भू शनकादिक तहं फिरि अघर कटोरी ॥ अम्बरीष औ जाज्ञ (वल्क) जनक जड़ सेष सहस मुख पाना। कहलौं कहौं अनन्त कोटि लै अमहल महल दिवाना ॥ ध्रुव प्रह्लाद विभीषन माते माती शिवकी नारी। सगुन ब्रह्म माते बृन्दावन अजहुं न छूटि खुमारी ॥ सुर नर मुनि जेते पीर औलिया जिनरे पिया तिन जाना, कहैं कवीर गूणकी सक्कर क्यों कर करै बखाना ॥ १२ ॥
शब्द ४०१—राम तेरि माया द्रन्द्व मचावै गति मति वाकी समुझ परै नहिं सुर नर मुनिहिं नचावै ॥ टे० ॥ क्या सेमरकी साखा बढये फूल अन्तपम बानी। केतिक चात्रिक लाग रहे हैं चाखत रुवा उडानी ॥ कहा खजूर बडाई तेरी फल कोई नहिं पावै। श्रीषम रिनु जब आय तुलानी छाया काम न आवै ॥ अपना चतुर औरको सिखवै कामिनि कनक स्यानी। कहहिं कवीर मुनो हो सन्तो राम चरण रति मानी ॥ १३ ॥
शब्द ४०२—रामरा संशय गांठ न छूटै, ताते पकरि जम लूटै, ॥ टे० ॥ होय मिसकीन कुलीन कहावे तुम जोगी सन्यासी। ज्ञानी गुनी सूर कवि दाता ई मति काहु न नासी ॥ सुम्रिति वेद पुरान पढ़ैं सब अनुभव भाव न दरसे। लोह हिरन्य होय धौं कैसे जो नहिं पारस परसे ॥ जियत न तरे मुयेका तरिहो जियते