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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(८९५)

उठगये हाट तब कछु न बना रे ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, मूल गँवाय चले अपना रे ॥

शब्द ३७६-निज घर जान बेजाना। दगाबाज बटपार बटोही, इनका लगा जमाना ॥ टेक ॥ अपने दिलका कोइ न मिलिया, मिलिया लोग बिगाना ॥ भूला लोग फिरे बेअकूल, इनका नहीं ठिकाना ॥ सेमरफूल जगत इक फूला, ताहि देख लोभियाना ॥ मारत चोंच रुवा उधराने, फिर पाछे पछताना ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, या पद है निरबाना ॥ जो या पदको समुझे बूझे, पहुँचे पुरुष ठिकाना ॥

शब्द ३७७-अब हम सोई परम पद जाना ॥ टेक ॥ ना उहाँ सिद्ध नहीं उहाँ साधक, दूसर कहत दिवाना ॥ न उहाँ चंद नहीं उहाँ सूरज, ना रजनी ना भाना ॥ मकरीको तार स्वेत है झीनी, तहाँ मेरो मन माना ॥ कहें कवीर चीटीके खुरमें, पिंड ब्रह्मंड समाना ॥

शब्द ३७८-अजगैबी बंदा गैब नगरसे आया ॥ टेक ॥ गैबी आया गैबसे, इहाँ लगाया ऐब ॥ उलट समाना गैबमें, छूट गया सब ऐब ॥ आप रहा जब रहा न कोई, एकहि एक कहाया ॥ जात बरन कुल रूप न रेखा, जिन यह राह चलाया ॥ पांचतत्त्व गुन तीन ना पहुँचे, सो वह देश कहाया ॥ ब्रह्मपुरीते इछा उलटी, निरगुन नाम धराया ॥ षट् दर्शनके बंद छुडाये, इब्राहिमहि चेताया ॥ कहें कवीर सुनु गोरख जोगी, जिन ढूँढा तिन पाया ॥

शब्द ३७९-जो बूझे सो बावरा। क्या उमर हमारी ॥ असंख्य जुग आगे गये, तबके हम ब्रह्मचारी ॥ टेक ॥ तीन देव जाने नहीं, सोई आदि हमारी ॥ कोट आये परमात्मा, परलोक सिधारी ॥ हमतो सदा मौजूद है, प्रगटे जुग चारी ॥ कोटन ब्रह्मा हो गये,