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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(८९४)

कवीरपंथी—

मिल धोखा खाई, कहै जसोदाके कन्हार्ई ॥ कोई जंगल कोइ देवल बतावे, कोइ द्वारका जाई ॥ कोइ अकाश पताल बतावे, कोइ गोकुल ठहराई ॥ जमुना विमल प्रवाह थकित भये, पवन रहे ठहराई ॥ सोरा बसुधा एकदश पुरलो, सब सुरछित होय जाई ॥ सात ससुन्दर जबे घहराने, तेतिस कोट अघाई ॥ तीन लोक तीनो पुर थाके, इन्द्र उठे अकुलाई ॥ दस औतार कृष्णलौ थाके, कूर्म बहुत सुख पाई ॥ ससुझ न वार पारलौ, यह धुन कहाँसे आई ॥ शेषनाग औ राजा वासुक, वाराह सुच्छित होय जाई ॥ देव निरंजन अद्या माया, ये हुनहुं शिर नाई ॥ कहैं कवीर सतलोकके पूरष, शब्द केर सुर नाई ॥ अभी अंकते कुडुक निकारी, तीन लोक रहु छाई ॥

३७४—अपने पियाके मैं प्यारी सबसौ न्यारी ॥ टेक ॥ एक कंचन दूजे कामनी इन जग मोहा ॥ ऐसा कोइ न देखिया इनते बांचा ओहा ॥ कामदेव एक भूष है सबको लागा ॥ केते तपसी बनगये बनमें जागा ॥ गोपीके कारन कृष्णजी बन बन नाचा ॥ सीताके कारन राम रावन रन माचा ॥ ब्रह्मलोक ब्रह्म डिगे कन्या मोहा ॥ सुर नर मुनि सब पच मरे बांधे लोहा ॥ गगन मंडल बिच बैठके, सुनले बाजा ॥ कहैं कवीर गुरु ज्ञानसे आतम जागा ॥

शब्द ३७५—याद करो दिन बाद जाता है, सतगुरु शब्द सनेह बिना रे ॥ टेक ॥ जठर अग्निमें बूंदे जमाया, पानीसे पिंड किया रचना रे ॥ उहाँ तुझे खान पान पहुंचावे, ऐसो साहब है अपना रे ॥ नौ दस मास गरभ प्रतिपाले, कर कर कोटि जतना रे ॥ नाम लेत तोहि लाज लगत है, मायामें भूल रहौ मना रे ॥ बालापनमें खेल गँवाये, तरुनामें कछु रूप बना रे ॥ त्रिध भये तन आलस उपजे, जीवन मरन रैन सपना रे ॥ अवध घटे जब काल गरासे,