कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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त्रिगुणतत्त्वता इक बावरे, कारजमें सकल जहान रे॥ पांच पचीस तोहि निशदिन ब्यापे, ताको रंग पहिचान रे ॥ पांच पचीससो रहे निरंतर, पावे निरबान रे ॥ झिल मिल जोत झलक एक निर्मल, रंग सुरंगी जान रे ॥ कहैं कवीर संत सोइ आला, जापर भगति निशान रे ॥
शब्द ३७०-गोरख हम तबसे भयेउं बैरागी । मेरी सुरति आदसे लागी ॥ टे० ॥ धुंधीकाल धुंधका मेला, नहीं गुरु नहिं चेला ॥ ताही दिन हम मूंड मुंडाये, जब वह पुरुष अकेला ॥ धरती नहीं जब टोपी दीन्हा, ब्रह्मा नहीं तब टीका ॥ महादेवका जनम नहीं हतो, जबते योग हम सीखा ॥ सतगुरुमें हम लीन फाउरी, द्वापर लीन्हें डंडा ॥ त्रेतामें हम आडबंद खैंचे, कलछ फिरे नौखंडा ॥ काशीमें बिसराम कियो है, रामानंद चेताया ॥ कहैं कवीर सुन गोरख जोगी, हंस उबारन आया ॥
शब्द ३७१-सुरतसो देखले वह देश । देखत देखत दीसन लागे, मिट गये सकल अंदेश ॥ टे० ॥ ना उहां चंदा ना उहां सूरज, नहीं पवन परवेश ॥ ना उहां जाप नहीं उहां अजपा, नहिं अच्छर लवलेश ॥ उहांके गये बहुर ना आये, ना कोई कहत संदेश ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधो, गहु सतगुरु उपदेश ॥
शब्द ३७२-कोई कछु कहे दिल लागा है । तन भी लागा मन भी लागा, ज्यों सुई बिच धागा है ॥ टे० ॥ मेरे मन लागा नाम भजनमें, हटकत लोग अभागा है ॥ बरत अगिनमें कंचन डारे, सोनामें मिलत सोहागा है ॥ हंसकी बानी हंस पहिचाने, क्या जानेगा कागा है ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जीव ब्रह्म होय जागा है ॥
शब्द ३७३-एक दिन साहब बेन बजाई ॥ टेक ॥ सब गोपी