कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
धन सतगुरु जे जुगति बताई, ताकी मैं बलिहारी॥ सार शब्दकी नहया बनी है, मोहकी मकरिया लाय । गुन सहासकी हाजत नाहों, ऐसा साज बनाय ॥ कहै कबीर जो बिन शिर खेवै, सो यह संत बखाने । या वोहितकी अकथ कथा है, बिरले खेवट जाने ॥
शब्द ३६६—मन मौजी बैरागी । आवना मन भावना ॥८०॥ पांच तत्त्वके या तन गुदरी, सुरतिकी तोप चलावना ॥ इंगला पिंगला सुषुमन नारी, त्रिकुटी ध्यान बसावना ॥ अनहद बाजा निशदिन बाजे, भँवर गुफा ठहरावना ॥ गगन मंडलको किये पयाना, कहैं कबीर समुझावना ॥
शब्द ३६७—बाबा शरनागत ताकी है ॥ सुरति सोहागिन भई मतवाली, नाम सुधारस छाकी है ॥ टेक ॥ नाम अमोल अपार साहबका, ताहीके संग राची है ॥ निरख परख चरणों चित लागे, उझक झरोखा झांकी है ॥ अंतरगतियें भई उजियारी बिन, दीपक बिन बाती है ॥ कहैं कबीर सुमर सत नामें, आदि अंतसो थाकी है ॥
शब्द ३६८—अहो कब मिलोगे सनेही आय ॥ टेक ॥ चलो सखी जहां देखन चलिये, जहां पुरुष निरबान ॥ हंस हिंमर चौर डुरावे, तनकी तपन बुझान ॥ चारों जुगके हंस उबारे, अजहुँ उबारे आय ॥ जाकी सांची सुरति लगी है, सो वा घरको जाय ॥ भौसागर औगाह अगम है, सूझे वार न पार ॥ सतगुरु साहब हंस उबारन, बांह पकरके तार ॥ कहैं कबीर सुनो भाइ साधो, शब्द रहो लौलाय ॥ नाम पान पानी मिल लैहो, तब सतलोक सिंघाय ॥
शब्द ३६९—भला परदेसिया तू मेरी कही मान रे ॥ टेक ॥ जुगन जुगन तोहि कहि समझाऊं, आद संदेसी मोहि जान रे ॥