कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 905, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(८९१)
शब्द ३६२-सतगुरु अगमकी राह उघारी॥ टे०॥ जतन जतन कर तन मन साधो, मुखमन सुरति संभारी॥ मिट गइ तिमिर दरस भयो तिनको, पाइ परमपद भारी॥ हीरालाल जौहर तहां दरसे, हरदम नाम निहारी॥ निश दिन पल पल नाम सो लागे, ऐसो अमल करारी॥ महा बारीख मुकुतिको मारग, पच्छिम खुली किंवारी॥ नौपत नाम ध्वजा फहरावे, चढ गइ सुरत अटारी॥ याही चाल मिलो सतगुरुसो, मानो सीख हमारी॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, चेत लेहु नर नारी॥
शब्द ३६३-थोरे थोरे खाऊंगी, मैं अंत न जाऊंगी॥ गुरुके शब्द लेके सहज समाऊंगी॥ टेक॥ खाई मैं ननद दुलहे भुजा मरोरी सासु, मैं खाई दोय पग तोरी॥ खाऊं मैं देवर खाऊं मैं जेठ। पुनि मैं खाऊं ससुरा ठेठ॥ खाऊं मैं माई खाऊं मैं भाई। पुनि मैं खाऊं घरक जँमाई॥ खाऊं मैं पांच कुटुमके लोग। कहें कवीर तब सीझा जोग॥
शब्द ३६४-हरि मोहिं एक अचंभा भावे। सासुको बहुवा खिलावे॥ टे०॥ बहुवाके घर ससुरा जाई। सासु बधैया ले घर आई॥ मूसाके सभा सरप एक नाचे, मैडक ताल बजावे। कौवा बैठे सगुन विचारे, भैंस बिसुन पद गावे॥ बिना बीजके बूच्छ लगाया बिन, पानी पलुवाया। ऊपर मूल नीचे भइ डारी, अमृत फूल फुलाया॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, जो या शब्द बुझावे। जो या पदको गाय विचारे, सोई सदा रहावे॥
शब्द ३६५-नइया मेरी नीकी चलने लागी। आंधी मेह कछु ना व्यापे, चढे संत बड़ भागी॥ टेक॥ उथल परै तो डर कछु नाहीं, ना गहिरेका साँसा। उलट जाय तो बार न बाँका, याका अजब तमासा॥ औसर परै तो परबत बोझो, तेऊ न लागे भारी।