कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(८७७)
के कारण, नीरंजन बिगरे ॥ चौदालोक वेदको मंडल, जहां लग व्यास पड़े । सोरा खंड अच्छर भगवाना, उपजके बिनस मरे ॥ सत्राखंड पर अधर दीप जहां, शब्द अतीत खड़े । ताके आगे चार धाम है, रैन दिवस न टरे ॥ लोमस हंस मिले साहेबसों, चहुं जुग मुक्ति भरे, कहें कवीर सुनो मतिमंदा, सो हंसा उबरे ॥
शब्द ३२१-नानक ऐसा न्याय निवेरो । कलह कालकी ज्वाल न झंपे, मिटे भरमके फेरो ॥ टेक ॥ जो तन तंबू बहु विस्तारा, बिनही मेख लगाना ॥ महातत्त्वका लकडा गाडो, पांच सदर ले ताना ॥ जैसे घटा आवमें ढूबे बिन सीझेना बाजे ॥ पांच तत्त्वके मिश्रित लागी सहजे करत अवाजे ॥ जैसे जंत्री जंत्र बजावे, बाजे सोई बजावे ॥ वाजत है पर दीसत नाही, ताकौ कहा लखावे ॥ चाम महलमें बानी बोले, रूप सवाया रानी ॥ ना जानो यह कहाँसे आया, बिनसे कहाँ समानी ॥ तत है वितमें वित है ततमें, तत बित कहिये सोई ॥ पहले देखै ब्रह्म आरसी, दूजा धोखा होई ॥ कहें कवीर फकीर फिकर तज, न्याय सहित रहो भाई ॥ आवा जाई झूठ कल्पना, सहजे रहो समाई ॥
शब्द ३२२-मन हरना बड हुशियार एकदिन चोरवा आवेगा ॥ टेक ॥ तबल तीर तलवार वरछी, ना बंदूक चलावेगा ॥ आवत जात लखे ना कोई, घरमें दुंद मचावेगा ॥ ना गढ तोरे ना गढ फोरे, ना कछु रूप दिखावेगा ॥ नगरीसे कछु काम नहीं है, तुम्हें पकर लेजावेगा ॥ नहीं सुने फिरियाद सकल पुनि, ऐसा तस्कर आवेगा ॥ लोग कुटम परिवार घनेरे, खोजी खोज न पावेगा ॥ ऐसा है कोई संत विवेकी, नाम भजन गुन गावेगा ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, खोल किंवारी जावेगा ॥
(८७८)
कबीरपंथी-
शब्द ३२३—अन घडिया देवा कोन करे तोरि सेवा ॥ टे० ॥ घडे देवको सब कोई पूजै, जस भीतीका लेवा ॥ जाकी सकलो सृष्टि रची है, ताहि लहे ना भेवा ॥ को निरगुन को सरगुन कहिये को किरतम को करता ॥ आपमें सर्व सर्वमें व्यापक, सर्व मई होय बरता ॥ ब्रह्म विष्णु महादेव कहिये, तिनहुँको लागी टंकिया ॥ पूरन ब्रह्म अखंडित न्यारा, सो करता अन घडिया ॥ दस औतार निरंजन कीन्हा, सो करता ना होई ॥ वे तो आपन करनी भुगते, करता औरै कोई ॥ जोगी जती तपी सन्यासी, आप आप मिल मुडिया ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो, अलख लखै सो तरिया ॥
शब्द ३२४—ननदी जाहुरी महलनको, अपनो बीरन जगाव ॥ ॥ टे० ॥ बीरन जगाये ना जगेरी, लग न सके कछुदाव ॥ काया गठमें भई अंधियरिया, कोन करे वाके भाव ॥ भरमके ताला लगे महलमें, कीमत कुंजी लगाव ॥ कपट किवारिया खोलके तुम, या बिधि पियको रिझाय ॥ भक्ति घाघरा चित्त चुनरिया, चोली चाल सियाव ॥ कर्म मसीकी काजर करले, या बिधि पिया को रिझाय ॥ ज्ञानके दीपक कर गह लीजे, बातीबार लगाव ॥ ततको तेल डार दीपकमें, मगन मसाल जराव ॥ सुरतिके बिजनी करगहि लीन्हा, सेवा सेज बिछाव ॥ शीतल चँवर दार प्रीतमपर, प्रीति पिछोर उठाव ॥ बारंबार मिले नहीं या तन, भूल कोई मत जाव ॥ कहत कमाल कबीर के बालक, फिर ना मिले ऐसो दाव ॥
शब्द ३२५—काह भये मुखराम कहेसे ॥ टे० ॥ अंतर कपट बचन मुख चातुर, अति अधीन होय मनन कियेसे ॥ जैसे भुजंग ओट टाटीके बहु जीवनको हतन कियेसे ॥ जैसे बधिक
शब्दावली
(८७९)
ओट टाटीके बहु जीवनको हतन कियेसे कहें कवीर वाके संग न करिये, बिनती विवेक जिन भेख लियेसे ॥
शब्द ३२६-मोको कहाँ दूँठे बंदे मैं तो तेरे पासमें ॥ टेक ॥ ना मैं बकरी ना मैं चिकवा, ना मैं डुरी गड़ासमें ॥ ना हों मैं खाल पूछमे, ना हड्डी ना मासमें ॥ ना मैं मिलों जोग तप कीन्हें, ना बिराग संन्यासमें ॥ खोजी होय सो तुरत मिलावे, पलभरके तल्लासमें ॥ ना देवलमें ना महजिदमें, ना काशी कैलाशमें, ना मैं आऊं अवध द्वारका, मैतो सांचे आसमें ॥ मैं बसता सैरतमें तेरी, मेरी पुरी मवासमें ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, सब स्वासनके स्वासमें ॥
शब्द ३२७-गाफिला क्यों बिसराया घनी, तेरी सुंदर काया बनी ॥ टेक ॥ काल करंते आजुई करले, आजु करंते अबही ॥ शिरपर तेरा काल खडा है, सुरक जात जस आनी ॥ धीरे धीरे पाँव उठावो, सिद्धिया है अति घनी ॥ या तन तेरी खास मिलेगी, कीरति रहेगी बनी ॥ या भौसागर अगम भरा है, नाव लगी अति झीनी ॥ गुरु मुख गुरुमुख पार उतरगये, निगुरा बूडे अनी ॥ बालापन तरुनापन बीते, देखलेव दरपनी ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, भली बिसाहन बनी ॥
शब्द ३२८-खबर नहीं जगमें पलकी । सुकृत करले नाम सुमिरले, को जाने कलकी ॥ टेक ॥ कौड़ी कौड़ी माया जोरी बात करे छलकी ॥ पाप पुन्यकी बांध पोटरिया, कैसे होवे हलकी ॥ तारन बीच चंद्रमा झलके, जोत झला झलकी ॥ एक दिन पंछी निकस जायगा, मट्टी जंगलकी ॥ मात पिता परिवार भाई बंधु, तिरिया मतलबकी ॥ माया लोभी नगर बसत-
(८८०)
कवीरपंथी-
है, या अपने कबकी ॥ या संसार रैनका सपना, ओस बुंद झलकी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बातें सतगुरुकी ॥
शब्द ३२९-महेरम होय सो लखि पावे, संतो ऐसा देश हमारा ॥ टेक ॥ बेद किताब पार ना पावे, कहन सुनन सो न्यारा ॥ जात बरन कुल किरिया नाही, संध्या नेम अचारा ॥ बिन घन वादर बिजली चमके, बिन सूरज उजियारा ॥ बिन नैनन जहां मोती पो है, बिन सुर सबद उचारा ॥ जैसे बुंद परे दरियामें, ना मीठा ना खारा ॥ सुन्न सिखरपर गजल संगीता, किंनरी बीन सितारा ॥ जो जो गये ब्रह्म तेहि दरसे, गहुअच्छर तत सारा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो पहुँचे गुरुका प्यारा ॥
शब्द ३३०-संतो मूलन बेटा जायो, जिन खोज कुटुम्ब सब खायो ॥ टे० ॥ जनमत खाई ममता भाई, दुख सुख दोनों भाई ॥ पाप पुन्य पारोसी खाये, ओ तृष्णासी दाई ॥ काम क्रोध दोय काका खाये, मन अभिमानी मामा ॥ मोह नगरके राजा खाये, तब पहुँचे सुखधामा ॥ हम बड़ दादा तुम बड़ दादू, देखतही मन मूवा ॥ आनंदरूप बधाई बाजे, तब वह बालक हूवा ॥ ज्ञानी नाम धरे लड़काको, उनकी महिमा गार्ई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सुखमें रहो समाई ॥
शब्द ३३१-हंसा उड़ चल आपन देश, प्रीति पुरानी भयली नारे ॥ टे० ॥ हंसा सिंगलदीपके, उड़ि आये यदि देश ॥ बेघे मोती ना चुगे, हीडे आपन देश ॥ उड़ हंस कोदवारी लागे, मूरख विडारे जाय ॥ अरे अरे मूरख बावरा, कही कोदवा हंस न खाय ॥ ना हंसाके खेती बारी, नहीं बन जावै पार ॥ अन-बेघे मोती चुगे, सो पुरवे करतार ॥ शशि झंपे दरियावमें, मीन चढ़ी अकाश ॥ जानेगा कोइ संत जौहरी, कहैं कवीर कोइ दास ॥
शब्दावली
(८८१)
शब्द ३३२-जो कोइ निरगुन झर लख पावे ॥ टे० ॥ निर- खत कूप कूप बिन वारी, बिन कर रहट चलावे ॥ जल बिन शीश शीश बिन वारी, सो जल आन पियावे ॥ बिन करताल पखावज बाजे, बिन रसना गुनगावे ॥ गावन हारके रूप न रेखा, सो पद आन मिलावे ॥ कदलीपत्र जहर जंगलमें, बिन गुरुके नहीं खावे ॥ उठत सनेह मरमना पावे, आगमके गोह- रावे ॥ जोगी जती तपी संन्यासी, नाहक भेख बनावे ॥ बिना नामके भौरा घूमै, सुख सपने नहीं पावे ॥ पुरहन पत्र बसे नित दाडुर, सोऊ सवाद न पावे ॥ कमल कलीके भौरा लोभी, सौ जोजन उडजावे ॥ काजी हाथ किताब न आवे, मुलना बांग न भावे ॥ वेद पुरान विप्र ना भावे, राजा राज न भावे ॥ कर बिन कलम कलम बिन कागद, बिन मसि अंक बनावे ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, सतगुरु मिले लखावे ॥
शब्द ३३३-संतो समुझैका मतन्यारा, जो आतम तत्त्व बिचारा ॥ टे० ॥ औरनसो कहें आपा खोजो, आप अपन ना जाने ॥ मुख कछु आन हिये कछु आना, कैसे राम पहिचाने ॥ औरनसो कहें मोह न कीजे, निरमोही होय रहिये ॥ माया मोह सकल आपहिमें, या दुख कासो कहिये ॥ औरनको कहे तजो बडाई, आप बडाई चावे ॥ जोर बडाई छूटत नाही, झीना पीर कहावे ॥ औरनसो कहें पछ न कीजे, आपा पछ न छूटे ॥ कहन सुननको साधु कहावे, सांच कहे रिस छूटे ॥ जौ लग राग द्वेष मन माहीं, अस्तुति निंदा भावे ॥ तब लग तोनों ताप ना छूटे, कहा भये बहुगावे ॥ पद सारखी औरन समुझावे, आपा समु- झत नाही ॥ कहें कवीर राम क्यों दूरसे, मैं तैं छूटत नाही ॥
शब्द ३३४-करोरे बंदे वा दिनकी तदबीर ॥ टे० ॥ लाल
(८८२)
कबीरपंथी—
खंभपर देत ताडना, सहि न सके शरीर ॥ मारमार सुगदर प्राण निकासे, नैनन भर आवे नीर ॥ रंगमहल एक कामिनि वैठी, कर शृंगार गंभीर ॥ दुनियाँ दौलत महल संग न जात शरीर ॥ भौसागरके राह कठिन है, नदिया अति गंभीर ॥ नाव न बारे लोग घनोरे, खेवनवाला बे पीर ॥ जब जमराजा पकर मँगावे, पाँयन परे जंजीर ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, अब ना करू तकसीर ॥
शब्द ३३५—नाम गत पार न पावे कोई ॥ टे० ॥ मच्छ कच्छ बाराहौ मर गये, नरसिंह रूप जो होई ॥ परशराम बलिबावन मरगये, कहो कहा कह रोई ॥ रघुबर मरे मरे वे दशरथ, भरथ शत्रुहन दोई ॥ रावन मार बिभीषण थापे, उनहूके लक विगोई ॥ जडुपति मरे मरे डुर्योधन, एक रात ना होई ॥ पाँच पंडवा सिद्धे हिमाले, मुक्त कहो नरलोई ॥ अंमरीष औ व्यास परी- च्छित, मरत देर ना होई ॥ अज फल खाये धनंतर मर गये, तिनहूकी सुदबुद खोई ॥ कहें कवीर सुनो नर भोंड़, तुमरी कौन गत होई ॥ उपजत विनशत जुग चारों गये, रहत न देखा कोई ॥
शब्द ३३६—जुगवे निशवासर जोग जती ॥ टे० ॥ जैसे ब्रह्मा वेदको जुगवे, शिवको जुगवे पारबती ॥ जैसे सुनार सोनाको जुगवे, घटन न पावे पाव रती ॥ जैसे नार पुरुषको जुगवे, बरत अगिन हो जात सती ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, का गजा- का छत्रपती ॥
शब्द ३३७—बैरागी रामारे मगन फकीरी तेरी पूरी ॥ टे० ॥ हाथ कमंडल बगलमें सोटा, चारों मुलक जगीरी ॥ दिल अंदर दीदार करोगे, आठों, पहर हजुरी ॥ रूखा सूखा साग अलोना
शब्दावली
(८८३)
टुकरा, राखत सदक सबूरी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, जोगियाको जुगत जहूरी ॥
शब्द ३३८—जग देखा ठाठ तम्बूरेदा । पाँच तत्त्वका बना तँबूरा, त्रिगुन तार सहूरेदा ॥ टे० ॥ बाजत है पर दीसत नाहीं, इस मनही सहूरेदा ॥ टुट गये तार उखड गई खूँटी, मिल गये धूरम धूरेदा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, साहेब हाल हजूरेदा ॥
शब्द ३३९—सौदा कर सोई जाने, कायागढ खूब बजार ॥ ॥ टे० ॥ या काया गढमें हाट लगी है, लालच लोभ दलाल ॥ या काया गढमें हीरा मोती, परखेगा परखनहार ॥ या काया गढमें काजी मुलना, निशदिन करत पुकार ॥ या काया गढमें धनी विराजे, तूनेके ओट पहार ॥ या काया गढमें सात सखुंदर, कोई मीठा कोई खार ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, गुरु बिन जग अंधियार ॥
शब्द ३४०—मेरा दिल साहेब जाने गुदरिया गलतान ॥ टे० ॥ पांचतत्त्वकी बनी गुदरिया, परी रहै मैदान ॥ अच्छे वृच्छ तर आसन मारा, गुरु मूरतको ध्यान ॥ अर्थ उर्ध्व बिच डोरी लागी, अनहद चढी कमान ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, पाया पद निरबान ॥
शब्द ३४१—चितवत चितवत नैन दुखित भये, अजहूँ न आये साजनवा ॥ टे० ॥ निहारे बार अपार भई, सखि छूटो शिंगार सब दरपनवा ॥ पियाकी सोच रमोरी मनमें परी, सखि नीको न लागे जेवनवा ॥ एक पग ठाढी तोहे मनाऊं, ठाढी पछताऊं सखि आंगनवा ॥ धरमदासकी अरज गोसाईं, गावत पद सखी निरगुनवा ॥
(८८४)
कवीरपंथी-
शब्द ३४२-ना कीन्हहा तैने हरिका सुमरन, सब दिन यो ही गयेरे ॥ टे० ॥ बालापन तो खेल गमाये, अबतो तरुन भयेरे ॥ बृद्ध भये कफ वायने घेरे, दुख नहीं जात सहेरे ॥ चार पहर धंधेमें खोये, अबतो सांझ भयेरे ॥ का गफलतमें सोता प्रानी, संगी निकस गयेरे ॥ मूंड मुंडाये जटा बढाये, जोगी राज भयेरे ॥ परमारथकी राह न जानी, अध बिच लटक रहेरे ॥ सुंदर देह देख मत भूलो, नाहक भार भरेरे ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साथी, तेरी जननी बोझ मरेरे ॥
शब्द ३४३-सखी सुन सतगुरु तान, नींद नहीं आती बिरहा-पर सूरति गयी पछारे खाती ॥ टेक ॥ सखी हिरदे भयो अंधियार भरमकी राती ॥ सखी बिना नाम अंजार होत कस पाती ॥ सखि नैन सैनसे खोज पिया दूँदलाती ॥ सखी पिया मिले सुख चैन नाम गुन गाती ॥ सखी मान सरोवर चल हंसनके पांती ॥ छबि देखत भये निहाल काल पछताती ॥ सखी जरा मरनके बात सबे मिट जाती ॥ जो धर्मनि कहै पुकार सीप मिल स्वाती ॥
शब्द ३४४-सोला कला मन विचार देखो पद पावे निरबानी ॥ टे० ॥ पहिले कलामें, बुंद डारदै दूजै धूर जमाई ॥ तीजे कलामें अंग फरुके चौथे मिट्टी बनाई ॥ पांचे कलामें पांचों मिल गये, आठे आगम जानी ॥ नवे कला नौखंड विराजे, दसपैंदस दरवाजा ॥ इग्यारहें कलामें साहेब राजी, बारह बाजत बाजा ॥ तेरह कलामें तिरगुन मिल गये चौदसजासी ॥ पूनो व्याला पूरन पाये, कहै कवीर अविनाशी ॥
शब्द ३४५-बाबा कवीर गुरु पूरा है ॥ टे० ॥ पूरे गुरुके जाउँ बलिहारी, जाका सकल जहूरा है ॥ सबमें व्यापक सबते
शब्दावली
(८८५)
न्यारा, हरदम रहत हजूरा है ॥ स्वेत ध्वजा फहरात गगनमें, बाजत अनहद तूरा है ॥ नाम कवीर जपे जन सूरा, नानक चरनके धूरा है ॥
शब्द ३४६-कर नैनो दीदार महलमें प्यारा है ॥ टे० ॥ नौ दरवाजा परगट दीसे, दसवां द्वारा मुंद कुलफ जडतारा है ॥ उलट सर्पनी गगन सँवारे, षट्चक्रकी सोध विचारे मेरु डंडपर सीधा पवन दो धारा है ॥ चंद सूर दोउ एक घरलावे, सुषुमन सेती ध्यान लगावे, तिरबेनीके घाट उतर भौपार है ॥ गगन मँडलमें उर्ध सुख कूवा, सूरा होयसो भरभरपीवा, निगुरा जात पियासे, हिये अंधियारा है ॥ नेती धोती वस्ती पाई, आसन पवन जुगत ठहराई, गम घोडा असवार, भरमसे न्यारा है ॥ शब्द विहंगम चाल हमारी, कहें कवीर सतगुरु ले तारी, खुल-गइ भरम किंवारी, सार शब्द झनकारा है ॥
शब्द ३४७-जबसे मन परतीत भई । मेरे गुरुने सजीवन मूरदई ॥ टे० ॥ दिन दिन औगुन छूटन लागे, बाढन लागी प्रीति नई ॥ पावे दाव भाव बन आवे, मिलगये सतगुरु साहेब सही ॥ सुरति निरति दोय ज्ञान जौहरी, निरख परखके वस्तु लई ॥ थोरे बनज लाभ भो भारी, उपजन लागे लाल मई ॥ मानकपुरमें मोती उपजे, हीरा नगसो भेट भई ॥ आगम निगम नित खोज निरंतर, गुरुने नाम निज वस्तु दई ॥ सुखसागर असनान जो करले, स्वात बूंद सो भेट भई ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, हती विकार सो दूर गई ॥
शब्द ३४८-बालापन वांके बतिया हँसा सुध करो ना ॥ टे० ॥ दसो दिशाके गम जहां नाहीं, संकट परे दिन रतिया ॥ बार-बार तुम कौल किये हौ, बसुधामें करव भगतिया ॥ गरभहिसे
(८८६)
कवीरपंथी
बाहिर प्रभु कीन्हा, माया घरे दूनों अंखिया ॥ पांच पचीस कंठ चढ बैठे, परले तू मौज लफसिया ॥ बालापन बलहीमें बीते, तरुनीमें कडके छतिया ॥ काम कोध दस इंद्री जागे, ना सूझे जात न पतिया ॥ अंतसमें में जान परी है, जब जम घरे डुर- रिया ॥ देवा देवी एको ना लागे, झूठी होवे जड़ियासे बुटिया ॥ केसो दुख समुझके गावे, गुरुजीसे करे बिनवतिया ॥ श्याम बिहारी समुझके चेतो, अंतमें कोऊ ना संचतिया ॥*
शब्द ३४९ तुम कौन हो मियां कहाँके ॥८०॥ कहाँसे आये कहाँ जावोगे, किनने भेजा कौन काम है, नई नगरिया झाँके ॥ आतेही तुम रोय दिया, का लायेथे सो खोय दिये, किस जिंग- रमें हो किस फिकरमें हो, आंखें खोलो का ढाँके ॥ वतन तुम्हारा कौन ठामहै, बड़ा शहर वोहै कोई गाम । उत्तर दखिन पूरव पश्चिम, नैरितके हो ईशानके ॥ आये हो इस नगरीमें, कुछ मौज साईका सुख देखो. अब ऐसी ना कीजिये, ना ईहांके हो ना उहांके ॥ हिंदू या मुसलमीन हो, दुनियां द्वार फकीर नदान, कहें कवीर सुनो भाइ साधों, तिरछे हो के वाँके ॥
शब्द ३५०—हम तो सदा बने रंगलाल । लंडी दौलत का है पाल ॥८०॥ चार खूंट जागीर हमारी, गल बिच तुलसी माल ॥ काम धाम सब लिया बगलमें, कोई न पावे हाल ॥ अन जल आटा सब कुछ मिलता, घी गुड़ चावल दाल ॥ बहुत खजाना पास भरा है, देता है गोपाल ॥ खुसीसे भिक्षा लेते है हम, नासिर फोरी चाल ॥ साई खातर लिया फकीरी, झूठी माया जाल ॥ दया धरम कुछ करले बंदे, निकल जायगी खाल ॥ जितनी संपत् उतनी बिपत, नाहक बजावे गाल ॥ सत्तनामका दिया है डंका, हाथ जोड़ता काल ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधों, लगा भजनका ढाल ॥
शब्दावली
(८८७)
शब्द ३५१-कोन गुरु कालसो बांचे । जोतसरूपी नाथ बनाये, तामो सब नाचे ॥ टे० ॥ इच्छा सुरती जपते उपजी, भई जगत कांचे ॥ सत्तर जुग गये एक पलमें, ताही ब्रह्मा राचे ॥ कर षट् दर्शन चार संपदा, सब जगको बांधे ॥ एकइस पुरी अखंड बसुधा, को कहु कैसे नाधे ॥ दान पुन्यका बड़ा भरोसा, या जुगमें सांचे ॥ पंडराजसे को बड़ दानी, दुंदकाल महीं फांसे ॥ केवल ब्रह्मको सबे भुलाने, चले जोत जांचे ॥ अंधधुंधमें सुरति भुलाने, फिर भागे पीछे ॥ घाटे घाटे चौकी वैठी, कठिन काल आसे ॥ शब्द बिना कोई जान न पावे, ताहि पकर तरासे ॥ जोतके आगे सतगुरु साहेब, अजर अमर सांचे ॥ कहैं कवीर हम आवें जावें, हंस लिये साथे ॥
शब्द ३५२-कोई सफा न देखा दिलका । कहीं कुत्ता कहीं बकुली देखा, कहीं साप देखा बिलका ॥ टे० ॥ कहीं पंडित कहीं काजी देखा, सुलना देखा अकिलका ॥ कहीं पूरब कहीं पश्चिम देखा, उत्तर देखा दक्षिणका ॥ ऊपर मनसे कथनि कहत है, भीतर गोला पथरका ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, एही हाल खिलकतका ॥
शब्द ३५३-काया नगरीमें कोनसा पुरुष ॥ टेक ॥ आपहि गरजे आपहि बरसे, आपहि पवन झकोरता फिरत ॥ आपहि माली आप बगीचा, आपहि कलियां तोरता फिरत ॥ आपहि तखरी आपन राजी, आपहि सब जग तौलता फिरत ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, आपहि घट घट बोलता फिरत ॥
शब्द ३५४-मेरा हीरा हेरागये कचरेमें ॥ टेक ॥ कोई पूरब कोई पछिम बतावे, कोई बतावे पानी पथरेमें ॥ पंडित वेद पुरान बतावे, उरझ रहे जग झगरेमें ॥ सुर नर मुनि और पीर
(८८८)
कवीरपंथी-
औलिया, भूल गये सब नखरेमें ॥ धर्म दास गुरु हीरा पाये, बांध लिये निज अँचरेमें ॥
शब्द ३५५-गरीबी है सबमें सिरदार ॥ टे० ॥ उलटके देखो ज्ञान गरीबी, जाकी पैनी धार ॥ भौ भंजन सुखदायक जनको, कहर बिडारन हार ॥ सतयुग त्रेता द्वारा कलियुग, परले टारन हार ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, हंस उबारन हार ॥
शब्द ३५६-छकोरे मन गगन गली, जहाँ बजत बीन सुर झीनी ॥ टे० ॥ रुनक झुनक अनहद झुन गरजे, झिलमिल दरसे जोती ॥ बिन बादल जहाँ बिजली चमके, वरषत हीरा मोती ॥ अधर देहरा अधर पुजारी, अधरे सकल बनाया ॥ अधर बैठ मन निहचल कीजे, ब्रह्ममें जीव समाया ॥ स्वेत सिंहासन स्वेत छत्र सिर, स्वेत ध्वजा फहराई ॥ हरो लाल पीरो असमानी, बहुरंगी दरसाई ॥ साहब मोमें मैं साहबमें, झिल मिल दरसे नूर ॥ कहें कवीर दया सतगुरुकी, बैठे हाल हजूर ॥
शब्द ३५७-मेरे दिलदा सौख फकीरी । धन सतगुरु उपदेश दियो है, सुरति भई मेरी थोरी ॥ टेक ॥ सुन्न सिखर पर गजल संगीता, रहता सत्त सबूरी ॥ सत्त अवाज करो दरगाहमें, भिछा मिले भरपूरी ॥ पांच उमराव हजूर बंदगी, आठो पहर उजीरी ॥ अजब ख्याल देखा दरगाहमें, बाजे रबाब नफीरी ॥ काम क्रोध दोनों दल जीते, हठ आसन तत सीरी ॥ सब घट साहेब समकर जाने, ऐसी रहन गंभीरी ॥ मांगो न भीख डरो ना, दो मेरे दिलकी सीरी ॥ कहें कवीर दया सतगुरुकी, सहज भई घर मेरी ॥
शब्द ३५८-तरे कायामें गुलजार, बागों मत जा रे ॥ टेक ॥ मन माली परमोधके, संजमकी कर बार ॥ दया पौद सूखे नहीं, क्षमा शील जड़ डार ॥ करनी कयारी बोइये, रहनी कर रखवार ॥
शब्दावली
(८८९)
दुरमतिका गढ ढायकै, देखो अजब बहार॥ चित्त चमनके बागमें, फूलरही फुलवार॥ मुक्ति कली सदा खिलरही, पहिर गुंज गल- हार॥ अष्ट कमल दल ऊपरे, शोभा अगम अपार॥ कहै कवीर चित्त चेतियो, आवागवन निवार॥
शब्द ३५९-संतो सुनत ज्ञान गलताना । अब सो पद पढ़ि समाना॥ टे० ॥ अगम भूमिसों सतगुरु आये, रूप धरे कुरमाना॥ दूंदत ऊंट महलमें डोले, बूझत साह बिहाना॥ या तो महल हमारा है रे, तै पंथी कित आना॥ दूजे रूप खवास धरे जब, फूलन सेज बिछाना॥ कोडा तीन मार तिन खायो, मारत चोट हेवाना॥ कहै खवास सुनो इब्राहिम, कैसे खलक पत खाना॥ एक घडी सेज्यापर पौढे, तनकी चाम उडाना॥ हेत हुशन सब दूर हुये हैं, दरस तखत हीराना॥ गैव खवास भये तिहिं वारी, कंपन लगे पराना॥ उत्तरी चारी भई फकीरी, फारा तोसे खाना॥ मखमल खासा दूर बहाये, अलफी पहिर निमाना॥ सोला सहस सहेली छांडी, अठारा लाख तुराना॥ सतगुरु शब्दे लई फकीरी, हरखित तजे निशाना॥ हीरा मोती मुक्ता त्यागे, अरबों खरब खजाना॥ सत्तर खान उमराव बहत्तर, तजे अमीर मस्ताना॥ मेवा पान मिठाई त्यागे, अमृत भोजन खाना॥ नंगे पैरों भये पयादे, इब्राहीम सुलताना॥ चढ़त गयंद इंद्रके नाई, सूरज अस्त छिपाना॥ सेना सकल भीर दल बादल, गरद उडे असमाना॥ दसों दिशा मक्काको फेरा, चरणों बांध कुराना॥ दास गरीब कवीर पुरुषने, अमर किये सुलताना॥ ❁
शब्द ३६०-अवधू जोग अध्यातम जोई । एकै ब्रह्म सकल घट दरसे, और न दूजा कोई॥ टेक॥ प्रथम कमल जान चतुरदल, देव गनेसको बासा॥ रिधि सिधि दोय संग उपासे, जाप छैसो
(८९०)
कबीरपंथी-
परगासा ॥ षट्दल कमल ब्रह्माको बासा, सावित्री संग सेवा ॥ षट्सहस्र जाको जाप जपत है, इन्द्र सहित सब देवा ॥ अष्टदल कमल हरि संग लछमी, तीजे सेवक पौना ॥ षट्सहस्र जाको जाप जपत है, मिटगये आवागौना ॥ द्वादस दल कमल शिवको बासा, पारबती संग सेवा ॥ षट्सहस्र जाको जाप जपत है, लखो ज्ञानके भेवा ॥ षोडस कमलमें जिवको बासा, सकती अद्या जानी ॥ एक सहस्र जाको जाप जपत है, ऐसा भेद वखानी ॥ त्रिदल कमलमें सरस्वति बासा, उज्ज्वल कमल निवासा ॥ एक सहस्र जाको जाप जपत है, होय ज्ञान परकासा ॥ भँवर गुफा जहाँ दौय दल कमला, परम हंसको बासा ॥ सहस्र जाको जाप जपत है, करम भरमको नासा ॥ सहस्र दल कमलमें झिलमिल दरसे, आपहिँ ईश अपारा ॥ जोति सरूप सकलमें वरते, अलख निरंजन सारा ॥ सुरति कमल सतगुरुको बासा, एक जाप जपे सोई ॥ छैसो इकईस जाको जाप जपत है, चीन्हे बिरला कोई ॥ जो चीन्हे सो गुरुमुख होवै, भेद अगोचर भाई ॥ जो गुरुमुख सो शब्दहिं पावै, कहैं कवीर समुझाई ॥
शब्द ३६१-सुरत मेरी नामसे अटकी ॥ करम भरम औ वेद बढाई, या फल सो सटकी ॥ टेक ॥ नामके चूके पार न पैहो, जैसे कला नटकी ॥ जागत सोवत सोवत जागत, मोहि परे चटसी ॥ जैसे पपिहा स्वात बूंदको, लाग रही रटसी ॥ भरमकी मटकी झिरके ऊपर, सो मटकी पटकी ॥ हम तो आपनि राह चलत हैं, औरन को उटकी ॥ प्रीति पुरानी नई लगन है, या दिलमें खटकी ॥ और नजर कछु आवत नहीं, ना माने हटकी ॥ प्रेमकी डोरी मो मन लागी ज्ञान, डोर झटकी ॥ जैसे सरिता सिंधु समानी, फेर नहीं पटकी ॥ गहो निजनाम खोज हिरदैमें, चीन्ह परे घटकी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो फेर, नहीं भटकी ॥
शब्दावली
(८९१)
शब्द ३६२-सतगुरु अगमकी राह उघारी॥ टे०॥ जतन जतन कर तन मन साधो, मुखमन सुरति संभारी॥ मिट गइ तिमिर दरस भयो तिनको, पाइ परमपद भारी॥ हीरालाल जौहर तहां दरसे, हरदम नाम निहारी॥ निश दिन पल पल नाम सो लागे, ऐसो अमल करारी॥ महा बारीख मुकुतिको मारग, पच्छिम खुली किंवारी॥ नौपत नाम ध्वजा फहरावे, चढ गइ सुरत अटारी॥ याही चाल मिलो सतगुरुसो, मानो सीख हमारी॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, चेत लेहु नर नारी॥
शब्द ३६३-थोरे थोरे खाऊंगी, मैं अंत न जाऊंगी॥ गुरुके शब्द लेके सहज समाऊंगी॥ टेक॥ खाई मैं ननद दुलहे भुजा मरोरी सासु, मैं खाई दोय पग तोरी॥ खाऊं मैं देवर खाऊं मैं जेठ। पुनि मैं खाऊं ससुरा ठेठ॥ खाऊं मैं माई खाऊं मैं भाई। पुनि मैं खाऊं घरक जँमाई॥ खाऊं मैं पांच कुटुमके लोग। कहें कवीर तब सीझा जोग॥
शब्द ३६४-हरि मोहिं एक अचंभा भावे। सासुको बहुवा खिलावे॥ टे०॥ बहुवाके घर ससुरा जाई। सासु बधैया ले घर आई॥ मूसाके सभा सरप एक नाचे, मैडक ताल बजावे। कौवा बैठे सगुन विचारे, भैंस बिसुन पद गावे॥ बिना बीजके बूच्छ लगाया बिन, पानी पलुवाया। ऊपर मूल नीचे भइ डारी, अमृत फूल फुलाया॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, जो या शब्द बुझावे। जो या पदको गाय विचारे, सोई सदा रहावे॥
शब्द ३६५-नइया मेरी नीकी चलने लागी। आंधी मेह कछु ना व्यापे, चढे संत बड़ भागी॥ टेक॥ उथल परै तो डर कछु नाहीं, ना गहिरेका साँसा। उलट जाय तो बार न बाँका, याका अजब तमासा॥ औसर परै तो परबत बोझो, तेऊ न लागे भारी।
(८९२)
कबीरपंथी—
धन सतगुरु जे जुगति बताई, ताकी मैं बलिहारी॥ सार शब्दकी नहया बनी है, मोहकी मकरिया लाय । गुन सहासकी हाजत नाहों, ऐसा साज बनाय ॥ कहै कबीर जो बिन शिर खेवै, सो यह संत बखाने । या वोहितकी अकथ कथा है, बिरले खेवट जाने ॥
शब्द ३६६—मन मौजी बैरागी । आवना मन भावना ॥८०॥ पांच तत्त्वके या तन गुदरी, सुरतिकी तोप चलावना ॥ इंगला पिंगला सुषुमन नारी, त्रिकुटी ध्यान बसावना ॥ अनहद बाजा निशदिन बाजे, भँवर गुफा ठहरावना ॥ गगन मंडलको किये पयाना, कहैं कबीर समुझावना ॥
शब्द ३६७—बाबा शरनागत ताकी है ॥ सुरति सोहागिन भई मतवाली, नाम सुधारस छाकी है ॥ टेक ॥ नाम अमोल अपार साहबका, ताहीके संग राची है ॥ निरख परख चरणों चित लागे, उझक झरोखा झांकी है ॥ अंतरगतियें भई उजियारी बिन, दीपक बिन बाती है ॥ कहैं कबीर सुमर सत नामें, आदि अंतसो थाकी है ॥
शब्द ३६८—अहो कब मिलोगे सनेही आय ॥ टेक ॥ चलो सखी जहां देखन चलिये, जहां पुरुष निरबान ॥ हंस हिंमर चौर डुरावे, तनकी तपन बुझान ॥ चारों जुगके हंस उबारे, अजहुँ उबारे आय ॥ जाकी सांची सुरति लगी है, सो वा घरको जाय ॥ भौसागर औगाह अगम है, सूझे वार न पार ॥ सतगुरु साहब हंस उबारन, बांह पकरके तार ॥ कहैं कबीर सुनो भाइ साधो, शब्द रहो लौलाय ॥ नाम पान पानी मिल लैहो, तब सतलोक सिंघाय ॥
शब्द ३६९—भला परदेसिया तू मेरी कही मान रे ॥ टेक ॥ जुगन जुगन तोहि कहि समझाऊं, आद संदेसी मोहि जान रे ॥
शब्दावली
(८९३)
त्रिगुणतत्त्वता इक बावरे, कारजमें सकल जहान रे॥ पांच पचीस तोहि निशदिन ब्यापे, ताको रंग पहिचान रे ॥ पांच पचीससो रहे निरंतर, पावे निरबान रे ॥ झिल मिल जोत झलक एक निर्मल, रंग सुरंगी जान रे ॥ कहैं कवीर संत सोइ आला, जापर भगति निशान रे ॥
शब्द ३७०-गोरख हम तबसे भयेउं बैरागी । मेरी सुरति आदसे लागी ॥ टे० ॥ धुंधीकाल धुंधका मेला, नहीं गुरु नहिं चेला ॥ ताही दिन हम मूंड मुंडाये, जब वह पुरुष अकेला ॥ धरती नहीं जब टोपी दीन्हा, ब्रह्मा नहीं तब टीका ॥ महादेवका जनम नहीं हतो, जबते योग हम सीखा ॥ सतगुरुमें हम लीन फाउरी, द्वापर लीन्हें डंडा ॥ त्रेतामें हम आडबंद खैंचे, कलछ फिरे नौखंडा ॥ काशीमें बिसराम कियो है, रामानंद चेताया ॥ कहैं कवीर सुन गोरख जोगी, हंस उबारन आया ॥
शब्द ३७१-सुरतसो देखले वह देश । देखत देखत दीसन लागे, मिट गये सकल अंदेश ॥ टे० ॥ ना उहां चंदा ना उहां सूरज, नहीं पवन परवेश ॥ ना उहां जाप नहीं उहां अजपा, नहिं अच्छर लवलेश ॥ उहांके गये बहुर ना आये, ना कोई कहत संदेश ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधो, गहु सतगुरु उपदेश ॥
शब्द ३७२-कोई कछु कहे दिल लागा है । तन भी लागा मन भी लागा, ज्यों सुई बिच धागा है ॥ टे० ॥ मेरे मन लागा नाम भजनमें, हटकत लोग अभागा है ॥ बरत अगिनमें कंचन डारे, सोनामें मिलत सोहागा है ॥ हंसकी बानी हंस पहिचाने, क्या जानेगा कागा है ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जीव ब्रह्म होय जागा है ॥
शब्द ३७३-एक दिन साहब बेन बजाई ॥ टेक ॥ सब गोपी
(८९४)
कवीरपंथी—
मिल धोखा खाई, कहै जसोदाके कन्हार्ई ॥ कोई जंगल कोइ देवल बतावे, कोइ द्वारका जाई ॥ कोइ अकाश पताल बतावे, कोइ गोकुल ठहराई ॥ जमुना विमल प्रवाह थकित भये, पवन रहे ठहराई ॥ सोरा बसुधा एकदश पुरलो, सब सुरछित होय जाई ॥ सात ससुन्दर जबे घहराने, तेतिस कोट अघाई ॥ तीन लोक तीनो पुर थाके, इन्द्र उठे अकुलाई ॥ दस औतार कृष्णलौ थाके, कूर्म बहुत सुख पाई ॥ ससुझ न वार पारलौ, यह धुन कहाँसे आई ॥ शेषनाग औ राजा वासुक, वाराह सुच्छित होय जाई ॥ देव निरंजन अद्या माया, ये हुनहुं शिर नाई ॥ कहैं कवीर सतलोकके पूरष, शब्द केर सुर नाई ॥ अभी अंकते कुडुक निकारी, तीन लोक रहु छाई ॥
३७४—अपने पियाके मैं प्यारी सबसौ न्यारी ॥ टेक ॥ एक कंचन दूजे कामनी इन जग मोहा ॥ ऐसा कोइ न देखिया इनते बांचा ओहा ॥ कामदेव एक भूष है सबको लागा ॥ केते तपसी बनगये बनमें जागा ॥ गोपीके कारन कृष्णजी बन बन नाचा ॥ सीताके कारन राम रावन रन माचा ॥ ब्रह्मलोक ब्रह्म डिगे कन्या मोहा ॥ सुर नर मुनि सब पच मरे बांधे लोहा ॥ गगन मंडल बिच बैठके, सुनले बाजा ॥ कहैं कवीर गुरु ज्ञानसे आतम जागा ॥
शब्द ३७५—याद करो दिन बाद जाता है, सतगुरु शब्द सनेह बिना रे ॥ टेक ॥ जठर अग्निमें बूंदे जमाया, पानीसे पिंड किया रचना रे ॥ उहाँ तुझे खान पान पहुंचावे, ऐसो साहब है अपना रे ॥ नौ दस मास गरभ प्रतिपाले, कर कर कोटि जतना रे ॥ नाम लेत तोहि लाज लगत है, मायामें भूल रहौ मना रे ॥ बालापनमें खेल गँवाये, तरुनामें कछु रूप बना रे ॥ त्रिध भये तन आलस उपजे, जीवन मरन रैन सपना रे ॥ अवध घटे जब काल गरासे,
शब्दावली
(८९५)
उठगये हाट तब कछु न बना रे ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, मूल गँवाय चले अपना रे ॥
शब्द ३७६-निज घर जान बेजाना। दगाबाज बटपार बटोही, इनका लगा जमाना ॥ टेक ॥ अपने दिलका कोइ न मिलिया, मिलिया लोग बिगाना ॥ भूला लोग फिरे बेअकूल, इनका नहीं ठिकाना ॥ सेमरफूल जगत इक फूला, ताहि देख लोभियाना ॥ मारत चोंच रुवा उधराने, फिर पाछे पछताना ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, या पद है निरबाना ॥ जो या पदको समुझे बूझे, पहुँचे पुरुष ठिकाना ॥
शब्द ३७७-अब हम सोई परम पद जाना ॥ टेक ॥ ना उहाँ सिद्ध नहीं उहाँ साधक, दूसर कहत दिवाना ॥ न उहाँ चंद नहीं उहाँ सूरज, ना रजनी ना भाना ॥ मकरीको तार स्वेत है झीनी, तहाँ मेरो मन माना ॥ कहें कवीर चीटीके खुरमें, पिंड ब्रह्मंड समाना ॥
शब्द ३७८-अजगैबी बंदा गैब नगरसे आया ॥ टेक ॥ गैबी आया गैबसे, इहाँ लगाया ऐब ॥ उलट समाना गैबमें, छूट गया सब ऐब ॥ आप रहा जब रहा न कोई, एकहि एक कहाया ॥ जात बरन कुल रूप न रेखा, जिन यह राह चलाया ॥ पांचतत्त्व गुन तीन ना पहुँचे, सो वह देश कहाया ॥ ब्रह्मपुरीते इछा उलटी, निरगुन नाम धराया ॥ षट् दर्शनके बंद छुडाये, इब्राहिमहि चेताया ॥ कहें कवीर सुनु गोरख जोगी, जिन ढूँढा तिन पाया ॥
शब्द ३७९-जो बूझे सो बावरा। क्या उमर हमारी ॥ असंख्य जुग आगे गये, तबके हम ब्रह्मचारी ॥ टेक ॥ तीन देव जाने नहीं, सोई आदि हमारी ॥ कोट आये परमात्मा, परलोक सिधारी ॥ हमतो सदा मौजूद है, प्रगटे जुग चारी ॥ कोटन ब्रह्मा हो गये,
(८९६)
कवीरपंथी—
दस कोट कन्हई ॥ अनंत कोट विष्णु गये, मोरे एक पलाई ॥ सात कोट शंभू गये, सुहम्मद कोट चारी ॥ देवतनकी गिनती नहीं, का सृष्टि बिचारी ॥ बलि बावन केते भये, कौरव दल भारी ॥ लंकापति रावन गये, रघुपति कइ वारी ॥ ना बालक ना वृद्ध हों, ना पुरुष न नारी ॥ कहैं कवीर सुन गोरख, यह उमर हमारी ॥
शब्द ३८०—तुज बिन मेरा कोई नहीं, मैं किसे भजोरे दिवाना ॥ टे० ॥ मूल कमल चौकी गनपतकी, सुध बुध सबैं हेराना ॥ लोक लाज कुल पांचो मिलिया, हिलमिल मंगल गाना ॥ नाभ कैमलते लहर उठत है, सुनियो संत सुजाना ॥ इंगला पिगला सुषुमन नारी, उनमुनके घर लाना ॥ बंकनालते अमीरस झरिया, चारखे संत सयाना ॥ चंद सूर दोग्य आसन कीन्है, अनहद घोर निशाना ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, तत्त भेद अब जाना ॥ जो कोई होय नामका भेदी, नामहि सो लौ लाना ॥
शब्द ३८१—मेरे मन बस गये गगन अटरिया ॥ टेक ॥ गगन अटरिया पियाको बासा, ज्ञान पुरुष मठ धरिया ॥ जापर सुरस नगारा बाजे, उठत शब्द धुनकरिया ॥ त्रिकुटी महलमें ध्यान लगावे, जहां अमीरस झरिया ॥ कहैं कवीर जेहि शब्द न वेधे, तापर हनत कटरिया ॥
शब्द ३८२—तैं व्रतधारी नामका, तोहे और न भावे । काँच बांधके का करें, कंचन जो पावे ॥ टे० ॥ जप तप तीरथ संजमा, कोई काम न आवे ॥ विषै पियासे ना बुझे, नल का ससुझावे ॥ स्वात बुंदके कारने, चात्रिक लौ लावे ॥ सोई बुंद मोती भये, का सागर नावे ॥ राई ते लख नाम है, गुरुकृपा ते पावे ॥ कहैं कवीर धावत वने, तो गरभ न आवे ॥
शब्द ३८३—देखो रे घट जंतर बाजे, कौन बजावन हारा ॥ टे० ॥