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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(८७६)

कवीरपंथी-

शब्द ३१८-अलख हमारे राजा जाके बाजत अनहद-बाजा ॥ टेक ॥ शंकरसे जाके जोगी कहिये, ब्रह्मासे ब्रह्मचारी ॥ सुर-पतिसे जाके सुरता कहिये, कृष्णसे औतारी ॥ सात समुंदर शायर कहिये, अनगिनती नदि नारा ॥ अठरा भार रोमावसि कहिये, गिरि परवतसे भारा ॥ भूपति एक महाबलि राजा, चहुँ दिशि फिरे दोहाई ॥ अनंत कोट करताके बागो, यहां प्रगटे ठकुराई ॥ तन बिन मेख तारबिन तंबू, ऐसा तंबूताना ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, तंबू माँहि समाना ॥

शब्द ३१९-पाछे समुझ परेगा भाई ॥ टेक ॥ इहाँ अहार उदरभर कीन्हें बहुविधि मांस कढाई ॥ जीव जंत बहु झटका मारे, यह लेखा सब जाई ॥ इहवाँ लूट खावत तुम परधन, गले फाँसरी लाई ॥ सात सिपाही आगे पाछे, पल पल खबर जनाई ॥ या जग आये राज कराये, पातुर भांड नचाई ॥ एक बुंदके कारन मेरे, कुलके धरम नशाई ॥ ईहां तो कीन्हें साधुकि निंदा सातो जनम नशाई ॥ पैग पैग जम कांटा गाडे, उलटा फाँस लगाई ॥ सांच कहाँ तो मारन धावे, झूठा जग पतियाई ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, भरम भूल दुनियाई ॥

शब्द ३२०-निगम सुत कोन ऋषी उबरे ॥ टेक ॥ प्रथमें ब्रह्मा विष्णु भुलाने, जननी सो बिगरे । सत्यभक्ति जाने बिन डुरलभ, कहु कोने उबरे ॥ नारद मुनि जो डुरमति कीन्हें, बन-चर रूप धर । पराशरऋषि कुहरा उपराजे, पुत्रीसों बिगरे ॥ आसन मार जंगलमें बैठे, वृच्छके चाम चरे । सो भगवान भोगके कारन, शृंगीऋषि बिगरे ॥ दूब अहार कीन डुरबासा, अन्नको त्याग करे । ममता जोर रहे कायामें, इंद्रसभा बिगरे । गुरुगनेश बुद्धिके सागर, शिवके पास खडे । चले अजोग जोग