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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८७५)

शब्द ३१६-साईका अरस तखत है दूर ॥ बिन सुरसद कोई भेद न पावै, भटक सुए सब कूर ॥ लाज छोड़ जिन काज किया है, भया कदमका धूर ॥ चौदा तबक खावकी रचना, ज्यों आतसका फूल ॥ जो निजके कोई समुझे बूझे, इसमें नहीं सहूर ॥ नासूतमें माया खड़ी, मलकूत गुन अस्थूल ॥ जबरूतमें जंजालह लाहूत अच्छर फूर ॥ हाहूतमें अर्चितपुर, बाजत अनहद तूर ॥ वेद पुरान कुरान कहिये, इहाँ लौं खबर हजूर ॥ सात सुन्न दोय बेसुन कहिये, दसो धाम निज मूल । ईछा सोहैं उहाँसो आये, घट घट व्यापक नूर ॥ कहैं कवीर हम खुदके अहदी, लाये हुकम हजूर ॥ सब रहनके दर्द जानके, संप्रथ वचन कबूल ॥

शब्द ३१७-जगतमें काहु न मन बस कीन्ह ॥ टेक ॥ भरथ खंडमें भरथ जोगी, भुग सुत मन हर लीन्ह ॥ ता कारन नर दोष लगाये, भरथ देह दोय दीन्ह ॥ सूखे पत्र पवन भस्व रहते, पारा सुरसे ज्ञानी ॥ तिनहुँ रूप देख बनिताके, कामकंदला ठानी ॥ शृंगीऋषी बन भीतर रहते, बिषै विकार न जाना ॥ पठई नार भूप दशरथने पकर अजोध्या आना ॥ पारबतीसी पतनी कहिये, तिनके मन क्यों डोला ॥ छकित भये शिव देख मोहनी, हाहा करके बोला ॥ सोरा सहस उरवसी जाके, ताका मन बौराना ॥ गौतम ऋषिकी नार अहिल्या, ताहि देख ललचाना ॥ नारद मुनिसे तपसी कहिये, कन्या हाथ दिखायो ॥ मांग्यो रूप भूपश्रीपतिको, स्वांग बंदरको लायो ॥ जमदग्नी जाके नारि रेनुका, जात जमुना जल भरने ॥ मोही देख भूपके मंदिर, छकित भये दोयनैने ॥ एकहि नाल कमलसुत ब्रह्मा, जग उपराज कहायो ॥ कहैं कवीर एक नाम भजन बिन, जिव बिसराम न पायो ॥