कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी
शाम शकारेका ॥ आदमसे होगये औलिया, एक शब्द निर- बारेका ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, फकर आद अखाडेका ॥
शब्द ३१३-दिवाने बंदे का गावे घर दूर ॥ टे० ॥ अनल हक हककर बोले, सूली दिया मनसूर ॥ सेख फरीद कुवामें लटके होगये चकनाचूर ॥ साह सुलतान बलख तज निकसे, छाँडे सोरहसौ हूर ॥ गोरख गोपीचंद भरथरी, शिरमें डारे धूर ॥ नानक नामा औ बाजिंदा, झिलमिल दरसे नूर ॥ खोजत खोजत उमर सिराने, ना पहुंचे रहे दूर ॥ या कलियुगके नर पाखंडी कबहुं न रहत हजूर ॥ इनके मनमें कुफर बसत है, मायाके मग हर ॥ गोरख काया खोज भुलाने, ना पाया भरपूर ॥ कहैं कवीर दया सतगुरुकी, सब घट दरसे नूर ॥
शब्द ३१४-अबहम सबही मध्य विराजे ॥ दोय दल जोर दिखावैं कौतुक, हम जूझें हम भाजें ॥ टे० ॥ हस्ती चीटी लख चौरासी, लघु दीरघ हत खेलें ॥ उत्पति परले खेल हमारा, आप पसा रस केलें ॥ त्रिभुवन सार सकल रसभोगी, घटघट हमरी पूजा ॥ सरग नरक दोउ खेल हमारा, हम बिन और न दूजा ॥ हमही देव असुर सुर राच्छस, हम ऋषि मुनि हम देवा ॥ हमही ठाकुर आप पुजारी, हम साहब हम सेवा ॥ अवनि अगिन जल पवन सुर शशि, हम जगसैं प्रगटाया ॥ कहैं कवीर तत दरसी जाने, कहेसे को पतियाया ॥
शब्द ३१५-मेरे जान मुझे न दिलसे भूल ॥ टे० ॥ डार डारमें, पात पातमें तुम्ही रंगीला फूल ॥ है हाजरको दूर बतावे, का नियरे का दूर ॥ मक्का दूढा मदीना दूढा तबहुं न मिलत रसूल ॥ स्याही गई सपेदी आई, कर चलनेका सुर ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, सब घट दरसे नूर ॥