कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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दुर्घोषनके मेवा त्यागे, दासी सुत घर गये भगवान् ॥ झूठे बेर सेवरी के खाये, प्रेम प्रीत हित अपने जान ॥ शुक्रदेव मुनिसे को बड होई, इंद्री जीत विष डारो छान ॥ वैकुंठमें आदर नाही, कृपा भई न सुने गुरुज्ञान ॥ जोग जग्य व्रत तप कर संयम, चार वेद औ सुने पुरान ॥ कहें कवीर थीर नहिं लागै, जो लग संत नहीं पहचान ॥
शब्द ३११-धनहो धन्य बलखके मीरा । अपने जीव मुक्ति के कारण, सब तज भये फकीरा ॥ टेक ॥ तखतहु छोड दुलीचा छोडा, अंमारीके मीरा ॥ कोटन कोट खजाना छोडा लाल जँवाहर हीरा ॥ जाके पग हुरमनसे मलते, ऐसे नरम शरीरा ॥ बिन पादत्रान बन बन डोले, कसकत नहीं शरीरा ॥ सोरा सहस सहेलरि छोडे, खासा मखमल चीरा ॥ तुरी लाप अट्टारा छोंडे, लगा शब्दके तीरा ॥ धन्य तुम्हारे मात पिताको, जाके पिये तुम छीरा ॥ धन तेरी करतूत कमाई, धन तेरे गुरुपीरा ॥ ज्यों-हारिल लकरीको पकरे, यों मत गहिर गंभीरा ॥ कहें कवीर ऐसी लौलावे, साहेब हाल हजूरा ॥
शब्द ३१२-सुलतानसोबलकबुखारेका ॥ जाके खाना अजब सरहना, मिसरी कंद छोहारेका ॥ टेक ॥ जाकी सुरति लगी कदमसो; अछह पीर पियारेका ॥ जाके सेज फूलसो विछती, करते सुख तन सारेका ॥ अब तो घास बिछावन लागे, मुठी एक गलियारेका ॥ जाके संग कटक दल बादल, झंडा न्यारे न्यारे का ॥ माल सुलक तज लई फकीरी, धनसो कीन्ह विचारेका ॥ जो तनके चोला जोबनते, सवा टंक सब सारेका ॥ सो तो बोझ उठावन लागे, मन दस गूदर भारेका ॥ जासुख चीज नेवाला खाते, करते जीव अहारेका ॥ सो अब रूखा पावन लागे, टुकरा