कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
करवे ॥ सतसुकृतकी चूनरि पहिरो, सत मत रंग रंगाव ॥ प्रेम- तन्वके मांग सँवारो, निरभे सिंदुर लाव ॥ घुंचट पट खोल चलो तुम ससुरे, नेहर नाहिं निबाह ॥ नेहर नेह पैहों सखियां, मत तुम भरम भुलाव ॥ भुलाने पिया न पैहो ॥ आगे इत भौसागर, गहिरा सूझे वार न पार ॥ किस बिध पार उतरबे सखिया, बिन खेवट कडिहार ॥ खेवइया बिनका करबे ॥ कहें कवीर सोई सहवाती, पियरंग राजी होय ॥ अमर लोक अस्थाना पावौ, तब तोर अटल सोहाग, मंडल बिसराम करो ॥
शब्द ३०९.—सबका साक्षी मेरा साईं । ब्रह्मा विष्णु रुद्र ईश्व- रलो, औ अद्याकृत ताईं ॥ टे० ॥ पांचपचीस सो सचै करले, ये सब जग भर माया ॥ अकार उकार मकार मात्रा, इनके परे बताया ॥ जागृत सपन सुषोषत तुरिया, इनते न्यारा होईं ॥ राजस तामस सात्त्विक त्रिगुन, इनते न्यारा सोईं ॥ सूछम अस्थूल आनंदमय कहिये, इन मिल भोग बखाना ॥ राजस तेज प्रकाशहि कहिये, इनते न्यारा जाना ॥ परा पसंति मधमा वैखरी, चौबानी प्रपंच प्रमाणी ॥ पंचकोश नीचे कर देखो, इनमो राम न जानी ॥ पंचज्ञानके पंच कर्म हैं, दस इंद्रि मानो ॥ चतुष्ट अन्तहकरण बखाने, इनमो राम न जानो ॥ कुर्मसेष किरकला धनंजय, देवदत्तहू देखो ॥ चौदा देव इंद्रिया चौदह, इनमें अलख न पेंखो ॥ तत पद त्वं पद और असि पद, बाच्य लच्छ ससु- झावे ॥ कहें कवीर सोईं गुरु पूरा, न्यारा कर बतलावे ॥ पं ❁
शब्द ३१०.—सब औगुनका सिर अभिमान । तेउ न मूढ तंज अज्ञान ॥ टे० राजस जग्य नृपतिने कीन्हे, सुर नर मुनि अचवे जलपान ॥ संख पंचायन तबहीं बाजे, सुपचभगत रस लीन्हों सान ॥ यही चूक चूके लंकापति, काटे शिर दशरथ सुत आन ॥