कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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पावे ॥ आठे अष्ट कमल दलफूले, घट उजियारी होई ॥ आतम होय परमातम चीन्हे, संत कहावे सोई ॥ निरख देख नोमीके द्वारा, जब गुरु पूरा पावे ॥ अहे संधि कायासे न्यारी, जो गुरु संधि लखावे ॥ दसई दसो द्वारको पावे, पटले एक पहारा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, बहुतन साधो आरा ॥
शब्द ३०६—दोय नैनोके बीच सुसाफिर रमरहुरे ॥ ॥ टे० ॥ धोबी धोवे कापडा, झांझ मऊके घाट ॥ मछरी साबुन लेगईरे, धोबिया गा बारह बाट ॥ धोबिनियां लुट गईरे ॥ कोठी ऊपर कोठरी, जहाँ चढ बोले मोर ॥ मोर बिचारा का करे, घरमें घुसगा चोर ॥ सबी धन लुटि गयोरें, सँराक कुवा पताल जल-पानी, लंबी लागी डोर ॥ थरहर कंपे बाला जियरा, को प्रेमी लेत निचोर ॥ सुघर घर होय रहोरें कहें कवीर सुनो भाइ साधो, सौदा करले हाट ॥ हाट उसल गये सौदा बिक गये, होगये बारा-बाट ॥ जहाँके तहाँ होय गयोरें ॥
शब्द ३०७—मिलना कठिन है मैं कैसे मिलों पिय जाय ॥ टे० ॥ अगम भूमि जहाँ महल पियाको, हमपे चढयो न जाय ॥ औघट घाट गैल रपटीली, पांव नहीं ठहराय ॥ सावधान पग धरो पंथ-पर, बार बार डिंगजाय ॥ अति बारीक पंथ बहु झीना, सुरति झकोरा खाय ॥ लोकलाज मरजाद जगतकी, देखत मन सकु-चाय ॥ जो या बात नये जोबनकी, लाज तजी ना जाय ॥ दूजे सतगुरु मिले पंथपर, मारग दिये बताय ॥ साहेब कवीर मुक्ति के दाता शीतल अंग लगाय ॥
शब्द ३०८—सोहागिन चेत करो तोरे आवागमन नगिचाय ॥ टे० ॥ बालापनमें खेल गँवाये, चलिया चाल कुचाल ॥ कोन जबब देहु मोरि सखियां साहेब पूछ हवाल ॥ समुझ बिनका