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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 884

(८७०)

कबीरपंथी-

शब्द ३०४-का सोचत बारमबारा, प्रभुका नाम न लेत गँवारा ॥ टे० ॥ बाजीगर डंक बजाया, सब लोग तमाशे आया ॥ बाजीगर डंक सकेला, तब रहगये आप अकेला ॥ मनुवां जहाँ हाट लगाया, दुनिया सौदागर आया ॥ सौदागर सौदा कीन्हा, बिरले सौदागर चीन्हा ॥ जब पार उतरना चाहिये, तब खेवटसे मिल रहिये ॥ जब उतर गये भौपारा, तबको हमको संसारा ॥ जब वस्तु अगोचर चाहिये, तब दीपक बारत रहिये ॥ जब वस्तु अगोचर पाई, तब जोतमें जोत समाई ॥ जब मुखडा देखन चाहिये, तब दरपन मांजत रहिये ॥ जब दरपन लागीं काई, तब दरशन कहाँते पाई ॥ जब फूल पत्र फल चाहिये, तब विरवा सींचत रहिये ॥ जब फूल पत्र फल लागा, तब दिलका दुविधा भागा ॥ साहेब कबीर कहे हम जाना, जानेसे मेरा मन माना ॥ कहनेसे नाँहि पतीजे तो मूरखसे का कीजे ॥ ✽

शब्द ३०५-कोई लोढ़िरे संत सुजान, काया बन फूल रही ॥ टे० ॥ एकहि एक मिले गुरुपूरा, मूलमंत्र जो पावे ॥ साधु संतकी बानी बूझै, मन परतीत बढावे ॥ दूजे तनकी दुविधा मेटे, दूजा भाव न लावे ॥ भीतर बाहर एक देखे सो वह संतहि पावे ॥ तीजै तीनों गुनसे न्यारा, तिरबेनी अस्नाना ॥ त्रिकुटी महलमें आसन मारे, अनहद धुन सुन काना ॥ चौथे चंचल बसकर राखे, चतुराई सब त्यागे ॥ चढके प्रेम हिंदोरा झूले, गुरुसो भगति वर मांगे ॥ पांचे पांच तत्त्व प्रकासे, पांचो इंद्री साधे ॥ पकड़ पवनकापरचे करके, मनओ पवन गहि बांधे ॥ छठयें छऊ चक्रको बेधे, षट दल होय प्रकाशा ॥ इंगला पिंगला मारग सोधे, करै गुफामें बासा ॥ साते सत बचन परकासे, सत्य सुरत लखि आवे ॥ मकरतारकी डोरी गहिके, अजर अमर घर

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